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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

ब्रह्माजीने कहा—काश्यपनन्दन सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग पृथ्वीके जिस प्रदेशमें यज्ञ करोगे, वही भूभाग मैं तुम्हें दे रहा हूँ॥ २१ १/२॥

देवा ऊचुः
भगवन् कृतकार्याः स्म यक्ष्महे स्वाप्तदक्षिणैः॥ २२॥
इमं तु देशं मुनयः पर्युपासन्ति नित्यदा।
देवताओंने कहा—भगवन्! हमारा कार्य हो गया। अब हम पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञपुरुषका यजन करेंगे। यह जो हिमालयके पासका प्रदेश है, इसका ऋषि-मुनि सदासे ही आश्रय लेते हैं (अतः हमारा यज्ञ भी यहीं होगा)॥
ततोऽगस्त्यश्च कण्वश्च भृगुरत्रिर्वृषाकपिः॥ २३॥
असितो देवलश्चैव देवयज्ञमुपागमन्।
ततो देवा महात्मान ईजिरे यज्ञमच्युतम्॥ २४॥
तथा समापयामासुर्यथाकालं सुरर्षभाः।
तदनन्तर अगस्त्य, कण्व, भृगु, अत्रि, वृषाकपि, असित और देवल देवताओंके उस यज्ञमें उपस्थित हुए। तब महामनस्वी देवताओंने यज्ञपुरुष अच्युतका यजन आरम्भ किया और उन श्रेष्ठ देवगणोंने यथासमय उस यज्ञको समाप्त भी कर दिया॥ २३-२४ १/२॥
त इष्ट्वाज्ञास्त्रिदशा हिमवत्यचलोत्तमे॥ २५॥
षष्ठमंशं क्रतोस्तस्य भूमिदानं प्रचक्रिरे।
पर्वतराज हिमालयके पास यज्ञ पूरा करके देवताओंने भूमिदान भी किया, जो उस यज्ञके छठे भागके बराबर पुण्यका जनक था॥ २५ १/२॥
प्रादेशमात्रं भूमेस्तु यो दद्यादनुपस्कृतम्॥ २६॥
न सीदति स कृच्छ्रेषु न च दुर्गाण्यवाप्नुते।
जिसको खोदखादकर खराब न कर दिया गया हो, ऐसे प्रादेशमात्र भूभागका भी जो दान करता है, वह न तो कभी दुर्गम संकटोंमें पड़ता है और न पड़नेपर कभी दुःखी ही होता है॥ २६ १/२॥
शीतवातातपसहां गृहभूमिं सुसंस्कृताम्॥ २७॥
प्रदाय सुरलोकस्थः पुण्यान्तेऽपि न चाल्यते।
जो सर्दी, गर्मी और हवाके वेगको सहन करनेयोग्य सजी-सजायी गृह-भूमि दान करता है, वह देवलोकमें निवास करता है। पुण्यका भोग समाप्त होनेपर भी वहाँसे हटाया नहीं जाता॥ २७ १/२॥
मुदितो वसति प्राज्ञः शक्रेण सह पार्थिव॥ २८॥
प्रतिश्रयप्रदानाच्च सोऽपि स्वर्गे महीयते।

पृथ्वीनाथ! जो विद्वान् गृहदान करता है, वह भी उसके पुण्यसे इन्द्रके साथ आनन्दपूर्वक निवास करता और स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ १/२ ॥
अध्यापककुले जातः श्रोत्रियो नियतेन्द्रियः ॥ २९ ॥
गृहे यस्य वसेत् तुष्टः प्रधानं लोकमश्नुते ।
अध्यापक-वंशमें उत्पन्न श्रोत्रिय एवं जितेन्द्रिय ब्राह्मण जिसके दिये हुए घरमें प्रसन्नतासे रहता है, उसे श्रेष्ठ लोक प्राप्त होते हैं ॥ २९ १/२ ॥
तथा गवार्थं शरणं शीतवर्षसहं दृढम् ॥ ३० ॥
आसप्तमं तारयति कुलं भरतसत्तम ।
भरतश्रेष्ठ! जो गौओंके लिये सर्दी और वर्षासे बचानेवाला सुदृढ़ निवासस्थान बनवाता है, वह अपनी सात पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ॥ ३० १/२ ॥
क्षेत्रभूमिं ददल्लोके शुभां श्रियमवाप्नुयात् ॥ ३१ ॥
रत्नभूमिं प्रदद्यात् तु कुलवंशं प्रवर्धयेत् ।
खेतके योग्य भूमि दान करनेवाला मनुष्य जगत्‌में शुभ सम्पत्ति प्राप्त करता है और जो रत्नयुक्त भूमिक दान करता है, वह अपने कुलकी वंश-परम्पराको बढ़ाता है ॥ ३१ १/२ ॥
न चोषरां न निर्दग्धां महीं दद्यात् कथंचन ॥ ३२ ॥
न श्मशानपरीतां च न च पापनिषेविताम् ।
जो भूमि ऊसर, जली हुई और श्मशानके निकट हो तथा जहाँ पापी पुरुष निवास करते हों, उसे ब्राह्मणको नहीं देना चाहिये ॥ ३२ १/२ ॥
पारक्ये भूमिदेशे तु पितॄणां निर्वपेत् तु यः ॥ ३३ ॥
तद्भूमिं वापि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते ।
जो परायी भूमिमें पितरोंके लिये श्राद्ध करता है, अथवा जो उस भूमिको पितरोंके लिये दानमें देता है, उसके वे श्राद्धकर्म और दान दोनों ही नष्ट होते (निष्फल हो जाते) हैं ॥ ३३ १/२ ॥
तस्मात् क्रीत्वा महीं दद्यात् स्वल्पामपि विचक्षणः ॥ ३४ ॥
पिण्डः पितृभ्यो दत्तो वै तस्यां भवति शाश्वतः ।
अतः विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह थोड़ी-सी भी भूमि खरीदकर उसका दान करे। खरीदकर अपनी की हुई भूमिमें ही पितरोंको दिया हुआ पिण्ड सदा स्थिर रहनेवाला होता है ॥ ३४ १/२ ॥
अटवीपर्वताश्चैव नद्यस्तीर्थानि यानि च ॥ ३५ ॥
सर्वाण्यस्वामिकान्याहुर्न हि तत्र परिग्रहः ।
इत्येतद् भूमिदानस्य फलमुक्तं विशाम्पते ॥ ३६ ॥

वन, पर्वत, नदी और तीर्थ—ये सब स्थान किसी स्वामीके अधीन नहीं होते हैं (इन्हें सार्वजनिक माना जाता है)। इसलिये वहाँ श्राद्ध करनेके लिये भूमि खरीदनेकी आवश्यकता नहीं है। प्रजानाथ! इस प्रकार यह भूमिदानका फल बताया गया है।। ३५-३६ ।।

अतः परं तु गोदानं कीर्तयिष्यामि तेऽनघ ।
गावोऽधिकास्तपस्विभ्यो यस्मात् सर्वेभ्य एव च ।। ३७ ।।
तस्मान्महेश्वरो देवस्तपस्ताभिः सहास्थितः ।
अनघ! इसके बाद मैं तुम्हें गोदानका माहात्म्य बताऊँगा। गौएँ समस्त तपस्वियोंसे बढ़कर हैं; इसलिये भगवान् शंकरने गौओंके साथ रहकर तप किया था।। ३७ १/२ ।।

