भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 684, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 684

सासृजत् सौरभेयीस्तु सुरभिर्लोकमातृकाः ।
सुवर्णवर्णाः कपिलाः प्रजानां वृत्तिधेनवः ॥ १८ ॥
उस सुरभिने बहुत-सी 'सौरभेयी' नामवाली गौओंको उत्पन्न किया, जो सम्पूर्ण जगत्के लिये माताके समान थीं। उन सबका रंग सुवर्णके समान उद्दीप्त हो रहा था। वे कपिला गौएँ प्रजाजनोंके लिये आजीविकारूप दूध देनेवाली थीं ॥ १८ ॥

तासाममृतवर्णानां क्षरन्तीनां समन्ततः ।
बभूवामृतजः फेनः स्रवन्तीनामिवोर्मिजः ॥ १९ ॥
जैसे नदियोंकी लहरोंसे फेन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार चारों ओर दूधकी धारा बहाती हुई अमृत (सुवर्ण) के समान वर्णवाली उन गौओंके दूधसे फेन उठने लगा ॥ १९ ॥

स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठतः ।
शिरस्यवाप तत् क्रुद्धः स तदैक्षत च प्रभुः ॥ २० ॥
ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव ।
एक दिन भगवान् शंकर पृथ्वीपर खड़े थे। उसी समय सुरभिके एक बछड़ेके मुँहसे फेन निकलकर उनके मस्तकपर गिर पड़ा। इससे वे कुपित हो उठे और अपने ललाटजनित नेत्रसे, मानो रोहिणीको भस्म कर डालेंगे, इस तरह उसकी ओर देखने लगे ॥ २० १/२ ॥

तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिलास्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥
नानावर्णत्वमनयन्मेघानिव दिवाकरः ।
प्रजानाथ! रुद्रका वह भयंकर तेज जिन-जिन कपिलाओंपर पड़ा, उनके रंग नाना प्रकारके हो गये। जैसे सूर्य बादलोंको अपनी किरणोंसे बहुरंगा बना देते हैं, उसी प्रकार उस तेजने उन सबको नाना वर्णवाली कर दिया ॥ २१ १/२ ॥

यास्तु तस्मादपक्रम्य सोममेवाभिसंश्रिताः ॥ २२ ॥
यथोत्पन्नाः स्ववर्णास्तास्ता ह्येता नान्यवर्णगाः ।
अथ क्रुद्धं महादेवं प्रजापतिरभाषत ॥ २३ ॥
परंतु जो गौएँ वहाँसे भागकर चन्द्रमाकी ही शरणमें चली गयीं, वे जैसे उत्पन्न हुई थीं वैसे ही रह गयीं। उनका रंग नहीं बदला। उस समय क्रोधमें भरे हुए महादेवजीसे दक्षप्रजापतिने कहा— ॥ २२-२३ ॥

अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम् ।
यथा ह्यमृतमादाय सोमो विस्यन्दते पुनः ॥ २४ ॥
तथा क्षीरं क्षरन्त्येता रोहिण्योऽमृतसम्भवम् ।
प्रभो! आपके ऊपर अमृतका छींटा पड़ा है। गौओंका दूध बछड़ोंके पीनेसे जूठा नहीं होता। जैसे चन्द्रमा अमृतका संग्रह करके फिर उसे बरसा देता है, उसी प्रकार ये रोहिणी गौएँ अमृतसे उत्पन्न दूध देती हैं ॥ २४ १/२ ॥

न दुष्यत्यनिलो नाग्निर्न सुवर्णं न चोदधिः ॥ २५ ॥