महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 682, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसूर्य नामके जो अन्धकारमय लोक (नरक) हैं, उनमें गोदान करनेवाले पुरुषको नहीं जाना पड़ता। जिसका घास खाना और पानी पीना प्रायः समाप्त हो चुका हो, जिसका दूध नष्ट हो गया है, जिसकी इन्द्रियाँ काम न दे सकती हों, जो बुढ़ापा और रोगसे आक्रान्त होनेके कारण शरीरसे जीर्ण-शीर्ण हो बिना पानीकी बावड़ीके समान व्यर्थ हो गयी हो, ऐसी गौका दान करके मनुष्य ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है और स्वयं भी घोर नरकमें पड़ता है ।। ५-६ ।।
रुषा दुष्टा व्याधिता दुर्बला वा
नो दातव्या याश्च मूल्यैरदत्तैः ।
क्लेशैर्विप्रं योऽफलैः संयुनक्ति
तस्यावीर्याश्चाफलाश्चैव लोकाः ।। ७ ।।
जो क्रोध करनेवाली, दुष्टा, रोगिणी और दुबली-पतली हो तथा जिसका दाम न चुकाया गया हो, ऐसी गौका दान करना कदापि उचित नहीं है। जो इस तरहकी गाय देकर ब्राह्मणको व्यर्थ कष्टमें डालता है, उसे निर्बल और निष्फल लोक ही प्राप्त होते हैं ।। ७ ।।
बलान्विताः शीलवयोपपन्नाः
सर्वे प्रशंसन्ति सुगन्धवत्यः ।
यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा
तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा ।। ८ ।।
हृष्ट-पुष्ट, सुलक्षणा, जवान तथा उत्तम गन्धवाली गायकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही गौओंमें कपिला गौ उत्तम मानी गयी है ।।
युधिष्ठिर उवाच
कस्मात् समाने बहुलाप्रदाने
सद्भिः प्रशस्तं कपिलाप्रदानम् ।
विशेषमिच्छामि महाप्रभावं
श्रोतुं समर्थोऽस्मि भवान् प्रवक्तुम् ।। ९ ।।
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! किसी भी रंगकी गायका दान किया जाय, गोदान तो एक-सा ही होगा? फिर सत्पुरुषोंने कपिला गौकी ही अधिक प्रशंसा क्यों की है? मैं कपिलाके महान् प्रभावको विशेषरूपसे सुनना चाहता हूँ। मैं सुननेमें समर्थ हूँ और आप कहनेमें ।। ९ ।।
भीष्म उवाच
वृद्धानां ब्रुवतां तात श्रुतं मे यत् पुरातनम् ।
वक्ष्यामि तदशेषेण रोहिण्यो निर्मिता यथा ।। १० ।।