महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राप्तो मया यत्र दृष्टो यमो वै। दानव्युष्टिं तत्र दृष्ट्वा महात्मन् निःसंदिगधान् दानधर्मांश्चरिष्ये ॥ ४४ ॥ आपके द्वारा मुझे जो शाप मिला, वह वास्तवमें मुझपर अनुग्रहके लिये ही प्राप्त हुआ था, जिससे मैंने यमलोकमें जाकर वहाँ यमराजको देखा। महात्मन्! वहाँ दानके फलको प्रत्यक्ष देखकर मैं संदेहरहित दानधर्मोंका अनुष्ठान करूँगा ॥ ४४ ॥ इदं च मामब्रवीद् धर्मराजः पुनः पुनः सम्प्रहृष्टो महर्षे। दानेन यः प्रयतोऽभूत् सदैव विशेषतो गोप्रदानं च कुर्यात् ॥ ४५ ॥ महर्षे! धर्मराजने बारंबार प्रसन्न होकर मुझसे यह भी कहा था कि 'जो लोग दानसे सदा पवित्र होना चाहें' वे विशेषरूपसे गोदान करें ॥ ४५ ॥ शुद्धो ह्यर्थो नावमन्यस्व धर्मान् पात्रे देयं देशकालोपपन्ने। तस्माद् गावस्ते नित्यमेव प्रदेया मा भूच्च ते संशयः कश्चिदत्र ॥ ४६ ॥ 'मुनिकुमार! धर्म निर्दोष विषय है। तुम धर्मकी अवहेलना न करना। उत्तम देश, काल प्राप्त होनेपर सुपात्रको दान देते रहना चाहिये। अतः तुम्हें सदा ही गोदान करना उचित है। इस विषयमें तुम्हारे भीतर कोई संदेह नहीं होना चाहिये ॥ ४६ ॥ एताः पुरा ह्यददन्नित्यमेव शान्तात्मानो दानपथे निविष्टाः। तपांस्युग्राण्यप्रतिशङ्कमाना- स्ते वै दानं प्रददुश्चैव शक्त्या ॥ ४७ ॥ 'पूर्वकालमें शान्तचित्तवाले पुरुषोंने दानके मार्गमें स्थित हो नित्य ही गौओंका दान किया था। वे अपनी उग्र तपस्याके विषयमें संदेह न रखते हुए भी यथाशक्ति दान देते ही रहते थे ॥ ४७ ॥ काले च शक्त्या मत्सरं वर्जयित्वा शुद्धात्मानः श्रद्धिनः पुण्यशीलाः। दत्त्वा गा वै लोकममुं प्रपन्ना देदीप्यन्ते पुण्यशीलास्तु नाके ॥ ४८ ॥ 'कितने ही शुद्धचित्त, श्रद्धालु एवं पुण्यात्मा पुरुष ईर्ष्याका त्याग करके समयपर यथाशक्ति गोदान करके परलोकमें पहुँचकर अपने पुण्यमय शील-स्वभावके कारण स्वर्गलोकमें प्रकाशित होते हैं ॥ ४८ ॥