भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 683, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 683

भीष्मजीने कहा— बेटा! मैंने बड़े-बूढ़ोंके मुँहसे रोहिणी (कपिला) की उत्पत्तिका जो प्राचीन वृत्तान्त सुना है, वह सब तुम्हें बता रहा हूँ॥ १०॥ प्रजाः सृजेति चादिष्टः पूर्वं दक्षः स्वयम्भुवा । असृजद् वृत्तिमेवाग्रे प्रजानां हितकाम्यया ॥ ११॥ सृष्टिके प्रारम्भमें स्वयम्भू ब्रह्माजीने प्रजापति दक्षको यह आज्ञा दी कि 'तुम प्रजाकी सृष्टि करो,' किंतु प्रजापति दक्षने प्रजाके हितकी इच्छासे सर्वप्रथम उनकी आजीविकाका ही निर्माण किया ॥ ११ ॥ यथा ह्यमृतमाश्रित्य वर्तयन्ति दिवौकसः । तथा वृत्तिं समाश्रित्य वर्तयन्ति प्रजा विभो ॥ १२ ॥ प्रभो! जैसे देवता अमृतका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा आजीविकाके सहारे जीवन धारण करती है ॥ १२ ॥ अचरेभ्यश्च भूतेभ्यश्चराः श्रेष्ठाः सदा नराः । ब्राह्मणाश्च ततः श्रेष्ठास्तेषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥ १३ ॥ स्थावर प्राणियोंसे जंगम प्राणी सदा श्रेष्ठ हैं। उनमें भी मनुष्य और मनुष्योंमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं; क्योंकि उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं ॥ १३ ॥ यज्ञैरवाप्यते सोमः स च गोषु प्रतिष्ठितः । ततो देवाः प्रमोदान्ते पूर्वं वृत्तिस्ततः प्रजाः ॥ १४ ॥ यज्ञसे सोमकी प्राप्ति होती है और वह यज्ञ गौओंमें प्रतिष्ठित है, जिससे देवता आनन्दित होते हैं; अतः पहले आजीविका है फिर प्रजा ॥ १४ ॥ प्रजातान्येव भूतानि प्राक्रोशन् वृत्तिकांक्षया । वृत्तिदं चान्वपद्यन्त तृषिताः पितृमातृवत् ॥ १५ ॥ समस्त प्राणी उत्पन्न होते ही जीविकाके लिये कोलाहल करने लगे। जैसे भूखे-प्यासे बालक अपने माँ-बापके पास जाते हैं, उसी प्रकार समस्त जीव जीविकादाता दक्षके पास गये ॥ १५ ॥ इतीदं मनसा गत्वा प्रजासर्गार्थमात्मनः । प्रजापतिस्तु भगवानमृतं प्रापिबत् तदा ॥ १६ ॥ प्रजाजनोंकी इस स्थितिपर मन-ही-मन विचार करके भगवान् प्रजापतिने प्रजावर्गकी आजीविकाके लिये उस समय अमृतका पान किया ॥ १६ ॥ स गतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धं सुरभिमुद्गिरन् । ददर्शोद्गारसंवृत्तां सुरभिं मुखजां सुताम् ॥ १७ ॥ अमृत पीकर जब वे पूर्ण तृप्त हो गये, तब उनके मुखसे सुरभि (मनोहर) गन्ध निकलने लगी। सुरभि गन्धके निकलनेके साथ ही 'सुरभि' नामक गौ प्रकट हो गयी, जिसे प्रजापतिने अपने मुखसे प्रकट हुई पुत्रीके रूपमें देखा ॥ १७ ॥