महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 645, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कोई चन्द्रमण्डलके समान उज्ज्वल थे। किन्हींपर क्षुद्रघंटियोंसे युक्त झालरें लगी थीं। उनमें सैकड़ों कक्षाएँ और मंजिलें थीं। उनके भीतर जलाशय और वन-उपवन सुशोभित थे। कितनोंका प्रकाश नीलमणिमय सूर्यके समान था। कितने ही चाँदी और सोनेके बने हुए थे। किन्हीं-किन्हीं भवनोंके रंग प्रातःकालीन सूर्यके समान लाल थे। उनमेंसे कुछ विमान या भवन तो स्थावर थे और कुछ इच्छानुसार विचरनेवाले थे ।। २३-२४ ।।
भक्ष्यभोज्यमयान् शैलान् वासांसि शयनानि च ।
सर्वकामफलांश्चैव वृक्षान् भवनसंस्थितान् ।। २५ ।।
‘उन भवनोंमें भक्ष्य और भोज्य पदार्थोंके पर्वत खड़े थे। वस्त्रों और शय्याओंके ढेर लगे थे तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फलोंको देनेवाले बहुत-से वृक्ष उन गृहोंकी सीमाके भीतर लहलहा रहे थे ।। २५ ।।
नद्यो वीथ्यः सभा वाप्यो दीर्घिकाश्चैव सर्वशः ।
घोषवन्ति च यानानि युक्तान्यथ सहस्रशः ।। २६ ।।
‘उन दिव्य लोकोंमें बहुत-सी नदियाँ, गलियाँ, सभाभवन, बावडियाँ, तालाब और जोतकर तैयार खड़े हुए घोषयुक्त सहस्रों रथ मैंने सब ओर देखे थे ।। २६ ।।
क्षीरस्रवा वै सरितो गिरींश्च
सर्पिस्तथा विमलं चापि तोयम् ।
वैवस्वतस्यानुमतांश्च देशा-
नदृष्टपूर्वान् सुबहूनपश्यम् ।। २७ ।।
‘मैंने दूध बहानेवाली नदियाँ, पर्वत, घी और निर्मल जल भी देखे तथा यमराजकी अनुमतिसे और भी बहुत-से पहलेके न देखे हुए प्रदेशोंका दर्शन किया ।। २७ ।।
सर्वान् दृष्ट्वा तदहं धर्मराज-
मवोचं वै प्रभविष्णुं पुराणम् ।
क्षीरस्यैताः सर्पिषश्चैव नद्यः
शश्वत्स्रोताः कस्य भोज्याः प्रदिष्टाः ।। २८ ।।
‘उन सबको देखकर मैंने प्रभावशाली पुरातन देवता धर्मराजसे कहा—‘प्रभो! ये जो घी और दूधकी नदियाँ बहती रहती हैं, जिनका स्रोत कभी सूखता नहीं है, किनके उपभोगमें आती हैं—इन्हें किसका भोजन नियत किया गया है?’ ।। २८ ।।
यमोऽब्रवीद् विद्धि भोज्यास्त्वमेता
ये दातारः साधवो गोरसानाम् ।
अन्ये लोकाः शाश्वता वीतशोकैः
समाकीर्णा गोप्रदाने रतानाम् ।। २९ ।।
‘यमराजने कहा—“ब्रह्मन्! तुम इन नदियोंको उन श्रेष्ठ पुरुषोंका भोजन समझो, जो गोरस दान करनेवाले हैं। जो गोदानमें तत्पर हैं, उन पुण्यात्माओंके लिये दूसरे भी सनातन