महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सासृजत् सौरभेयीस्तु सुरभिर्लोकमातृकाः ।
सुवर्णवर्णाः कपिलाः प्रजानां वृत्तिधेनवः ॥ १८ ॥
उस सुरभिने बहुत-सी 'सौरभेयी' नामवाली गौओंको उत्पन्न किया, जो सम्पूर्ण जगत्के लिये माताके समान थीं। उन सबका रंग सुवर्णके समान उद्दीप्त हो रहा था। वे कपिला गौएँ प्रजाजनोंके लिये आजीविकारूप दूध देनेवाली थीं ॥ १८ ॥
तासाममृतवर्णानां क्षरन्तीनां समन्ततः ।
बभूवामृतजः फेनः स्रवन्तीनामिवोर्मिजः ॥ १९ ॥
जैसे नदियोंकी लहरोंसे फेन उत्पन्न होता है, उसी प्रकार चारों ओर दूधकी धारा बहाती हुई अमृत (सुवर्ण) के समान वर्णवाली उन गौओंके दूधसे फेन उठने लगा ॥ १९ ॥
स वत्समुखविभ्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठतः ।
शिरस्यवाप तत् क्रुद्धः स तदैक्षत च प्रभुः ॥ २० ॥
ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव ।
एक दिन भगवान् शंकर पृथ्वीपर खड़े थे। उसी समय सुरभिके एक बछड़ेके मुँहसे फेन निकलकर उनके मस्तकपर गिर पड़ा। इससे वे कुपित हो उठे और अपने ललाटजनित नेत्रसे, मानो रोहिणीको भस्म कर डालेंगे, इस तरह उसकी ओर देखने लगे ॥ २० १/२ ॥
तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिलास्ता विशाम्पते ॥ २१ ॥
नानावर्णत्वमनयन्मेघानिव दिवाकरः ।
प्रजानाथ! रुद्रका वह भयंकर तेज जिन-जिन कपिलाओंपर पड़ा, उनके रंग नाना प्रकारके हो गये। जैसे सूर्य बादलोंको अपनी किरणोंसे बहुरंगा बना देते हैं, उसी प्रकार उस तेजने उन सबको नाना वर्णवाली कर दिया ॥ २१ १/२ ॥
यास्तु तस्मादपक्रम्य सोममेवाभिसंश्रिताः ॥ २२ ॥
यथोत्पन्नाः स्ववर्णास्तास्ता ह्येता नान्यवर्णगाः ।
अथ क्रुद्धं महादेवं प्रजापतिरभाषत ॥ २३ ॥
परंतु जो गौएँ वहाँसे भागकर चन्द्रमाकी ही शरणमें चली गयीं, वे जैसे उत्पन्न हुई थीं वैसे ही रह गयीं। उनका रंग नहीं बदला। उस समय क्रोधमें भरे हुए महादेवजीसे दक्षप्रजापतिने कहा— ॥ २२-२३ ॥
अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम् ।
यथा ह्यमृतमादाय सोमो विस्यन्दते पुनः ॥ २४ ॥
तथा क्षीरं क्षरन्त्येता रोहिण्योऽमृतसम्भवम् ।
प्रभो! आपके ऊपर अमृतका छींटा पड़ा है। गौओंका दूध बछड़ोंके पीनेसे जूठा नहीं होता। जैसे चन्द्रमा अमृतका संग्रह करके फिर उसे बरसा देता है, उसी प्रकार ये रोहिणी गौएँ अमृतसे उत्पन्न दूध देती हैं ॥ २४ १/२ ॥
न दुष्यत्यनिलो नाग्निर्न सुवर्णं न चोदधिः ॥ २५ ॥
नामृतेनामृतं पीतं वत्सपीता न वत्सला । इमाँल्लोकान् भरिष्यन्ति हविषा प्रस्रवेण च ॥ २६ ॥ आसामैश्वर्यमिच्छन्ति सर्वेऽमृतमयं शुभम् । 'जैसे वायु, अग्नि, सुवर्ण, समुद्र और देवताओंका पीया हुआ अमृत—ये वस्तुएँ उच्छिष्ट नहीं होतीं, उसी प्रकार बछड़ोंके पीनेपर उन बछड़ोंके प्रति स्नेह रखनेवाली गौ भी दूषित या उच्छिष्ट नहीं होती। (तात्पर्य यह कि दूध पीते समय बछड़ेके मुँहसे गिरा हुआ झाग अशुद्ध नहीं माना जाता।) ये गौएँ अपने दूध और घीसे इस सम्पूर्ण जगत्का पालन करेंगी। सब लोग चाहते हैं कि इन गौओंके पास मंगलकारी अमृतमय दुग्धकी सम्पत्ति बनी रहे' ॥ २५-२६½ ॥
वृषभं च ददौ तस्मै सह गोभिः प्रजापतिः ॥ २७ ॥ प्रसादयामास मनस्तेन रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! ऐसा कहकर प्रजापतिने महादेवजीको बहुत-सी गौएँ और एक बैल भेंट किये तथा इसी उपायके द्वारा उनके मनको प्रसन्न किया ॥ २७½ ॥