ब्राह्मो लोके वसन्त्येताः सोमेन सह भारत ।। ३८ ।।
यां तां ब्रह्मर्षयः सिद्धाः प्रार्थयन्ति परां गतिम् ।
भारत! ये गौएँ चन्द्रमाके साथ उस ब्रह्मलोकमें निवास करती हैं, जो परमगतिरूप है और जिसे सिद्ध ब्रह्मर्षि भी प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं।। ३८ १/२ ।।

पयसा हविषा दध्ना शकृता चाथ चर्मणा ।। ३९ ।।
अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति शृंगैर्वालैश्च भारत ।
भरतनन्दन! ये गौएँ अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालोंसे भी जगत्का उपकार करती रहती हैं।। ३९ १/२ ।।

नासां शीतातपौ स्यातां सदैताः कर्म कुर्वते ।। ४० ।।
न वर्षविषयं वापि दुःखमासां भवत्युत ।
ब्राह्मणैः सहिता यान्ति तस्मात् पारमकं पदम् ।। ४१ ।।
इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षाका भी कष्ट नहीं होता है। ये सदा ही अपना काम किया करती हैं। इसलिये ये ब्राह्मणोंके साथ परमपदस्वरूप ब्रह्मलोकमें चली जाती हैं।। ४०-४१ ।।

एकं गोब्राह्मणं तस्मात् प्रवदन्ति मनीषिणः ।
रन्तिदेवस्य यज्ञे ताः पशुत्वेनोपकल्पिताः ।। ४२ ।।
अतश्चर्मण्वती राजन् गोचर्मभ्यः प्रवर्तिता ।
पशुत्वाच्च विनिर्मुक्ताः प्रदानायोपकल्पिताः ।। ४३ ।।
इसीसे गौ और ब्राह्मणको मनस्वी पुरुष एक बताते हैं। राजन्! राजा रन्तिदेवके यज्ञमें वे पशुरूपसे दान देनेके लिये निश्चित की गयी थीं; अतः गौओंके चमड़ोंसे वह चर्मण्वती नामक नदी प्रवाहित हुई थी। वे सभी गौएँ पशुत्वसे विमुक्त थीं और दान देनेके लिये नियत की गयी थीं।। ४२-४३ ।।

ता इमा बिप्रमुख्येभ्यो यो ददाति महीपते ।
निस्तरेदापदं कृच्छ्रां विषमस्थोऽपि पार्थिव ।। ४४ ।।

भूपाल! पृथ्वीनाथ! जो श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको इन गौओंका दान करता है, वह संकटमें पड़ा हो तो भी उस भारी विपत्तिसे उद्धार पा लेता है॥ ४४ ॥
गवां सहस्रदः प्रेत्य नरकं न प्रपद्यते ।
सर्वत्र विजयं चापि लभते मनुजाधिप ॥ ४५ ॥
जो एक सहस्र गोदान कर देता है, वह मरनेके बाद नरकमें नहीं पड़ता। नरेश्वर! उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती है॥ ४५ ॥
अमृतं वै गवां क्षीरमित्याह त्रिदशाधिपः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुममृतं स प्रयच्छति ॥ ४६ ॥
देवराज इन्द्रने कहा है कि 'गौओंका दूध अमृत है'; जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह अमृत दान करता है॥ ४६ ॥
अग्नीनामव्ययं ह्येतद्धौम्यं वेदविदो विदुः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं स हौम्यं सम्प्रयच्छति ॥ ४७ ॥
वेदवेत्ता पुरुषोंका अनुभव है कि 'गोदुग्धरूप हविष्यका यदि अग्निमें हवन किया जाय तो वह अविनाशी फल देता है।' अतः जो धेनु दान करता है, वह हविष्यका ही दान करता है॥ ४७ ॥
स्वर्गो वै मूर्तिमानेष वृषभं यो गवां पतिम् ।
विप्रे गुणयुते दद्यात् स वै स्वर्गे महीयते ॥ ४८ ॥
बैल स्वर्गका मूर्तिमान् स्वरूप है। जो गौओंके पति—साँड़का गुणवान् ब्राह्मणको दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ ४८ ॥
प्राणा वै प्राणिनामेते प्रोच्यन्ते भरतर्षभ ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं प्राणानेष प्रयच्छति ॥ ४९ ॥
भरतश्रेष्ठ! ये गौएँ प्राणियों (को दूध पिलाकर पालनेके कारण उन) के प्राण कहलाती हैं; इसलिये जो दूध देनेवाली गौका दान करता है, वह मानो प्राण दान देता है॥ ४९ ॥
गावः शरण्या भूतानामिति वेदविदो विदुः ।
तस्माद् ददाति यो धेनुं शरणं सम्प्रयच्छति ॥ ५० ॥
वेदवेत्ता विद्वान् ऐसा मानते हैं कि 'गौएँ समस्त प्राणियोंको शरण देनेवाली हैं।' इसलिये जो धेनु दान करता है, वह सबको शरण देनेवाला है॥ ५० ॥
न वधार्थं प्रदातव्या न कीनाशे न नास्तिके ।
गोजीविने न दातव्या तथा गौर्भरतर्षभ ॥ ५१ ॥
(गोरसानां न विक्रेतुरपञ्चयजनस्य च ।)
भरतश्रेष्ठ! जो मनुष्य वध करनेके लिये गौ माँग रहा हो, उसे कदापि गाय नहीं देनी चाहिये। इसी प्रकार कसाईको, नास्तिकको, गायसे ही जीविका चलानेवालेको, गोरस बेचनेवाले और पंचयज्ञ न करनेवालेको भी गाय नहीं देनी चाहिये॥ ५१ ॥

ददत् स तादृशानां वै नरो गां पापकर्मणाम्। अक्षयं नरकं यातीत्येवमाहुर्महर्षयः ॥ ५२ ॥ ऐसे पापकर्मों मनुष्योंको जो गाय देता है, वह मनुष्य अक्षय नरकमें गिरता है, ऐसा महर्षियोंका कथन है ॥ ५२ ॥

न कृशां नापवत्सां वा वन्ध्यां रोगान्वितां तथा। न व्यंगां न परिश्रान्तां दद्याद् गां ब्राह्मणाय वै ॥ ५३ ॥ जो दुबली हो, जिसका बछड़ा मर गया हो तथा जो ठाँठ, रोगिणी, किसी अंगसे हीन और थकी हुई (बूढ़ी) हो, ऐसी गौ ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये ॥ ५३ ॥

दशगोसहस्रदो हि शक्रेण सह मोदते। अक्षयाँल्लभते लोकान् नरः शतसहस्रशः ॥ ५४ ॥ दस हजार गोदान करनेवाला मनुष्य इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगता है और जो लाख गौओंका दान कर देता है, उस मनुष्यको अक्षय लोक प्राप्त होते हैं ॥

