भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 615, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 615

अतः तिलदान सब दानोंसे बढ़कर है। तिलदान यहाँ सब दानोंमें अक्षय फल देनेवाला बताया जाता है।। उच्छिन्ने तु पुरा हव्ये कुशिकर्षिः परंतपः। तिलैरग्नित्रयं हुत्वा प्राप्तवान् गतिमुत्तमाम्॥ १५॥ पूर्वकालमें परंतप राजर्षि कुशिकने हविष्य समाप्त हो जानेपर तिलोंसे ही हवन करके तीनों अग्नियोंको तृप्त किया था; इससे उन्हें उत्तम गति प्राप्त हुई॥ १५॥ इति प्रोक्तं कुरुश्रेष्ठ तिलदानमनुत्तमम्। विधानं येन विधिना तिलानामिह शस्यते॥ १६॥ कुरुश्रेष्ठ! इस प्रकार जिस विधिके अनुसार तिलदान करना उत्तम माना गया है, वह सर्वोत्तम तिलदानका विधान यहाँ बताया गया॥ १६॥ अत ऊर्ध्वं निबोधेदं देवानां यष्टुमिच्छताम्। समागमे महाराज ब्रह्मणा वै स्वयम्भुवा॥ १७॥ महाराज! इसके बाद यज्ञकी इच्छावाले देवताओं और स्वयम्भू ब्रह्माजीका समागम होनेपर उनमें परस्पर जो बातचीत हुई थी, उसे बता रहा हूँ, इसपर ध्यान दो॥ देवाः समेत्य ब्रह्माणं भूमिभागे यियक्षवः। शुभं देशमयाचन्त यजेम इति पार्थिव॥ १८॥ पृथ्वीनाथ! भूतलके किसी भागमें यज्ञ करनेकी इच्छावाले देवता ब्रह्माजीके पास जाकर किसी शुभ देशकी याचना करने लगे, जहाँ यज्ञ कर सकें॥ १८॥

देवा ऊचुः भगवंस्त्वं प्रभुर्भूमेः सर्वस्य त्रिदिवस्य च। यजेमहि महाभाग यज्ञं भवदनुज्ञया॥ १९॥ **देवता बोले—**भगवन्! महाभाग! आप पृथ्वी और सम्पूर्ण स्वर्गके भी स्वामी हैं; अतः हम आपकी आज्ञा लेकर पृथ्वीपर यज्ञ करेंगे॥ १९॥ नाननुज्ञातभूमिर्हि यज्ञस्य फलमश्नुते। त्वं हि सर्वस्य जगतः स्थावरस्य चरस्य च॥ २०॥ प्रभुर्भवसि तस्मात्त्वं समनुज्ञातुमर्हसि। क्योंकि भूस्वामी जिस भूमिपर यज्ञ करनेकी अनुमति नहीं देता, उस भूमिपर यदि यज्ञ किया जाय तो उसका फल नहीं होता। आप सम्पूर्ण चराचर जगत्के स्वामी हैं; अतः पृथ्वीपर यज्ञ करनेके लिये हमें आज्ञा दीजिये॥

ब्रह्मोवाच ददानि मेदिनीभागं भवद्भ्योऽहं सुरर्षभाः॥ २१॥ यस्मिन् देशे करिष्यध्वं यज्ञान् काश्यपनन्दनाः।