प्रीतश्चापि महादेवश्चकार वृषभं तदा ॥ २८ ॥ ध्वजं च वाहनं चैव तस्मात् स वृषभध्वजः । महादेवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने वृषभको अपना वाहन बनाया और उसीकी आकृतिसे अपनी ध्वजाको चिह्नित किया, इसीलिये वे 'वृषभध्वज' कहलाये ॥
ततो देवैर्महादेवस्तदा पशुपतिः कृतः । ईश्वरः स गवां मध्ये वृषभाङ्कः प्रकीर्तितः ॥ २९ ॥ तदनन्तर देवताओंने महादेवजीको पशुओंका अधिपति बना दिया और गौओंके बीचमें उन महेश्वरका नाम 'वृषांक' रख दिया ॥ २९ ॥
एवमव्यग्रवर्णानां कपिलानां महौजसाम् । प्रदाने प्रथमः कल्पः सर्वासामेव कीर्तितः ॥ ३० ॥ इस प्रकार कपिला गौएँ अत्यन्त तेजस्विनी और शान्त वर्णवाली हैं। इसीसे दानमें उन्हें सब गौओंसे प्रथम स्थान दिया गया है ॥ ३० ॥
लोकज्येष्ठा लोकवृत्तिप्रवृत्ता रुद्रोपेताः सोमविष्यन्दभूताः । सौम्याः पुण्याः कामदाः प्राणदाश्च गा वै दत्त्वा सर्वकामप्रदः स्यात् ॥ ३१ ॥ गौएँ संसारकी सर्वश्रेष्ठ वस्तु हैं। ये जगत्को जीवन देनेके कार्यमें प्रवृत्त हुई हैं। भगवान् शंकर सदा उनके साथ रहते हैं। वे चन्द्रमासे निकले हुए अमृतसे उत्पन्न हुई हैं तथा शान्त, पवित्र, समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाली और जगत्को प्राणदान देनेवाली हैं; अतः गोदान करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका दाता माना गया है ॥ ३१ ॥
इदं गवां प्रभवविधानमुत्तमं
पठन् सदाशुचिरपि मंगलप्रियः ।
विमुच्यते कलिकलुषेण मानवः
श्रियं सुतान् धनपशुमाप्नुयात् सदा ॥ ३२ ॥
गौओंकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाली इस उत्तम कथाका सदा पाठ करनेवाला मनुष्य अपवित्र हो तो भी मंगलप्रिय हो जाता है और कलियुगके सारे दोषोंसे छूट जाता है। इतना ही नहीं, उसे पुत्र, लक्ष्मी, धन तथा पशु आदिकी सदा प्राप्ति होती है ॥ ३२ ॥
हव्यं कव्यं तर्पणं शान्तिकर्म
यानं वासो वृद्धबालस्य तुष्टिः ।
एतान् सर्वान् गोप्रदाने गुणान् वै
दाता राजन्नाप्नुयाद् वै सदैव ॥ ३३ ॥
राजन्! गोदान करनेवालेको हव्य, कव्य, तर्पण और शान्तिकर्मका फल तथा वाहन, वस्त्र एवं बालकों और वृद्धोंको संतोष प्राप्त होता है। इस प्रकार ये सब गोदानके गुण हैं। दाता इन सबको सदा पाता ही है ॥ ३३ ॥
वैशम्पायन उवाच
पितामहस्याथ निशम्य वाक्यं
राजा सह भ्रातृभिराजमीढः ।
सुवर्णवर्णानडुहस्तथा गाः
पार्थो ददौ ब्राह्मणसत्तमेभ्यः ॥ ३४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! पितामह भीष्मकी ये बातें सुनकर अजमीढवंशी राजा युधिष्ठिर और उनके भाइयोंने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके समान रंगवाले बैलों और उत्तम गौओंका दान किया ॥ ३४ ॥
तथैव तेभ्योऽपि ददौ द्विजेभ्यो
गवां सहस्राणि शतानि चैव ।
यज्ञान् समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे
लोकान् विजेतुं परमां च कीर्तिम् ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार यज्ञोंकी दक्षिणाके लिये, पुण्यलोकोंपर विजय पानेके लिये तथा संसारमें अपनी उत्तम कीर्तिका विस्तार करनेके लिये राजाने उन्हीं ब्राह्मणोंको सैकड़ों और हजारों गौएँ दान कीं ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रभवकथने