इत्येतद् गोप्रदानं च तिलदानं च कीर्तितम्। तथा भूमिप्रदानं च शृणुष्वान्ने च भारत ॥ ५५ ॥ भारत! इस प्रकार गोदान, तिलदान और भूमिदानका महत्त्व बतलाया गया। अब पुनः अन्नदानकी महिमा सुनो ॥

अन्नदानं प्रधानं हि कौन्तेय परिचक्षते। अन्नस्य हि प्रदानेन रन्तिदेवो दिवं गतः ॥ ५६ ॥ कुन्तीनन्दन! विद्वान् पुरुष अन्नदानको सब दानोंमें प्रधान बताते हैं। अन्नदान करनेसे ही राजा रन्तिदेव स्वर्गलोकमें गये थे ॥ ५६ ॥

श्रान्ताय क्षुधितायान्नं यः प्रयच्छति भूमिपः। स्वायम्भुवं महत् स्थानं स गच्छति नराधिप ॥ ५७ ॥ नरेश्वर! जो भूमिपाल थके-माँदे और भूखे मनुष्यको अन्न देता है, वह ब्रह्माजीके परमधाममें जाता है ॥ ५७ ॥

न हिरण्यैर्न वासोभिर्नान्यदानेन भारत। प्राप्नुवन्ति नराः श्रेयो यथा ह्यन्नप्रदाः प्रभो ॥ ५८ ॥ भरतनन्दन! प्रभो! अन्नदान करनेवाले मनुष्य जिस तरह कल्याणके भागी होते हैं, वैसा कल्याण उन्हें सुवर्ण, वस्त्र तथा अन्य वस्तुओंके दानसे नहीं प्राप्त होता है ॥ ५८ ॥

अन्नं वै प्रथमं द्रव्यमन्नं श्रीश्च परा मता। अन्नात् प्राणः प्रभवति तेजो वीर्यं बलं तथा ॥ ५९ ॥ अन्न प्रथम द्रव्य है। वह उत्तम लक्ष्मीका स्वरूप माना गया है। अन्नसे ही प्राण, तेज, वीर्य और बलकी पुष्टि होती है ॥ ५९ ॥

सद्यो ददाति यश्चान्नं सदैकाग्रमना नरः।

न स दुर्गाण्यवाप्नोतीत्येवमाह पराशरः ॥ ६० ॥
पराशर मुनिका कथन है कि 'जो मनुष्य सदा एकाग्रचित्त होकर याचकको तत्काल अन्नका दान करता है, उसपर कभी दुर्गम संकट नहीं पड़ता' ॥ ६० ॥
अर्चयित्वा यथान्यायं देवेभ्योऽन्नं निवेदयेत् ।
यदन्ना हि नरा राजंस्तदन्नास्तस्य देवताः ॥ ६१ ॥
राजन्! मनुष्यको प्रतिदिन शास्त्रोक्त विधिसे देवताओंकी पूजा करके उन्हें अन्न निवेदन करना चाहिये। जो पुरुष जिस अन्नका भोजन करता है, उसके देवता भी वही अन्न ग्रहण करते हैं ॥ ६१ ॥
कौमुदे शुक्लपक्षे तु योऽन्नदानं करोत्युत ।
स संतरति दुर्गाणि प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते ॥ ६२ ॥
जो कार्तिक मासके शुक्लपक्षमें अन्नका दान करता है, वह दुर्गम संकटसे पार हो जाता है और मरकर अक्षय सुखका भागी होता है ॥ ६२ ॥
अभुक्त्वातिथये चान्नं प्रयच्छेद् यः समाहितः ।
स वै ब्रह्मविदां लोकान् प्राप्नुयाद् भरतर्षभ ॥ ६३ ॥
भरतश्रेष्ठ! जो पुरुष एकाग्रचित्त हो स्वयं भूखा रहकर अतिथिको अन्नदान करता है, वह ब्रह्मवेत्ताओंके लोकोंमें जाता है ॥ ६३ ॥
सुकृच्छ्रामापदं प्राप्तश्चान्नदः पुरुषस्तरेत् ।
पापं तरति चैवेह दुष्कृतं चापकर्षति ॥ ६४ ॥
अन्नदाता मनुष्य कठिन-से-कठिन आपत्तिमें पड़नेपर भी उस आपत्तिसे पार हो जाता है। वह पापसे उद्धार पा जाता है और भविष्यमें होनेवाले दुष्कर्मोंका भी नाश कर देता है ॥ ६४ ॥
इत्येतदन्नदानस्य तिलदानस्य चैव ह ।
भूमिदानस्य च फलं गोदानस्य च कीर्तितम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार मैंने यह अन्नदान, तिलदान, भूमिदान और गोदानका फल बताया है ॥ ६५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः ॥ ६६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/४ श्लोक मिलाकर कुल ६५ ३/४ श्लोक हैं)

अध्याय (पृष्ठ 622)

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सप्तषष्टितमोऽध्यायः

अन्न और जलके दानकी महिमा

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतं दानफलं तात यत् त्वया परिकीर्तितम् ।
अन्नदानं विशेषेण प्रशस्तमिह भारत ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— तात! भरतनन्दन! आपने जो दानोंका फल बताया है, उसे मैंने सुन लिया। यहाँ अन्नदानकी विशेषरूपसे प्रशंसा की गयी है ॥ १ ॥

पानीयदानमेवैतत् कथं चेह महाफलम् ।
इत्येतच्छ्रोतुमिच्छामि विस्तरेण पितामह ॥ २ ॥
पितामह! अब जलदान करनेसे कैसे महान् फलकी प्राप्ति होती है, इस विषयको मैं विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

हन्त ते वर्तयिष्यामि यथावद् भरतर्षभ ।
गदतस्तन्ममाद्येह शृणु सत्यपराक्रम ॥ ३ ॥
भीष्मजी कहते हैं— सत्यपराक्रमी भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें सब कुछ यथार्थ रूपसे बताऊँगा। तुम आज यहाँ मेरे मुँहसे इन सब बातोंको सुनो ॥ ३ ॥

पानीयदानात् प्रभृति सर्वं वक्ष्यामि तेऽनघ ।
यदन्नं यच्च पानीयं सम्प्रदायाश्नुते नरः ॥ ४ ॥
अनघ! जलदानसे लेकर सब प्रकारके दानोंका फल मैं तुम्हें बताऊँगा। मनुष्य अन्न और जलका दान करके जिस फलको पाता है, वह सुनो ॥ ४ ॥

न तस्मात् परमं दानं किंचिदस्तीति मे मनः ।
अन्नात् प्राणभृतस्तात प्रवर्तन्ते हि सर्वशः ॥ ५ ॥
तात! मेरे मनमें यह धारणा है कि अन्न और जलके दानसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं है; क्योंकि अन्नसे ही सब प्राणी उत्पन्न होते और जीवन धारण करते हैं ॥ ५ ॥

