महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 611, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमं भेषजं ह्येतद् यज्ञानामेतदुत्तमम् । रसानामुत्तमं चैतत् फलानां चैतदुत्तमम् ॥ ८ ॥ घी सबसे उत्तम औषध और यज्ञ करनेकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु है। वह रसोंमें उत्तम रस है और फलोंमें सर्वोत्तम फल है ॥ ८ ॥
फलकामो यशस्कामः पुष्टिकामश्च नित्यदा । घृतं दद्याद् द्विजातिभ्यः पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ ९ ॥ जो सदा फल, यश और पुष्टि चाहता हो वह पुरुष पवित्र हो मनको वशमें करके द्विजातियोंको घृत दान करे ॥ ९ ॥
घृतं मासे आश्वयुजि विप्रेभ्यो यः प्रयच्छति । तस्मै प्रयच्छतो रूपं प्रीतौ देवाविहाश्विनौ ॥ १० ॥ जो आश्विन मासमें ब्राह्मणोंको घृत दान करता है, उसपर देववैद्य अश्विनीकुमार प्रसन्न होकर यहाँ उसे रूप प्रदान करते हैं ॥ १० ॥
पायसं सर्पिषा मिश्रं द्विजेभ्यो यः प्रयच्छति । गृहं तस्य न रक्षांसि धर्षयन्ति कदाचन ॥ ११ ॥ जो ब्राह्मणोंको घृतमिश्रित खीर देता है, उसके घरपर कभी राक्षसोंका आक्रमण नहीं होता ॥ ११ ॥
पिपासया न म्रियते सोपच्छन्दश्च जायते । न प्राप्नुयाच्च व्यसनं करकान् यः प्रयच्छति ॥ १२ ॥ जो पानीसे भरा हुआ कमण्डलु दान करता है, वह कभी प्याससे नहीं मरता। उसके पास सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री मौजूद रहती है और वह संकटमें नहीं पड़ता ॥ १२ ॥
प्रयतो ब्राह्मणाग्रे यः श्रद्धया परया युतः । उपस्पर्शनषड्भागं लभते पुरुषः सदा ॥ १३ ॥ जो पुरुष सदा एकाग्रचित्त हो ब्राह्मणके आगे बड़ी श्रद्धाके साथ विनययुक्त व्यवहार करता है, वह पुरुष सदा दानके छठे भागका पुण्य प्राप्त कर लेता है ॥ १३ ॥
यः साधनार्थं काष्ठानि ब्राह्मणेभ्यः प्रयच्छति । प्रतापनार्थं राजेन्द्र वृत्तवद्द्भ्यः सदा नरः ॥ १४ ॥ सिद्ध्यन्त्यर्थाः सदा तस्य कार्याणि विविधानि च । उपर्युपरि शत्रूणां वपुषा दीप्यते च सः ॥ १५ ॥ राजेन्द्र! जो मनुष्य सदाचारसम्पन्न ब्राह्मणोंको भोजन बनाने और तापनेके लिये सदा लकड़ियाँ देता है, उसकी सभी कामनाएँ तथा नाना प्रकारके कार्य सदा ही सिद्ध होते रहते हैं और वह शत्रुओंके ऊपर-ऊपर रहकर अपने तेजस्वी शरीरसे देदीप्यमान होता है ॥ १४-१५ ॥