भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 681, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 681

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सप्तसप्ततितमोऽध्यायः

कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

ततो युधिष्ठिरो राजा भूयः शान्तनवं नृपम् ।
गोदानविस्तरं धर्मान् पप्रच्छ विनयान्वितः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने पुनः शान्तनुनन्दन भीष्मसे गोदानकी विस्तृत विधि तथा तत्सम्बन्धी धर्मोंके विषयमें विनयपूर्वक जिज्ञासा की ॥ १ ॥

युधिष्ठिर उवाच

गोप्रदानगुणान् सम्यक् पुनर्मे ब्रूहि भारत ।
न हि तृप्याम्यहं वीर शृण्वानोऽमृतमीदृशम् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**भारत! आप गोदानके उत्तम गुणोंका भलीभाँति पुनः मुझसे वर्णन कीजिये। वीर! ऐसा अमृतमय उपदेश सुनकर मैं तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तो धर्मराजेन तदा शान्तनवो नृपः ।
सम्यगाह गुणांस्तस्मै गोप्रदानस्य केवलान् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! धर्मराज युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्म केवल गोदान-सम्बन्धी गुणोंका भलीभाँति (विधिवत्) वर्णन करने लगे ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

वत्सलां गुणसम्पन्नां तरुणीं वस्त्रसंयुताम् ।
दत्त्वेदृशीं गां विप्राय सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४ ॥
**भीष्मजीने कहा—**बेटा! वात्सल्यभावसे युक्त, गुणवती और जवान गायको वस्त्र ओढ़ाकर उसका दान करे। ब्राह्मणको ऐसी गायका दान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ४ ॥

असुर्या नाम ते लोका गां दत्त्वा तान् न गच्छति ।
पीतोदकां जग्धतृणां नष्टक्षीरां निरिन्द्रियाम् ॥ ५ ॥
जरारोगोपसम्पन्नां जीर्णां वापीमिवाजलाम् ।
दत्त्वा तमः प्रविशति द्विजं क्लेशेन योजयेत् ॥ ६ ॥