तस्मादन्नं परं लोके सर्वलोकेषु कथ्यते ।
अन्नाद् बलं च तेजश्च प्राणिनां वर्धते सदा ॥ ६ ॥
अन्नदानमतस्तस्माच्छ्रेष्ठमाह प्रजापतिः ।
इसलिये लोकमें तथा सम्पूर्ण मनुष्योंमें अन्नको ही सबसे उत्तम बताया गया है। अन्नसे ही सदा प्राणियोंके तेज और बलकी वृद्धि होती है; अतः प्रजापतिने अन्नके दानको ही सर्वश्रेष्ठ बतलाया है ॥ ६ १/२ ॥

सावित्र्या ह्यपि कौन्तेय श्रुतं ते वचनं शुभम् ।। ७ ।। यतश्च यद् यथा चैव देवसत्रे महामते । कुन्तीनन्दन! तुमने सावित्रीके शुभ वचनको भी सुना है। महामते देवताओंके यज्ञमें जिस हेतुसे और जिस प्रकार जो वचन सावित्रीने कहा था, वह इस प्रकार है— ।। ७ १/२ ।। अन्ने दत्ते नरेणेह प्राणा दत्ता भवन्त्युत ।। ८ ।। प्राणदानाद्धि परमं न दानमिह विद्यते । श्रुतं हि ते महाबाहो लोमशस्यापि तद्वचः ।। ९ ।। ‘जिस मनुष्यने यहाँ किसीको अन्न दिया है, उसने मानो प्राण दे दिये और प्राणदानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है।' महाबाहो! इस विषयमें तुमने लोमशका भी वह वचन सुना ही है ।। ८-९ ।। प्राणान् दत्त्वा कपोताय यत् प्राप्तं शिबिना पुरा । तां गतिं लभते दत्त्वा द्विजस्यान्नं विशाम्पते ।। १० ।। प्रजानाथ! पूर्वकालमें राजा शिबिने कबूतरके लिये प्राणदान देकर जो उत्तम गति प्राप्त की थी, ब्राह्मणको अन्न देकर दाता उसी गतिको प्राप्त कर लेता है ।। १० ।। तस्माद् विशिष्टां गच्छन्ति प्राणदा इति नःश्रुतम् । अन्नं वापि प्रभवति पानीयात् कुरुसत्तम । नीरजातेन हि विना न किंचित् सम्प्रवर्तते ।। ११ ।। कुरुश्रेष्ठ! अतः प्राणदान करनेवाले पुरुष श्रेष्ठ गतिको प्राप्त होते हैं—ऐसा हमने सुना है। किंतु अन्न भी जलसे ही पैदा होता है। जलराशिसे उत्पन्न हुए धान्यके बिना कुछ भी नहीं हो सकता ।। ११ ।। नीरजातश्च भगवान् सोमो ग्रहगणेश्वरः । अमृतं च सुधा चैव स्वाहा चैव स्वधा तथा ।। १२ ।। अन्नौषध्यो महाराज वीरुधश्च जलोद्भवाः । यतः प्राणभृतां प्राणाः सम्भवन्ति विशाम्पते ।। १३ ।। महाराज! ग्रहोंके अधिपति भगवान् सोम जलसे ही प्रकट हुए हैं। प्रजानाथ! अमृत, सुधा, स्वाहा, स्वधा, अन्न, ओषधि, तृण और लताएँ भी जलसे उत्पन्न हुई हैं, जिनसे समस्त प्राणियोंके प्राण प्रकट एवं पुष्ट होते हैं ।। १२-१३ ।। देवानाममृतं ह्यन्नं नागानां च सुधा तथा । पितॄणां च स्वधा प्रोक्ता पशूनां चापि वीरुधः ।। १४ ।। देवताओंका अन्न अमृत, नागोंका अन्न सुधा, पितरोंका अन्न स्वधा और पशुओंका अन्न तृण-लता आदि है ।। १४ ।। अन्नमेव मनुष्याणां प्राणानाहुर्मनीषिणः । तच्च सर्वं नरव्याघ्र पानीयात् सम्प्रवर्तते ।। १५ ।।

तस्मात् पानीयदानाद् वै न परं विद्यते क्वचित् । मनीषी पुरुषोंने अन्नको ही मनुष्योंका प्राण बताया है। पुरुषसिंह! सब प्रकारका अन्न (खाद्य पदार्थ) जलसे ही उत्पन्न होता है; अतः जलदानसे बढ़कर दूसरा कोई दान कहीं नहीं है॥ १५ १/२॥ तच्च दद्यान्नरो नित्यं यदिच्छेद् भूतिमात्मनः ॥ १६ ॥ धन्यं यशस्यमायुष्यं जलदानमिहोच्यते । शत्रूंश्चाप्यधि कौन्तेय सदा तिष्ठति तोयदः ॥ १७ ॥ जो मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, उसे प्रतिदिन जलदान करना चाहिये। जलदान इस जगत्में धन, यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला बताया जाता है। कुन्तीनन्दन! जलदान करनेवाला पुरुष सदा अपने शत्रुओंसे भी ऊपर रहता है॥ १६-१७॥ सर्वकामानवाप्नोति कीर्तिं चैव हि शाश्वतीम् । प्रेत्य चानन्त्यमश्नाति पापेभ्यश्च प्रमुच्यते ॥ १८ ॥ वह इस जगत्में सम्पूर्ण कामनाओं तथा अक्षय कीर्तिको प्राप्त करता है और सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। मृत्युके पश्चात् वह अक्षय सुखका भागी होता है॥ तोयदो मनुजव्याघ्र स्वर्गं गत्वा महाद्युते । अक्षयान् समवाप्नोति लोकानित्यब्रवीन्मनुः ॥ १९ ॥ महातेजस्वी पुरुषसिंह! जलदान करनेवाला पुरुष स्वर्गमें जाकर वहाँके अक्षय लोकोंपर अधिकार प्राप्त करता है—ऐसा मनुने कहा है॥ १९॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पानीयदानमाहात्म्ये सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें जलदानका माहात्म्यविषयक सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ६७॥

तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

तिल, जल, दीप तथा रत्न आदिके दानका माहात्म्य—धर्मराज और ब्राह्मणका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

तिलानां कीदृशं दानमथ दीपस्य चैव हि ।
अन्नानां वाससां चैव भूय एव ब्रवीहि मे ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! तिलोंके दानका कैसा फल होता है? दीप, अन्न और वस्त्रके दानकी महिमाका भी पुनः मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
ब्राह्मणस्य च संवादं यमस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें ब्राह्मण और यमके संवादरूप प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥

मध्यदेशे महान् ग्रामो ब्राह्मणानां बभूव ह ।
गंगायामुनयोर्मध्ये यामुनस्य गिरेरधः ॥ ३ ॥
पर्णशालेति विख्यातो रमणीयो नराधिप ।
विद्वांसस्तत्र भूयिष्ठा ब्राह्मणाश्चावसंस्तथा ॥ ४ ॥
नरेश्वर! मध्यदेशमें गंगा-यमुनाके मध्यभागमें यामुन पर्वतके निम्न स्थलमें ब्राह्मणोंका एक विशाल एवं रमणीय ग्राम था जो लोगोंमें पर्णशालानामसे विख्यात था। वहाँ बहुत-से विद्वान् ब्राह्मण निवास करते थे ॥ ३-४ ॥