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गौओंकी उत्पत्तिका वर्णनविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७७ ।।
अध्याय (पृष्ठ 688)
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः
वसिष्ठका सौदासको गोदानकी विधि एवं महिमा बताना
भीष्म उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वसिष्ठमृषिसत्तमम् ।
इक्ष्वाकुवंशजो राजा सौदासो वदतां वरः ॥ १ ॥
सर्वलोकचरं सिद्धं ब्रह्मकोशं सनातनम् ।
पुरोहितमभिप्रष्टुमभिवाद्योपचक्रमे ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! एक समयकी बात है, वक्ताओंमें श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदासने सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले, वैदिक ज्ञानके भण्डार, सिद्ध सनातन ऋषिश्रेष्ठ वसिष्ठजीसे, जो उन्हींके पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरम्भ किया ॥ १-२ ॥
सौदास उवाच
त्रैलोक्ये भगवन् किंस्वित् पवित्रं कथ्यतेऽनघ ।
यत् कीर्तयन् सदा मर्त्यः प्राप्नुयात् पुण्यमुत्तमम् ॥ ३ ॥
सौदास बोले—भगवन्! निष्पाप महर्षे! तीनों लोकोंमें ऐसी पवित्र वस्तु कौन कही जाती है जिसका नाम लेनेमात्रसे मनुष्यको सदा उत्तम पुण्यकी प्राप्ति हो सके? ॥ ३ ॥
भीष्म उवाच
तस्मै प्रोवाच वचनं प्रणताय हितं तदा ।
गवामुपनिषद्द्विद्वान् नमस्कृत्य गवां शुचिः ॥ ४ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! अपने चरणोंमें पड़े हुए राजा सौदाससे गवोपनिषद् (गौओंकी महिमाके गूढ़ रहस्यको प्रकट करनेवाली विद्या) के विद्वान् पवित्र महर्षि वसिष्ठने गौओंको नमस्कार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया— ॥ ४ ॥
गावः सुरभिगन्धिन्यस्तथा गुग्गुलुगन्धयः ।
गावः प्रतिष्ठा भूतानां गावः स्वस्त्ययनं महत् ॥ ५ ॥
'राजन्! गौओंके शरीरसे अनेक प्रकारकी मनोरम सुगन्ध निकलती रहती है तथा बहुतेरी गौएँ गुग्गुलके समान गन्धवाली होती हैं। गौएँ समस्त प्राणियोंकी प्रतिष्ठा (आधार) हैं और गौएँ ही उनके लिये महान् मंगलकी निधि हैं ॥ ५ ॥
गावो भूतं च भव्यं च गावः पुष्टिः सनातनी ।
गावो लक्ष्म्यास्तथा मूलं गोषु दत्तं न नश्यति ॥ ६ ॥
गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। गौएँ ही सदा रहनेवाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मीकी जड़ हैं। गौओंको जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता ॥ ६ ॥
अन्नं हि परमं गावो देवानां परमं हविः ।
स्वाहाकारवषट्कारौ गोषु नित्यं प्रतिष्ठितौ ॥ ७ ॥
‘गौएँ ही सर्वोत्तम अन्नकी प्राप्तिमें कारण हैं। वे ही देवताओंको उत्तम हविष्य प्रदान करती हैं। स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषट्कार (इन्द्रयाग)—ये दोनों कर्म सदा गौओंपर ही अवलम्बित हैं ॥ ७ ॥
गावो यज्ञस्य हि फलं गोषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ।
गावो भविष्यं भूतं च गोषु यज्ञाः प्रतिष्ठिताः ॥ ८ ॥
‘गौएँ ही यज्ञका फल देनेवाली हैं। उन्हींमें यज्ञोंकी प्रतिष्ठा है। गौएँ ही भूत और भविष्य हैं। उन्हींमें यज्ञ प्रतिष्ठित हैं, अर्थात् यज्ञ गौओंपर ही निर्भर है ॥ ८ ॥
सायं प्रातश्च सततं होमकाले महाद्युते ।
गावो ददति वै हव्यमृषिभ्यः पुरुषर्षभ ॥ ९ ॥
