महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 599, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंविप्रा यदधिगच्छन्ति भिक्षमाणा गृहं सदा ॥ २२ ॥ सत्कृताश्च निवर्तन्ते तदतीव प्रवर्धते । महाभागे कुले प्रेत्य जन्म चाप्नोति भारत ॥ २३ ॥ भारत! ब्राह्मण सब मनुष्योंका अतिथि और सबसे पहले भोजन पानेका अधिकारी है। ब्राह्मण जिस घरपर सदा भिक्षा माँगनेके लिये जाते हैं और वहाँसे सत्कार पाकर लौटते हैं, उस घरकी सम्पत्ति अधिक बढ़ जाती है तथा उस घरका मालिक मरनेके बाद महान् सौभाग्यशाली कुलमें जन्म पाता है ॥
दत्त्वा त्वन्नं नरो लोके तथा स्थानमनुत्तमम् । नित्यं मिष्टान्नदायी तु स्वर्गे वसति सत्कृतः ॥ २४ ॥ जो मनुष्य इस लोकमें सदा अन्न, उत्तम स्थान और मिष्टान्नका दान करता है, वह देवताओंसे सम्मानित होकर स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २४ ॥
अन्नं प्राणा नराणां हि सर्वमन्ने प्रतिष्ठितम् । अन्नदः पशुमान् पुत्री धनवान् भोगवानपि ॥ २५ ॥ प्राणवांश्चापि भवति रूपवांश्च तथा नृप । अन्नदः प्राणदो लोके सर्वदः प्रोच्यते तु सः ॥ २६ ॥ नरेश्वर! अन्न ही मनुष्योंके प्राण हैं, अन्नमें ही सब प्रतिष्ठित है, अतः अन्न दान करनेवाला मनुष्य पशु, पुत्र, धन, भोग, बल और रूप भी प्राप्त कर लेता है। जगत्में अन्न दान करनेवाला पुरुष प्राणदाता और सर्वस्व देनेवाला कहलाता है ॥ २५-२६ ॥
अन्नं हि दत्त्वातिथये ब्राह्मणाय यथाविधि । प्रदाता सुखमाप्नोति दैवतैश्चापि पूज्यते ॥ २७ ॥ अतिथि ब्राह्मणको विधिपूर्वक अन्नदान करके दाता परलोकमें सुख पाता है और देवता भी उसका आदर करते हैं ॥ २७ ॥
ब्राह्मणो हि महद्भूतं क्षेत्रभूतं युधिष्ठिर । उप्यते तत्र यद् बीजं तद्धि पुण्यफलं महत् ॥ २८ ॥ युधिष्ठिर! ब्राह्मण महान् प्राणी एवं उत्तम क्षेत्र है। उसमें जो बीज बोया जाता है, वह महान् पुण्यफल देनेवाला होता है ॥ २८ ॥
प्रत्यक्षं प्रीतिजननं भोक्तुर्दातुर्भवत्युत । सर्वाण्यन्यानि दानानि परोक्षफलवन्त्युत ॥ २९ ॥ अन्नका दान ही एक ऐसा दान है, जो दाता और भोक्ता, दोनोंको प्रत्यक्षरूपसे संतुष्ट करनेवाला होता है। इसके सिवा अन्य जितने दान हैं, उन सबका फल परोक्ष है ॥ २९ ॥
अन्नाद्धि प्रसवं यान्ति रतिरन्नाद्धि भारत । धर्मार्थावन्नतो विद्धि रोगनाशं तथान्नतः ॥ ३० ॥