अथ प्राह यमः कंचित् पुरुषं कृष्णवाससम् ।
रक्ताक्षमूर्ध्वरोमाणं काकजंघाक्षिनासिकम् ॥ ५ ॥
एक दिन यमराजने काला वस्त्र धारण करनेवाले अपने एक दूतसे, जिसकी आँखें लाल, रोएँ ऊपरको उठे हुए और पैरोंकी पिण्डली, आँख एवं नाक कौएके समान थीं, कहा— ॥ ५ ॥

गच्छ त्वं ब्राह्मणग्रामं ततो गत्वा तमानय ।
अगस्त्यं गोत्रतश्चापि नामतश्चापि शर्मिणम् ॥ ६ ॥
शमे निविष्टं विद्वांसमध्यापकमनावृतम् ।
‘तुम ब्राह्मणोंके उस ग्राममें चले जाओ और जाकर अगस्त्यगोत्री शर्मी नामक शमपरायण विद्वान् अध्यापक ब्राह्मणको, जो आवरणरहित है, यहाँ ले आओ ॥ ६ १/२ ॥

मा चान्यमानयेथास्त्वं सगोत्रं तस्य पार्श्वतः ॥ ७ ॥
स हि तादृग्गुणस्तेन तुल्योऽध्ययनजन्मना ।
अपत्येषु तथा वृत्ते समस्तेनैव धीमता ॥ ८ ॥
‘उसी गाँवमें उसीके समान एक दूसरा ब्राह्मण भी रहता है। वह शर्मीके ही गोत्रका है। उसके अगल-बगलमें ही निवास करता है। गुण, वेदाध्ययन और कुलमें भी वह शर्मीके ही समान है। सन्तानोंकी संख्या तथा सदाचारके पालनमें भी वह बुद्धिमान् शर्मीके ही तुल्य है। तुम उसे यहाँ न ले आना ॥ ७-८ ॥
तमानय यथोद्दिष्टं पूजा कार्या हि तस्य वै ।
स गत्वा प्रतिकूलं तच्चकार यमशासनम् ॥ ९ ॥
‘मैंने जिसे बताया है, उसी ब्राह्मणको तुम यहाँ ले आओ; क्योंकि मुझे उसकी पूजा करनी है।’ उस यमदूतने वहाँ जाकर यमराजकी आज्ञाके विपरीत कार्य किया ॥ ९ ॥
तमाक्रम्यानयामास प्रतिषिद्धो यमेन यः ।
तस्मै यमः समुत्थाय पूजां कृत्वा च वीर्यवान् ॥ १० ॥
प्रोवाच नीयतामेष सोऽन्य आनीयतामिति ।
वह आक्रमण करके उसी ब्राह्मणको उठा लाया, जिसके लिये यमराजने मना कर दिया था। शक्तिशाली यमराजने उठकर उसके लाये हुए ब्राह्मणकी पूजा की और दूतसे कहा—‘इसको तुम ले जाओ और दूसरेको यहाँ ले आओ’ ॥ १०½ ॥
एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन स द्विजः ॥ ११ ॥
उवाच धर्मराजानं निर्विण्णोऽध्ययनेन वै ।
यो मे कालो भवेच्छेषस्तं वसेयमिहाच्युत ॥ १२ ॥
धर्मराजके इस प्रकार आदेश देनेपर अध्ययनसे ऊबे हुए उस समागत ब्राह्मणने उनसे कहा—‘धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले देव! मेरे जीवनका जो समय शेष रह गया है, उसमें मैं यहीं रहूँगा’ ॥ ११-१२ ॥

यम उवाच
नाहं कालस्य विहितं प्राप्नोमीह कथंचन ।
यो हि धर्मं चरति वै तं तु जानामि केवलम् ॥ १३ ॥
**यमराजने कहा—**ब्रह्मन्! मैं कालके विधानको किसी तरह नहीं जानता। जगत्में जो पुरुष धर्माचरण करता है, केवल उसीको मैं जानता हूँ ॥ १३ ॥
गच्छ विप्र त्वमद्यैव आलयं स्वं महाद्युते ।
ब्रूहि सर्वं यथा स्वैरं करवाणि किमच्युत ॥ १४ ॥
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले महातेजस्वी ब्राह्मण! तुम अभी अपने घरको चले जाओ और अपनी इच्छाके अनुसार सब कुछ बताओ। मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? ॥ १४ ॥

ब्राह्मण उवाच

यत् तत्र कृत्वा सुमहत् पुण्यं स्यात् तद् ब्रवीहि मे।
सर्वस्य हि प्रमाणं त्वं त्रैलोक्यस्यापि सत्तम॥ १५॥
ब्राह्मणने कहा— साधुशिरोमणे! संसारमें जो कर्म करनेसे महान् पुण्य होता हो वह मुझे बताइये; क्योंकि समस्त त्रिलोकीके लिये धर्मके विषयमें आप ही प्रमाण हैं॥ १५॥

यम उवाच

शृणु तत्त्वेन विप्रर्षे प्रदानविधिमुत्तमम्।
तिलाः परमकं दानं पुण्यं चैवेह शाश्वतम्॥ १६॥
यमने कहा— ब्रह्मर्षे! तुम यथार्थरूपसे दानकी उत्तम विधि सुनो। तिलका दान सब दानोंमें उत्तम है। वह यहाँ अक्षय पुण्यजनक माना गया है॥ १६॥

तिलाश्च सम्प्रदातव्या यथाशक्ति द्विजर्षभ।
नित्यदानात् सर्वकामांस्तिला निर्वर्तयन्त्युत॥ १७॥
द्विजश्रेष्ठ! अपनी शक्तिके अनुसार तिलोंका दान अवश्य करना चाहिये। नित्यदान करनेसे तिल दाताकी सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण कर देते हैं॥ १७॥

तिलान् श्राद्धे प्रशंसन्ति दानमेतद्ध्यनुत्तमम्।
तान् प्रयच्छस्व विप्रेभ्यो विधिदृष्टेन कर्मणा॥ १८॥
श्राद्धमें विद्वान् पुरुष तिलोंकी प्रशंसा करते हैं। यह तिलदान सबसे उत्तम दान है। अतः तुम शास्त्रीय विधिके अनुसार ब्राह्मणोंको तिलदान देते रहो॥ १८॥

वैशाख्यां पौर्णमास्यां तु तिलान् दद्याद् द्विजातिषु।
तिला भक्षयितव्याश्च सदा त्वालम्भनं च तैः॥ १९॥
वैशाखकी पूर्णिमाको ब्राह्मणोंके लिये तिलदान दे, तिल खाये और सदा तिलोंका ही उबटन लगाये॥ १९॥

कार्यं सततमिच्छद्भिः श्रेयः सर्वात्मना गृहे।
तथाऽऽपः सर्वदा देयाः पेयाश्चैव न संशयः॥ २०॥
जो सदा कल्याणकी इच्छा रखते हैं, उन्हें सब प्रकारसे अपने घरमें तिलोंका दान और उपयोग करना चाहिये। इसी प्रकार सर्वदा जलका दान और पान करना चाहिये—इसमें संशय नहीं है॥ २०॥