‘महातेजस्वी पुरुषप्रवर! प्रातःकाल और सायंकाल सदा होमके समय ऋषियोंको गौएँ ही हवनीय पदार्थ (घृत आदि) देती हैं ॥ ९ ॥
यानि कानि च दुर्गाणि दुष्कृतानि कृतानि च ।
तरन्ति चैव पाप्मानं धेनुं ये ददति प्रभो ॥ १० ॥
‘प्रभो! जो लोग (नवप्रसूतिका दूध देनेवाली) गौका दान करते हैं, वे जो कोई भी दुर्गम संकट आनेवाले होते हैं, उन सबसे अपने किये हुए दुष्कर्मोंसे तथा समस्त पापसमूहसे भी तर जाते हैं ॥ १० ॥
एकां च दशगुर्दद्याद् दश दद्याच्च गोशती ।
शतं सहस्रगुर्दद्यात् सर्वे तुल्यफला हि ते ॥ ११ ॥
‘जिसके पास दस गौएँ हों, वह एक गौका दान करे। जो सौ गायें रखता हो, वह दस गौओंका दान करे और जिसके पास एक हजार गौएँ मौजूद हों, वह सौ गौएँ दानमें दे दे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है ॥ ११ ॥
अनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः ।
समृद्धो यश्च कीनाशो नार्घ्यमर्हन्ति ते त्रयः ॥ १२ ॥
‘जो सौ गौओंका स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हजार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कृपणता नहीं छोड़ता—ये तीनों मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पानेके अधिकारी नहीं हैं ॥ १२ ॥
कपिलां ये प्रयच्छन्ति सवत्सां कांस्यदोहनाम् ।
सुव्रतां वस्त्रसंवीतामुभौ लोकौ जयन्ति ते ॥ १३ ॥
महर्षि वशिष्ठका राजा सौदाससे गौओंका माहात्म्य-कथन
'जो उत्तम लक्षणोंसे युक्त कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़ेसहित उसका दान करते हैं और उसके साथ दूध दुहनेके लिये एक काँस्यका पात्र भी देते हैं, वे इहलोक और परलोक दोनोंपर विजय पाते हैं ॥ १३ ॥
महर्षि वशिष्ठका राजा सौदाससे गौओंका माहात्म्य-कथन
युवानमिन्द्रियोपेतं शतेन शतयूथपम् ।
गवेन्द्रं ब्राह्मणेन्द्राय भूरिशृंगमलङ्कृतम् ॥ १४ ॥
वृषभं ये प्रयच्छन्ति श्रोत्रियाय परंतप ।
ऐश्वर्यं तेऽधिगच्छन्ति जायमानाः पुनः पुनः ॥ १५ ॥
'शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! जो लोग जवान, सभी इन्द्रियोंसे सम्पन्न, सौ गायोंके यूथपति, बड़ी-बड़ी सींगोंवाले गवेन्द्र वृषभ (साँड़) को सुसज्जित करके सौ गायोंसहित उसे श्रोत्रिय ब्राह्मणको दान करते हैं, वे जब-जब इस संसारमें जन्म लेते हैं, तब-तब महान् ऐश्वर्यके भागी होते हैं ॥ १४-१५ ॥
नाकीर्तयित्वा गाः सुप्यात् तासां संस्मृत्य चोत्पतेत् ।
सायंप्रातर्नमस्येच्च गास्ततः पुष्टिमवाप्नुयात् ॥ १६ ॥
‘गौओंका नाम-कीर्तन किये बिना न सोये। उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है ।। १६ ।। गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कथंचन । न चासां मांसमश्रीयाद् गवां पुष्टिं तथाप्नुयात् ।। १७ ।। ‘गौओंके मूत्र और गोबरसे किसी प्रकार उद्विग्न न हो—घृणा न करे और उनका मांस न खाय। इससे मनुष्यको पुष्टि प्राप्त होती है ।। १७ ।। गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येत तास्तथा । अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तयेत् ।। १८ ।। ‘प्रतिदिन गौओंका नाम ले। उनका कभी अपमान न करे। यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले ।। १८ ।। गोमयेन सदा स्नायात् करीषे चापि संविशेत् । श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जयेत् ।। १९ ।। ‘प्रतिदिन शरीरमें गोबर लगाकर स्नान करे। सूखे हुए गोबरपर बैठे। उसपर थूक न फेंके, मल-मूत्र न छोड़े तथा गौओंके तिरस्कारसे बचता रहे ।। १९ ।। सार्द्रे चर्मणि भुञ्जीत निरीक्षेद् वारुणीं दिशम् । वाग्यतः सर्पिषा भूमौ गवां पुष्टिं सदाश्रुते ।। २० ।। ‘भीगे हुए गोचर्मपर बैठकर भोजन करे। पश्चिम दिशाकी ओर देखे और मौन हो भूमिपर बैठकर घीका भक्षण करे। इससे सदा गौओंकी वृद्धि एवं पुष्टि होती है ।। २० ।। घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं दद्याद् घृतं प्राशेद् गवां पुष्टिं सदाश्रुते ।। २१ ।। ‘अग्निमें घृतसे हवन करे। घृतसे ही स्वस्तिवाचन कराये। घृतका दान करे और स्वयं भी गौका घृत ही खाय। इससे मनुष्य सदा गौओंकी पुष्टि वृद्धिका अनुभव करता है ।। २१ ।। गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य यः । सर्वरत्नमयीं दद्यान्न स शोचेत् कृताकृते ।। २२ ।। ‘जो मनुष्य सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त तिलकी धेनुको ‘गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि’ इत्यादि गोमती-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्मके लिये शोक नहीं करता ।। २२ ।। गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्ग्यः पयोमुचः । सुरभ्यः सौरभेय्यश्च सरितः सागरं यथा ।। २३ ।। ‘जैसे नदियाँ समुद्रके पास जाती हैं, उसी तरह सोनेसे मढ़ी हुई सींगोंवाली, दूध देनेवाली सुरभी और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आयें ।। २३ ।। गा वै पश्याम्यहं नित्यं गावः पश्यन्तु मां सदा ।
गावोऽस्माकं वयं तासां यतो गावस्ततो वयम् ।। २४ ।।
‘मैं सदा गौओंका दर्शन करूँ और गौएँ मुझपर कृपा-दृष्टि करें। गौएँ हमारी हैं और हम गौओंके हैं। जहाँ गौएँ रहें, वहीं हम रहें’ ।। २४ ।।
एवं रात्रौ दिवा चापि समेषु विषमेषु च ।
महाभयेषु च नरः कीर्तयन् मुच्यते भयात् ।। २५ ।।
‘जो मनुष्य इस प्रकार रातमें या दिनमें, सम अवस्थामें या विषम अवस्थामें तथा बड़े-से-बड़े भय आनेपर भी गोमाताका नामकीर्तन करता है, वह भयसे मुक्त हो जाता है’ ।। २५ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७८ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७८ ।।
अध्याय (पृष्ठ 693)
एकोनाशीतितमोऽध्यायः
गौओंको तपस्याद्वारा अभीष्ट वरकी प्राप्ति तथा उनके दानकी महिमा, विभिन्न प्रकारके गौओंके दानसे विभिन्न उत्तम लोकोंमें गमनका कथन
वसिष्ठ उवाच
शतं वर्षसहस्राणां तपस्तप्तं सुदुष्करम् ।
गोभिः पूर्वं विसृष्टाभिर्गच्छेम श्रेष्ठतामिति ॥ १ ॥
लोकेऽस्मिन् दक्षिणानां च सर्वासां वयमुत्तमाः ।
भवेम न च लिप्यैम दोषेणेति परंतप ॥ २ ॥
अस्मत्पुरीषस्नानेन जनः पूयेत सर्वदा ।
शकृता च पवित्रार्थं कुर्वीरन् देवमानुषाः ॥ ३ ॥
तथा सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च ।
