महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 650, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतद् दानं न्यायलब्धं द्विजेभ्यः पात्रे दत्तं प्रापणीयं परीक्ष्य। काम्याष्टम्या वर्तितव्यं दशांहं रसैर्गवां शकृता प्रस्रवैर्वा॥ ४९॥ ‘न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए इस गोधनका ब्राह्मणोंको दान करना चाहिये तथा पात्रकी परीक्षा करके सुपात्रको दी हुई गाय उसके घर पहुँचा देना चाहिये और किसी भी शुभ अष्टमीसे आरम्भ करके दस दिनोंतक मनुष्यको गोरस, गोबर अथवा गोमूत्रका आहार करके रहना चाहिये॥ ४९॥
देवव्रती स्याद् वृषभप्रदानै- र्वेदावाप्तिर्गोयुगस्य प्रदाने। तीर्थावाप्तिर्गोप्रयुक्तप्रदाने पापोत्सर्गः कपिलायाः प्रदाने॥ ५०॥ ‘एक बैलका दान करनेसे मनुष्य देवताओंका सेवक होता है। दो बैलोंका दान करनेपर उसे वेद-विद्याकी प्राप्ति होती है। उन बैलोंसे जुते हुए छकड़ेका दान करनेसे तीर्थसेवनका फल प्राप्त होता है और कपिला गायके दानसे समस्त पापोंका परित्याग हो जाता है॥ ५०॥
गामप्येकां कपिलां सम्प्रदाय न्यायोपेतां कलुषाद् विप्रमुच्येत्। गवां रसात् परं नास्ति किंचिद् गवां प्रदानं सुमहद् वदन्ति॥ ५१॥ ‘मनुष्य न्यायतः प्राप्त हुई एक भी कपिला गायका दान करके सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोरससे बढ़कर दूसरी कोई वस्तु नहीं है; इसीलिये विद्वान् पुरुष गोदानको महादान बतलाते हैं॥ ५१॥
गावो लोकांस्तारयन्ति क्षरन्त्यो गावश्चान्नं संजनयन्ति लोके। यस्तं जानन्न गवां हार्दमेति स वै गन्ता निरयं पापचेताः॥ ५२॥ गौएँ दूध देकर सम्पूर्ण लोकोंका भूखके कष्टसे उद्धार करती हैं। ये लोकमें सबके लिये अन्न पैदा करती हैं। इस बातको जानकर भी जो गौओंके प्रति सौहार्दका भाव नहीं रखता, वह पापात्मा मनुष्य नरकमें पड़ता है॥ ५२॥
यैस्तद् दत्तं गोसहस्रं शतं वा दशार्धं वा दश वा साधुवत्सम्। अप्येका वै साधवे ब्राह्मणाय