पुष्करिण्यस्तडागानि कूंपांश्चैवात्र खानयेत्।
एतत् सुदुर्लभतरमिहलोके द्विजोत्तम॥ २१॥
द्विजश्रेष्ठ! मनुष्यको यहाँ पोखरी, तालाब और कुएँ खुदवाने चाहिये। यह इस संसारमें अत्यन्त दुर्लभ—पुण्य कार्य है॥ २१॥

आपो नित्यं प्रदेयास्ते पुण्यं ह्येतदनुत्तमम्।

प्रपाश्च कार्या दानार्थं नित्यं ते द्विजसत्तम ।
भुक्तेऽप्यन्नं प्रदेयं तु पानीयं वै विशेषतः ॥ २२ ॥
विप्रवर! तुम्हें प्रतिदिन जलका दान करना चाहिये। जल देनेके लिये प्याऊ लगाने चाहिये। यह सर्वोत्तम पुण्य कार्य है। (भूखेको अन्न देना तो आवश्यक है ही,) जो भोजन कर चुका हो उसे भी अन्न देना चाहिये। विशेषतः जलका दान तो सभीके लिये आवश्यक है ॥ २२ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्ते स तदा तेन यमदूतेन वै गृहान् ।
नीतश्च कारयामास सर्वं तद् यमशासनम् ॥ २३ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! यमराजके ऐसा कहनेपर उस समय ब्राह्मण जानेको उद्यत हुआ। यमदूतने उसे उसके घर पहुँचा दिया और उसने यमराजकी आज्ञाके अनुसार वह सब पुण्य कार्य किया और कराया ॥ २३ ॥
नीत्वा तं यमदूतोऽपि गृहीत्वा शर्मिणं तदा ।
ययौ स धर्मराजाय न्यवेदयत चापि तम् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् यमदूत शर्मीको पकड़कर वहाँ ले गया और धर्मराजको इसकी सूचना दी ॥ २४ ॥
तं धर्मराजो धर्मज्ञं पूजयित्वा प्रतापवान् ।
कृत्वा च संविदं तेन विससर्ज यथागतम् ॥ २५ ॥
प्रतापी धर्मराजने उस धर्मज्ञ ब्राह्मणकी पूजा करके उससे बातचीत की और फिर वह जैसे आया था, उसी प्रकार उसे विदा कर दिया ॥ २५ ॥
तस्यापि च यमः सर्वमुपदेशं चकार ह ।
प्रेत्यैत्य च ततः सर्वं चकारोक्तं यमेन तत् ॥ २६ ॥
उसके लिये भी यमराजने सारा उपदेश किया। परलोकमें जाकर जब वह लौटा, तब उसने भी यमराजके बताये अनुसार सब कार्य किया ॥ २६ ॥
तथा प्रशंसते दीपान् यमः पितृहितेप्सया ।
तस्माद् दीपप्रदो नित्यं संतारयति वै पितॄन् ॥ २७ ॥
पितरोंके हितकी इच्छासे यमराज दीपदानकी प्रशंसा करते हैं; अतः प्रतिदिन दीपदान करनेवाला मनुष्य पितरोंका उद्धार कर देता है ॥ २७ ॥
दातव्याः सततं दीपास्तस्माद् भरतसत्तम ।
देवतानां पितॄणां च चक्षुष्यं चात्मनां विभो ॥ २८ ॥
इसलिये भरतश्रेष्ठ! देवता और पितरोंके उद्देश्यसे सदा दीपदान करते रहना चाहिये। प्रभो! इससे अपने नेत्रोंका तेज बढ़ता है ॥ २८ ॥

रत्नदानं च सुमहत् पुण्यमुक्तं जनाधिप । यस्तान् विक्रीय यजते ब्राह्मणो ह्यभयंकरम् ॥ २९ ॥ जनेश्वर! रत्नदानका भी बहुत बड़ा पुण्य बताया गया है। जो ब्राह्मण दानमें मिले हुए रत्नको बेचकर उसके द्वारा यज्ञ करता है, उसके लिये वह प्रतिग्रह भयदायक नहीं होता ॥ २९ ॥

यद् वै ददाति विप्रेभ्यो ब्राह्मणः प्रतिगृह्य वै । उभयोः स्यात् तदक्षय्यं दातुरादातुरेव च ॥ ३० ॥ जो ब्राह्मण किसी दातासे रत्नोंका दान लेकर स्वयं भी उसे ब्राह्मणोंको बाँट देता है तो उस दानके देने और लेनेवाले दोनोंको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है ॥ ३० ॥

यो ददाति स्थितः स्थित्यां तादृशाय प्रतिग्रहम् । उभयोरक्षयं धर्मं तं मनुः प्राह धर्मवित् ॥ ३१ ॥ जो पुरुष स्वयं धर्ममर्यादामें स्थित होकर अपने ही समान स्थितिवाले ब्राह्मणको दानमें मिली हुई वस्तुका दान करता है, उन दोनोंको अक्षय धर्मकी प्राप्ति होती है। यह धर्मज्ञ मनुका वचन है ॥ ३१ ॥

वाससां सम्प्रदानेन स्वदारनिरतो नरः । सुवस्त्रश्च सुवेषश्च भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ ३२ ॥ जो मनुष्य अपनी ही स्त्रीमें अनुराग रखता हुआ वस्त्र दान करता है, वह सुन्दर वस्त्र और मनोहर वेष-भूषासे सम्पन्न होता है—ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ३२ ॥

गावः सुवर्णं च तथा तिलाश्चैवानुवर्णिताः । बहुशः पुरुषव्याघ्र वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ ३३ ॥ पुरुषसिंह! मैंने गौ, सुवर्ण और तिलके दानका माहात्म्य अनेकों बार वेद-शास्त्रके प्रमाण दिखाकर वर्णन किया है ॥ ३३ ॥

विवाहांश्चैव कुर्वीत पुत्रानुत्पादयेत च । पुत्रलाभो हि कौरव्य सर्वलाभाद् विशिष्यते ॥ ३४ ॥ कुरुनन्दन! मनुष्य विवाह करे और पुत्र उत्पन्न करे। पुत्रका लाभ सब लाभोंसे बढ़कर है ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि यमब्राह्मणसंवादे अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें यम और ब्राह्मणका संवादविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६८ ॥

युधिष्ठिरने कहा— महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठ! आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये। विशेषतः भूमिदानका महत्त्व बताइये ॥ १ ॥

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एकोनसप्ततितमोऽध्यायः

गोदानकी महिमा तथा गौओं और ब्राह्मणोंकी रक्षासे पुण्यकी प्राप्ति

युधिष्ठिर उवाच

भूय एव कुरुश्रेष्ठ दानानां विधिमुत्तमम् ।
कथयस्व महाप्राज्ञ भूमिदानं विशेषतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— महाप्राज्ञ कुरुश्रेष्ठ! आप दानकी उत्तम विधिका फिरसे वर्णन कीजिये। विशेषतः भूमिदानका महत्त्व बताइये ॥ १ ॥
पृथिवीं क्षत्रियो दद्याद् ब्राह्मणायेष्टिकर्मिणे ।
विधिवत् प्रतिगृह्णीयान्न त्वन्यो दातुमर्हति ॥ २ ॥
केवल क्षत्रिय राजा ही यज्ञ करनेवाले ब्राह्मणको पृथ्वीका दान कर सकता है और उसीसे ब्राह्मण विधि-पूर्वक भूमिका प्रतिग्रह ले सकता है। दूसरा कोई यह दान नहीं कर सकता ॥ २ ॥
सर्ववर्णैस्तु यच्छक्यं प्रदातुं फलकाङ्क्षिभिः ।
वेदे वा यत् समाख्यातं तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥
दानके फलकी इच्छा रखनेवाले सभी वर्णोंके लोग जो दान कर सकें अथवा वेदमें जिस दानका वर्णन हो, उसकी मेरे समक्ष व्याख्या कीजिये ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

