महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्माजीने कहा—काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ॥ २१ १/२॥
देवा ऊचुः
भगवन् कृतकार्याः स्म यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणैः॥ २२॥
इमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्ति नित्यदा।
देवताओंने कहा—भगवन्! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अतः हमारा यज्ञ भी यहीं होगा)॥
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः॥ २३॥
असितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन्।
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम्॥ २४॥
तथा समापयामासुर्यथाकालं सुरर्षभाः।
तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और उन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया॥ २३-२४ १/२॥
त इष्ट्वाज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे॥ २५॥
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे।
पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था॥ २५ १/२॥
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम्॥ २६॥
न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते।
जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है॥ २६ १/२॥
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम्॥ २७॥
प्रदाय सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते।
जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता॥ २७ १/२॥
मुदितो वसति प्राज्ञः शक्रेण सह पार्थिव॥ २८॥
प्रतिश्रयप्रदानाच्च सोऽपि स्वर्गे महीयते।