प्रदातारश्च लोकान् नो गच्छेयुरिति मानद ॥ ४ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं— मानद परंतप! प्राचीन कालमें जब गौओंकी सृष्टि हुई थी, तब उन गौओंने एक लाख वर्षोंतक बड़ी कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्याका उद्देश्य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें। इस जगत्में जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुएँ हैं, उन सबमें हम उत्तम समझी जायँ। किसी दोषसे लिप्त न हों। हमारे गोबरसे स्नान करनेपर सदा सब लोग पवित्र हों। देवता और मनुष्य पवित्रताके लिये हमेशा हमारे गोबरका उपयोग करें। समस्त चराचर प्राणी भी हमारे गोबरसे पवित्र हो जायँ और हमारा दान करनेवाले मनुष्य हमारे ही लोक (गोलोकधाम) में जायँ ॥
ताभ्यो वरं ददौ ब्रह्मा तपसोऽन्ते स्वयं प्रभुः ।
एवं भवत्विति प्रभुर्लोकांस्तारयतेति च ॥ ५ ॥
जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन्हें वर दिया—'गौओ! ऐसा ही हो—तुम्हारे मनमें जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो। तुम सम्पूर्ण जगत्के जीवोंका उद्धार करती रहो' ॥ ५ ॥
उत्तस्थुः सिद्धकामास्ता भूतभव्यस्य मातरः ।
प्रातर्नमस्यास्ता गावस्ततः पुष्टिमवाप्नुयात् ॥ ६ ॥
इस प्रकार अपनी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जानेपर गौएँ तपस्यासे उठीं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों कालोंकी जननी हैं; अतः प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गौओंको प्रणाम करना चाहिये। इससे मनुष्योंको पुष्टि प्राप्त होती है ॥ ६ ॥
तपसोऽन्ते महाराज गावो लोकपरायणाः । तस्माद् गावो महाभागाः पवित्रं परमुच्यते ॥ ७ ॥ महाराज! तपस्या समाप्त होनेपर गौएँ सम्पूर्ण जगत्का आश्रय बन गयीं; इसलिये वे महान् सौभाग्यशालिनी गौएँ परम पवित्र बतायी जाती हैं ॥ ७ ॥ तथैव सर्वभूतानां समतिष्ठन्त मूर्धनि । समानवत्सां कपिलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां ब्रह्मलोके महीयते ॥ ८ ॥ ये समस्त प्राणियोंके मस्तकपर स्थित हैं (अर्थात् सबसे श्रेष्ठ एवं वन्दनीय हैं)। जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कपिला गौको वस्त्र ओढ़ाकर कपिल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह ब्रह्मलोकमें सम्मानित होता है ॥ ८ ॥ लोहितां तुल्यवत्सां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सूर्यलोके महीयते ॥ ९ ॥ जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा लाल रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह सूर्यलोकमें सम्मानित होता है ॥ ९ ॥ समानवत्सां शबलां धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां सोमलोके महीयते ॥ १० ॥ जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा चितकबरी गौको वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़ेसहित दान करता है, वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १० ॥ समानवत्सां श्वेतां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामिन्द्रलोके महीयते ॥ ११ ॥ जो मानव दूध देनेवाली सुलक्षणा श्वेत वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर श्वेत वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, उसे इन्द्रलोकमें सम्मान प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ समानवत्सां कृष्णां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतामग्निलोके महीयते ॥ १२ ॥ जो मनुष्य दूध देनेवाली सुलक्षणा कृष्ण वर्णकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर कृष्ण वर्णके बछड़ेसहित दान करता है, वह अग्निलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १२ ॥ समानवत्सां धूम्रां तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां याम्यलोके महीयते ॥ १३ ॥ जो पुरुष दूध देनेवाली सुलक्षणा धूएँ-जैसे रंगकी गौको वस्त्र ओढ़ाकर धूएँके समान रंगके बछड़ेसहित दान करता है, वह यमलोकमें सम्मानित होता है ॥ १३ ॥ अपां फेनसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वारुणं लोकमाप्नुते ॥ १४ ॥
जो जलके फेनके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह वरुणलोकको प्राप्त होता है ॥ १४ ॥ वातरेणुसवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां वायुलोके महीयते ॥ १५ ॥ जो हवासे उड़ी हुई धूलके समान रंगवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, उसकी वायुलोकमें पूजा होती है ॥ १५ ॥ हिरण्यवर्णां पिंगाक्षीं सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां कौबेरं लोकमश्नुते ॥ १६ ॥ जो सुवर्णके समान रंग तथा पिंगल वर्णके नेत्रवाली गौको वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह कुबेर-लोकको प्राप्त होता है ॥ १६ ॥ पलालधूम्रवर्णां तु सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां पितृलोके महीयते ॥ १७ ॥ जो पुआलके धूएँके समान रंगवाली बछड़ेसहित गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह पितृलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७ ॥ सवत्सां पीवरीं दत्त्वा दृतिकण्ठामलंकृताम् । वैश्वदेवमसम्बाधं स्थानं श्रेष्ठं प्रपद्यते ॥ १८ ॥ जो लटकते हुए गलकम्बलसे युक्त मोटी-ताजी सवत्सा गौको अलंकृत करके ब्राह्मणको दान देता है, वह बिना किसी बाधाके विश्वेदेवोंके श्रेष्ठ लोकमें पहुँच जाता है ॥ १८ ॥ समानवत्सां गौरीं तु धेनुं दत्त्वा पयस्विनीम् । सुव्रतां वस्त्रसंवीतां वसूनां लोकमाप्नुयात् ॥ १९ ॥ जो गौर वर्णवाली और दूध देनेवाली शुभलक्षणा गौको वस्त्र ओढ़ाकर समान रंगवाले बछड़ेसहित दान करता है, वह वसुओंके लोकमें जाता है ॥ १९ ॥ पाण्डुकम्बलवर्णाभां सवत्सां कांस्यदोहनाम् । प्रदाय वस्त्रसंवीतां साध्यानां लोकमाप्नुते ॥ २० ॥ जो श्वेत कम्बलके समान रंगवाली सवत्सा गौको वस्त्रसे आच्छादित करके कांस्यके दुग्धपात्रसहित दान करता है, वह साध्योंके लोकमें जाता है ॥ २० ॥ वैराटपृष्ठमुक्षाणं सर्वरत्नैरलंकृतम् । प्रदन्मरुतां लोकान् स राजन् प्रतिपद्यते ॥ २१ ॥ राजन्! जो विशालपृष्ठभागवाले बैलको सब प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद्गणोंके लोकोंमें जाता है ॥ २१ ॥ वयोपपन्नं लीलांगं सर्वरत्नसमन्वितम् । गन्धर्वाप्सरसां लोकान् दत्त्वा प्राप्नोति मानवः ॥ २२ ॥
जो मनुष्य यौवनसे सम्पन्न और सुन्दर अंगवाले बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्वों और अप्सराओंके लोकोंको प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
दृतिकण्ठमनड्वाहं सर्वरत्नैरलंकृतम् । दत्त्वा प्रजापतेर्लोकान् विशोकः प्रतिपद्यते ॥ २३ ॥ जो लटकते हुए गलकम्बलवाले तथा गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ बैलको सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत करके ब्राह्मणको देता है, वह शोकरहित हो प्रजापतिके लोकोंमें जाता है ॥ २३ ॥