तुल्यनामानि देयानि त्रीणि तुल्यफलानि च ।
सर्वकामफलानीह गावः पृथ्वी सरस्वती ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! गाय, भूमि और सरस्वती—ये तीनों समान नामवाली हैं—इन तीनों वस्तुओंका दान करना चाहिये। इन तीनोंके दानका फल भी समान ही है। ये तीनों वस्तुएँ मनुष्योंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण करनेवाली हैं ॥ ४ ॥
यो ब्रूयाच्चापि शिष्याय धर्म्यां ब्राह्मीं सरस्वतीम् ।
पृथिवीगोप्रदानाभ्यां तुल्यं स फलमश्नुते ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण अपने शिष्यको धर्मानुकूल ब्राह्मी सरस्वती (वेदवाणी) का उपदेश करता है, वह भूमिदान और गोदानके समान फलका भागी होता है ॥ ५ ॥
तथैव गाः प्रशंसन्ति न तु देयं ततः परम् ।
संनिकृष्टफलास्ता हि लघ्वर्थाश्च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

इसी प्रकार गोदानकी भी प्रशंसा की गयी है। उससे बढ़कर कोई दान नहीं है। युधिष्ठिर! गोदानका फल निकट भविष्यमें मिलता है तथा वे गौएँ शीघ्र अभीष्ट अर्थकी सिद्धि करती हैं।। ६ ।। मातरः सर्वभूतानां गावः सर्वसुखप्रदाः । वृद्धिमाकाङ्क्षता नित्यं गावः कार्याः प्रदक्षिणाः ।। ७ ।। गौएँ सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता कहलाती हैं। वे सबको सुख देनेवाली हैं। जो अपने अभ्युदयकी इच्छा रखता हो, उसे गौओंको सदा दाहिने करके चलना चाहिये ।। ७ ।। संताड्या न तु पादेन गवां मध्ये न च व्रजेत् । मंगलायतनं देव्यस्तस्मात् पूज्याः सदैव हि ।। ८ ।। गौओंको लात न मारे। उनके बीचसे होकर न निकले। वे मंगलकी आधारभूत देवियाँ हैं, अतः उनकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ।। ८ ।। प्रचोदनं देवकृतं गवां कर्मसु वर्तताम् । पूर्वमेवाक्षरं चान्यदभिधेयं ततः परम् ।। ९ ।। देवताओंने भी यज्ञके लिये भूमि जोतते समय बैलोंको डंडे आदिसे हाँका था। अतः पहले यज्ञके लिये ही बैलोंको जोतना या हाँकना श्रेयस्कर माना गया है। उससे भिन्न कर्मके लिये बैलोंको जोतना या डंडे आदिसे हाँकना निन्दनीय है ।। ९ ।। प्रचारे वा निवाते वा बुधो नोद्वेजयेत गाः । तृषिता ह्यभिवीक्षन्त्यो नरं हन्युः सबान्धवम् ।। १० ।। विद्वान् पुरुषको चाहिये कि जब गौएँ स्वच्छन्दता-पूर्वक विचर रही हों अथवा किसी उपद्रवशून्य स्थानमें बैठी हों तो उन्हें उद्वेगमें न डाले। जब गौएँ प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने स्वामीकी ओर देखती हैं (और वह उन्हें पानी नहीं पिलाता है), तब वे रोषपूर्ण दृष्टिसे बन्धु-बान्धवोंसहित उसका नाश कर देती हैं ।। १० ।। पितृसद्मानि सततं देवतायतनानि च । पूयन्ते शकृता यासां पूतं किमधिकं ततः ।। ११ ।। जिनके गोबरसे लीपनेपर देवताओंके मन्दिर और पितरोंके श्राद्धस्थान पवित्र होते हैं, उनसे बढ़कर पावन और क्या हो सकता है? ।। ११ ।। ग्रासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः । अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् ।। १२ ।। जो एक वर्षतक प्रतिदिन स्वयं भोजनके पहले दूसरेकी गायको एक मुट्ठी घास खिलाता है, उसका वह व्रत समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होता है ।। १२ ।। स हि पुत्रान् यशोऽर्थं च श्रियं चाप्यधिगच्छति । नाशयत्यशुभं चैव दुःस्वप्नं चाप्यपोहति ।। १३ ।।

वह अपने लिये पुत्र, यश, धन और सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा अशुभ कर्म और दुःस्वप्नका नाश कर देता है ।। १३ ।।

युधिष्ठिर उवाच

देयाः किंलक्षणा गावः काश्चापि परिवर्जयेत् ।
कीदृशाय प्रदातव्या न देयाः कीदृशाय च ।। १४ ।।
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! किन लक्षणोंवाली गौओंका दान करना चाहिये और किनका दान नहीं करना चाहिये? कैसे ब्राह्मणको गाय देनी चाहिये और कैसे ब्राह्मणको नहीं देनी चाहिये? ।। १४ ।।

भीष्म उवाच

असदवृत्ताय पापाय लुब्धायानृतवादिने ।
हव्यकव्यव्यपेताय न देया गौः कथंचन ।। १५ ।।
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दुराचारी, पापी, लोभी, असत्यवादी तथा देवयज्ञ और श्राद्धकर्म न करनेवाले ब्राह्मणको किसी तरह गौ नहीं देनी चाहिये ।। १५ ।।
भिक्षवे बहुपुत्राय श्रोत्रियायाहिताग्नये ।
दत्त्वा दशगवां दाता लोकानाप्नोत्यनुत्तमान् ।। १६ ।।
जिसके बहुत-से पुत्र हों, जो श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) और अग्निहोत्री ब्राह्मण हो और गौके लिये याचना कर रहा हो, ऐसे पुरुषको दस गौओंका दान करनेवाला दाता उत्तम लोकोंको पाता है ।। १६ ।।
यश्चैव धर्मं कुरुते तस्य धर्मफलं च यत् ।
सर्वस्यैवांशभाग् दाता तं निमित्तं प्रवृत्तयः ।। १७ ।।
जो गोदान ग्रहण करके धर्माचरण करता है, उसके धर्मका जो कुछ भी फल होता है, उस सम्पूर्ण धर्मके एक अंशका भागी दाता भी होता है, क्योंकि उसीके लिये उसकी गोदानमें प्रवृत्ति हुई थी ।। १७ ।।
यश्चैनमुत्पादयते यश्चैनं त्रायते भयात् ।
यश्चास्य कुरुते वृत्तिं सर्वे ते पितरस्त्रयः ।। १८ ।।
जो जन्म देता है, जो भयसे बचाता है तथा जो जीविका देता है—ये तीनों ही पिताके तुल्य हैं ।। १८ ।।
कल्मषं गुरुशुश्रूषा हन्ति मानो महद् यशः ।
अपुत्रतां त्रयः पुत्रा अवृत्तिं दश धेनवः ।। १९ ।।
गुरुजनोंकी सेवा सारे पापोंका नाश कर देती है। अभिमान महान् यशको नष्ट कर देता है। तीन पुत्र पुत्रहीनताके दोषका निवारण कर देते हैं और दूध देनेवाली दस गौएँ हों तो ये जीविकाके अभावको दूर कर देती हैं ।। १९ ।।

