भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 648, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 648

नाचिकेत कहता है—वैवस्वत यमकी बात सुनकर मैंने पुनः उनसे पूछा—‘भगवन्! यदि अभाववश गोदान न किया जा सके तो गोदान करनेवालोंको ही मिलनेवाले लोकोंमें मनुष्य कैसे जा सकता है?’ ॥

ततोऽब्रवीद् यमो धीमान् गोप्रदानपरां गतिम् ।
गोप्रदानानुकल्पं तु गामृते सन्ति गोप्रदाः ॥ ३८ ॥
तदनन्तर बुद्धिमान् यमराजने गोदानसम्बन्धी गति तथा गोदानके समान फल देनेवाले दानका वर्णन किया, जिसके अनुसार बिना गायके भी लोग गोदान करनेवाले हो सकते हैं? ॥ ३८ ॥

अलाभे यो गवां दद्याद् घृतधेनुं यतव्रतः ।
तस्यैता घृतवाहिन्यः भरन्ते वत्सला इव ॥ ३९ ॥
‘जो गौओंके अभावमें संयम-नियमसे युक्त हो घृतधेनुका दान करता है, उसके लिये ये घृतवाहिनी नदियाँ वत्सला गौओंकी भाँति घृत बहाती हैं’ ॥ ३९ ॥

घृतालाभे तु यो दद्यात् तिलधेनुं यतव्रतः ।
स दुर्गात् तारितो धेन्वा क्षीरनद्यां प्रमोद्ते ॥ ४० ॥
‘घीके अभावमें जो व्रत-नियमसे युक्त हो तिलमयी धेनुका दान करता है, वह उस धेनुके द्वारा संकटसे उद्धार पाकर दूधकी नदीमें आनन्दित होता है’ ॥ ४० ॥

तिलालाभे तु यो दद्याज्ज्लधेनुं यतव्रतः ।
स कामप्रवहां शीतां नदीमेतामुपाश्नुते ॥ ४१ ॥
‘तिलके अभावमें जो व्रतशील एवं नियमनिष्ठ होकर जलमयी धेनुका दान करता है, वह अभीष्ट वस्तुओंको बहानेवाली इस शीतल नदीके निकट रहकर सुख भोगता है’ ॥ ४१ ॥

एवमेतानि मे तत्र धर्मराजो न्यदर्शयत् ।
दृष्ट्वा च परं हर्षमवापमहमच्युत ॥ ४२ ॥
धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले पूज्य पिताजी! इस प्रकार धर्मराजने मुझे वहाँ ये सब स्थान दिखाये। वह सब देखकर मुझे बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ४२ ॥

निवेदये चाहमिमं प्रियं ते
ऋतुर्महानल्पधनप्रचारः ।
प्राप्तो मया तात स मत्प्रसूतः
प्रपत्स्यते वेदविधिप्रवृत्तः ॥ ४३ ॥
तात! मैं आपके लिये यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करता हूँ कि मैंने वहाँ थोड़े-से ही धनसे सिद्ध होनेवाला यह गोदानरूप महान् यज्ञ प्राप्त किया है। वह यहाँ वेदविधिके अनुसार मुझसे प्रकट होकर सर्वत्र प्रचलित होगा ॥ ४३ ॥

शापो ह्ययं भवतोऽनुग्रहाय