महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 643, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगया है' ।। १३ ।। प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य पित्रा पृष्टो महात्मना । स तां वार्तां पितुर्मध्ये महर्षीणां न्यवेदयत् ।। १४ ।। अपने महात्मा पिताके इस प्रकार पूछनेपर परलोककी सब बातोंको प्रत्यक्ष देखनेवाला नाचिकेत महर्षियोंके बीचमें पितासे वहाँका सब वृत्तान्त निवेदन करने लगा— ।। १४ ।। कुर्वन् भवच्छासनमाशु यातो ह्यहं विशालां रुचिरप्रभावाम् । वैवस्वतीं प्राप्य सभामपश्यं सहस्रशो योजनहेमभासम् ।। १५ ।। ‘पिताजी! मैं आपकी आज्ञाका पालन करनेके लिये यहाँसे तुरन्त प्रस्थित हुआ और मनोहर कान्ति एवं प्रभावसे युक्त विशाल यमपुरीमें पहुँचकर मैंने वहाँकी सभा देखी, जो सुवर्णके समान सुन्दर प्रभासे प्रकाशित हो रही थी। उसका तेज सहस्रों योजन दूरतक फैला हुआ था ।। १५ ।। दृष्ट्वैव मामभिमुखमापतन्तं देहीति स ह्यासनमादिदेश । वैवस्वतोऽर्घ्यादिभिरर्हणैश्च भवत्कृते पूजयामास मां सः ।। १६ ।। ‘मुझे सामनेसे आते देख विवस्वान्के पुत्र यमने अपने सेवकोंको आज्ञा दी कि ‘इनके लिये आसन दो।' उन्होंने आपके नाते अर्घ्य आदि पूजनसम्बन्धी उपचारोंसे स्वयं ही मेरा पूजन किया ।। १६ ।। ततस्त्वहं तं शनकैरवोचं वृतः सदस्यैरभिपूज्यमानः । प्राप्तोऽस्मि ते विषयं धर्मराज लोकानर्हो यानहं तान् विधत्स्व ।। १७ ।। ‘तब सब सदस्योंसे घिरकर उनके द्वारा पूजित होते हुए मैंने वैवस्वत यमसे धीरेसे कहा—'धर्मराज! मैं आपके राज्यमें आया हूँ; मैं जिन लोकोंमें जानेके योग्य होऊँ, उनमें जानेके लिये मुझे आज्ञा दीजिये' ।। १७ ।। यमोऽब्रवीन्मां न मृतोऽसि सौम्य यमं पश्येत्याह स त्वां तपस्वी । पिता प्रदीप्ताग्निसमानतेजा न तच्छक्यमनृतं विप्र कर्तुम् ।। १८ ।। ‘तब यमराजने मुझसे कहा—"सौम्य! तुम मरे नहीं हो। तुम्हारे तपस्वी पिताने इतना ही कहा था कि तुम यमराजको देखो। विप्रवर! वे तुम्हारे पिता प्रज्वलित अग्निके समान