भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 642

नाचिकेत जब वहाँ गया, तब उसे कुछ न मिला। सारा सामान नदीके वेगमें बह गया था। नाचिकेत मुनि लौट आया और पितासे बोला—‘मुझे तो वहाँ वह सब सामान नहीं दिखायी दिया’ ॥ ६ ॥

क्षुत्पिपासाश्रमाविष्टो मुनिरुद्दालकिस्तदा ।
यमं पश्येति तं पुत्रमशपत् स महातपाः ॥ ७ ॥
महातपस्वी उद्दालक मुनि उस समय भूख-प्याससे कष्ट पा रहे थे, अतः रुष्ट होकर बोले—‘अरे वह सब तुम्हें क्यों दिखायी देगा? जाओ यमराजको देखो।’ इस प्रकार उन्होंने उसे शाप दे दिया ॥ ७ ॥

तथा स पित्राभिहितो वाग्वज्रेण कृताञ्जलिः ।
प्रसीदेति ब्रुवन्नेव गतसत्त्वोऽपतद् भुवि ॥ ८ ॥
पिताके वाग्वज्रसे पीड़ित हुआ नाचिकेत हाथ जोड़कर बोला—‘प्रभो! प्रसन्न होइये।’ इतना ही कहते-कहते वह निष्प्राण होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ८ ॥

नाचिकेतं पिता दृष्ट्वा पतितं दुःखमूर्च्छितः ।
किं मया कृतमित्युक्त्वा निपपात महीतले ॥ ९ ॥
नाचिकेतको गिरा देख उसके पिता भी दुःखसे मूर्च्छित हो गये और ‘अरे, यह मैंने क्या कर डाला!’ ऐसा कहकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ९ ॥

तस्य दुःखपरीतस्य स्वं पुत्रमनुशोचतः ।
व्यतीतं तदहःशेषं सा चोग्रा तत्र शर्वरी ॥ १० ॥
दुःखमें डूबे और बारंबार अपने पुत्रके लिये शोक करते हुए ही महर्षिका वह शेष दिन व्यतीत हो गया और भयानक रात्रि भी आकर समाप्त हो गयी ॥ १० ॥

पित्र्येणाश्रुप्रपातेन नाचिकेतः कुरुद्वह ।
प्रास्पन्दच्छयने कौश्ये वृष्ट्या सस्यमिवाप्लुतम् ॥ ११ ॥
कुरुश्रेष्ठ! कुशकी चटाईपर पड़ा हुआ नाचिकेत पिताके आँसुओंकी धारासे भीगकर कुछ हिलने-डुलने लगा, मानो वर्षासे सिंचकर अनाजकी सूखी खेती हरी हो गयी हो ॥ ११ ॥

स पर्यपृच्छत् तं पुत्रं क्षीणं पर्यागतं पुनः ।
दिव्यैर्गन्धैः समादिग्धं क्षीणस्वप्नमिवोत्थितम् ॥ १२ ॥
महर्षिका वह पुत्र मरकर पुनः लौट आया, मानो नींद टूट जानेसे जाग उठा हो। उसका शरीर दिव्य सुगन्धसे व्याप्त हो रहा था। उस समय उद्दालकने उससे पूछा— ॥ १२ ॥

अपि पुत्र जिता लोकाः शुभास्ते स्वेन कर्मणा ।
दिष्ट्या चासि पुनः प्राप्तो न हि ते मानुषं वपुः ॥ १३ ॥
बेटा! क्या तुमने अपने कर्मसे शुभ लोकोंपर विजय पायी है? मेरे सौभाग्यसे ही तुम पुनः यहाँ चले आये हो। तुम्हारा यह शरीर मनुष्योंका-सा नहीं है—दिव्य भावको प्राप्त हो