भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 644

तेजस्वी हैं। उनकी बात झूठी नहीं की जा सकती ॥ १८ ॥ दृष्टस्तेऽहं प्रतिगच्छस्व तात शोचत्यसौ तव देहस्य कर्ता । ददानि किं चापि मनःप्रणीतं प्रियातिथेस्तव कामान् वृणीष्व ॥ १९ ॥ “तात! तुमने मुझे देख लिया। अब तुम लौट जाओ। तुम्हारे शरीरका निर्माण करनेवाले वे तुम्हारे पिताजी शोकमग्न हो रहे हैं। वत्स! तुम मेरे प्रिय अतिथि हो। तुम्हारा कौन-सा मनोरथ मैं पूर्ण करूँ। तुम्हारी जिस-जिस वस्तुके लिये इच्छा हो, उसे माँग लो” ॥ १९ ॥ तेनैवमुक्तस्तमहं प्रत्यवोचं प्राप्तोऽस्मि ते विषयं दुर्निवर्त्यम् । इच्छाम्यहं पुण्यकृतां समृद्धान् लोकान् द्रष्टुं यदि तेऽहं वरार्हः ॥ २० ॥ ‘उनके ऐसा कहनेपर मैंने इस प्रकार उत्तर दिया—‘भगवन्! मैं आपके उस राज्यमें आ गया हूँ, जहाँसे लौटकर जाना अत्यन्त कठिन है। यदि मैं आपकी दृष्टिमें वर पानेके योग्य होऊँ तो पुण्यात्मा पुरुषोंको मिलनेवाले समृद्धिशाली लोकोंका मैं दर्शन करना चाहता हूँ’ ॥ २० ॥ यानं समारोप्य तु मां स देवो वाहैर्युक्तं सुप्रभं भानुमत् तत् । संदर्शयामास तदात्मलोकान् सर्वांस्तथा पुण्यकृतां द्विजेन्द्र ॥ २१ ॥ ‘द्विजेन्द्र! तब यम देवताने वाहनोंसे जुते हुए उत्तम प्रकाशसे युक्त तेजस्वी रथपर मुझे बिठाकर पुण्यात्माओंको प्राप्त होनेवाले अपने यहाँके सभी लोकोंका मुझे दर्शन कराया ॥ २१ ॥ अपश्यं तत्र वेश्मानि तैजसानि महात्मनाम् । नानासंस्थानरूपाणि सर्वरत्नमयानि च ॥ २२ ॥ ‘तब मैंने महामनस्वी पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले वहाँके तेजोमय भवनोंका दर्शन किया। उनके रूप-रंग और आकार-प्रकार अनेक तरहके थे। उन भवनोंका सब प्रकारके रत्नोंद्वारा निर्माण किया गया था ॥ २२ ॥ चन्द्रमण्डलशुभ्राणि किङ्किणीजालवन्ति च । अनेकशतभौमानि सान्तर्जलवनानि च ॥ २३ ॥ वैदूर्यार्कप्रकाशानि रूप्यरुक्ममयानि च । तरुणादित्यवर्णानि स्थावराणि चराणि च ॥ २४ ॥