वेदान्तनिष्ठस्य बहुश्रुतस्य प्रज्ञानतृप्तस्य जितेन्द्रियस्य । शिष्टस्य दान्तस्य यतस्य चैव भूतेषु नित्यं प्रियवादिनश्च ॥ २० ॥ यः क्षुद्भयाद् वै न विकर्म कुर्या- न्मृदुश्च शान्तो ह्यतिथिप्रियश्च । वृत्तिं द्विजायातिसृजेत तस्मै यस्तुल्यशीलश्च सपुत्रदारः ॥ २१ ॥ जो वेदान्तनिष्ठ, बहुज्ञ, ज्ञानानन्दसे तृप्त, जितेन्द्रिय, शिष्ट, मनको वशमें रखनेवाला, यत्नशील, समस्त प्राणियोंके प्रति सदा प्रिय वचन बोलनेवाला, भूखके भयसे भी अनुचित कर्म न करनेवाला, मृदुल, शान्त, अतिथिप्रेमी, सबपर समानभाव रखनेवाला और स्त्री-पुत्र आदि कुटुम्बसे युक्त हो, उस ब्राह्मणकी जीविकाका अवश्य प्रबन्ध करना चाहिये ॥ २०-२१ ॥

शुभे पात्रे ये गुणा गोप्रदाने तावान् दोषो ब्राह्मणस्वापहारे । सर्वावस्थं ब्राह्मणस्वापहारो दाराश्चैषां दूरतो वर्जनीयाः ॥ २२ ॥ शुभ पात्रको गोदान करनेसे जो लाभ होते हैं, उसका धन ले लेनेपर उतना ही पाप लगता है; अतः किसी भी अवस्थामें ब्राह्मणोंके धनका अपहरण न करे तथा उनकी स्त्रियोंका संसर्ग दूरसे ही त्याग दे ॥ २२ ॥

(विप्रदारे परहृते विप्रस्वनिचये तथा । परित्रायन्ति शक्तास्तु नमस्तेभ्यो मृतास्तु वा ॥ न पालयन्ति चेत् तस्य हन्ता वैवस्वतो यमः । दण्डयन् भर्त्सयन् नित्यं निरयेभ्यो न मुञ्चति ॥ तथा गवां परित्राणे पीडने च शुभाशुभम् । विप्रगोषु विशेषेण रक्षितेषु हतेषु वा ॥) जहाँ ब्राह्मणोंकी स्त्रियों अथवा उनके धनका अपहरण होता हो, वहाँ शक्ति रहते हुए जो उन सबकी रक्षा करते हैं, उन्हें नमस्कार है। जो उनकी रक्षा नहीं करते हैं, वे मुर्दोंके समान हैं। सूर्यपुत्र यमराज ऐसे लोगोंका वध कर डालते हैं, प्रतिदिन उन्हें यातना देते और डाँटते-फटकारते हैं और नरकसे उन्हें कभी छुटकारा नहीं देते हैं। इसी प्रकार गौओंके संरक्षण और पीड़नसे भी शुभ और अशुभकी प्राप्ति होती है। विशेषतः ब्राह्मणों और गौओंके अपने द्वारा सुरक्षित होनेपर पुण्य और मारे जानेपर पाप होता है ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोदानमाहात्म्ये
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानका माहात्म्यविषयक
उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)

ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ततितमोऽध्यायः

ब्राह्मणके धनका अपहरण करनेसे होनेवाली हानिके विषयमें दृष्टान्तके रूपमें राजा नृगका उपाख्यान

भीष्म उवाच

अत्रैव कीर्त्यते सद्भिर्ब्राह्मणस्वाभिमर्शने ।
नृगेण सुमहत् कृच्छ्रं यदवाप्तं कुरुद्वह ॥ १ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**कुरुश्रेष्ठ! इस विषयमें श्रेष्ठ पुरुष वह प्रसंग सुनाया करते हैं, जिसके अनुसार एक ब्राह्मणके धनको ले लेनेके कारण राजा नृगको महान् कष्ट उठाना पड़ा था ॥ १ ॥

निविशन्त्यां पुरा पार्थ द्वारवत्यामिति श्रुतिः ।
अदृश्यत महाकूपस्तृणवीरुत्समावृतः ॥ २ ॥
पार्थ! हमारे सुननेमें आया है कि पूर्वकालमें जब द्वारकापुरी बस रही थी, उसी समय वहाँ घास और लताओंसे ढँका हुआ एक विशाल कूप दिखायी दिया ॥ २ ॥

प्रयत्नं तत्र कुर्वाणास्तस्मात् कूपाज्जलार्थिनः ।
श्रमेण महता युक्तास्तस्मिंस्तोये सुसंवृते ॥ ३ ॥
ददृशुस्ते महाकायं कृकलासमवस्थितम् ।
वहाँ रहनेवाले यदुवंशी बालक उस कुएँका जल पीनेकी इच्छासे बड़े परिश्रमके साथ उस घास-फूसको हटानेके लिये महान् प्रयत्न करने लगे। इतनेहीमें उस कुएँके ढँके हुए जलमें स्थित हुए एक विशालकाय गिरगिटपर उनकी दृष्टि पड़ी ॥ ३ ½ ॥

तस्य चोद्धरणे यत्नमकुर्वंस्ते सहस्रशः ॥ ४ ॥
प्रग्रहैश्चर्मपट्टैश्च तं बद्ध्वा पर्वतोपमम् ।
नाशक्नुवन् समुद्धर्तुं ततो जग्मुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥
फिर तो वे सहस्रों बालक उस गिरगिटको निकालनेका यत्न करने लगे। गिरगिटका शरीर एक पर्वतके समान था। बालकोंने उसे रस्सियों और चमड़ेकी पट्टियोंसे बाँधकर खींचनेके लिये बहुत जोर लगाया परंतु वह टस-से-मस न हुआ। जब बालक उसे निकालनेमें सफल न हो सके, तब वे भगवान् श्रीकृष्णके पास गये ॥ ४-५ ॥

खमावृत्योदपानस्य कृकलासः स्थितो महान् ।
तस्य नास्ति समुद्धर्तेत्येतत् कृष्णे न्यवेदयन् ॥ ६ ॥
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे निवेदन किया—‘भगवन्! एक बहुत बड़ा गिरगिट कुएँमें पड़ा है, जो उस कुएँके सारे आकाशको घेरकर बैठा है; पर उसे निकालनेवाला कोई नहीं