गोप्रदानरतो याति भित्त्वा जलदसंचयान् । विमानेनार्कवर्णेन दिवि राजन् विराजते ॥ २४ ॥ राजन्! गोदानमें अनुरागपूर्वक तत्पर रहनेवाला पुरुष सूर्यके समान देदीप्यमान विमानमें बैठकर मेघमण्डलको भेदता हुआ स्वर्गमें जाकर सुशोभित होता है ॥ २४ ॥
तं चारुवेषाः सुश्रोण्यः सहस्रं सुरयोषितः । रमयन्ति नरश्रेष्ठं गोप्रदानरतं नरम् ॥ २५ ॥ उस गोदानपरायण श्रेष्ठ मनुष्यको मनोहर वेष और सुन्दर नितम्बवाली सहस्रों देवांगनाएँ (अपनी सेवासे) रमण कराती हैं ॥ २५ ॥
वीणानां वल्लकीनां च नूपुराणां च सिञ्जितैः । हासैश्च हरिणाक्षीणां सुप्तः स प्रतिबोध्यते ॥ २६ ॥ वह वीणा और वल्लकीके मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियोंके नूपुरोंकी मनोहर झनकारों तथा हास-परिहासके शब्दोंको श्रवण करके नींदसे जागता है ॥ २६ ॥
यावन्ति रोमाणि भवन्ति धेन्वा- स्तावन्ति वर्षाणि महीयते सः । स्वर्गच्युतश्चापि ततो नृलोके प्रसूयते वै विपुले गृहे सः ॥ २७ ॥ गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। फिर पुण्यक्षीण होनेपर जब स्वर्गसे नीचे उतरता है, तब इस मनुष्यलोकमें आकर सम्पन्न घरमें जन्म लेता है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकोनाशीतितमोऽध्यायः ॥ ७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 697)
अशीतितमोऽध्यायः
गौओं तथा गोदानकी महिमा
वसिष्ठ उवाच
घृतक्षीरप्रदा गावो घृतयोन्यो घृतोद्भवाः ।
घृतनद्यो घृतावर्तास्ता मे सन्तु सदा गृहे ॥ १ ॥
घृतं मे हृदये नित्यं घृतं नाभ्यां प्रतिष्ठितम् ।
घृतं सर्वेषु गात्रेषु घृतं मे मनसि स्थितम् ॥ २ ॥
गावो ममाग्रतो नित्यं गावः पृष्ठत एव च ।
गावो मे सर्वतश्चैव गवां मध्ये वसाम्यहम् ॥ ३ ॥
इत्याचम्य जपेत् सायं प्रातश्च पुरुषः सदा ।
यदह्ना कुरुते पापं तस्मात् स परिमुच्यते ॥ ४ ॥
**वसिष्ठजी कहते हैं—**राजन्! मनुष्यको चाहिये कि सदा सबेरे और सायंकाल आचमन करके इस प्रकार जप करे—'घी और दूध देनेवाली, घीकी उत्पत्तिका स्थान, घीको प्रकट करनेवाली, घीकी नदी तथा घीकी भँवर्रूप गौएँ मेरे घरमें सदा निवास करें। गौका घी मेरे हृदयमें सदा स्थित रहे। घी मेरी नाभिमें प्रतिष्ठित हो। घी मेरे सम्पूर्ण अंगोंमें व्याप्त रहे और घी मेरे मनमें स्थित हो। गौएँ मेरे आगे रहें। गौएँ मेरे पीछे भी रहें। गौएँ मेरे चारों ओर रहें और मैं गौओंके बीचमें निवास करूँ।' इस प्रकार प्रतिदिन जप करनेवाला मनुष्य दिनभरमें जो पाप करता है, उससे छुटकारा पा जाता है ॥ १—४ ॥
प्रासादा यत्र सौवर्णा वसोर्धारा च यत्र सा ।
गन्धर्वाप्सरसो यत्र तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ५ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले मनुष्य जहाँ सोनेके महल हैं, जहाँ स्वर्गगंगा बहती हैं तथा जहाँ गन्धर्व और अप्सराएँ निवास करती हैं, उस स्वर्गलोकमें जाते हैं ॥
नवनीतपङ्काः क्षीरोदा दधिशैवलसंकुलाः ।
वहन्ति यत्र वै नद्यस्तत्र यान्ति सहस्रदाः ॥ ६ ॥
सहस्र गौओंका दान करनेवाले पुरुष जहाँ दूधके जलसे भरी हुई, दहीके सेवारसे व्याप्त हुई तथा मक्खनरूपी कीचड़से युक्त हुई नदियाँ बहती हैं, वहीं जाते हैं ॥ ६ ॥
गवां शतसहस्रं तु यः प्रयच्छेद यथाविधि ।
परां वृद्धिमवाप्याथ स्वर्गलोके महीयते ॥ ७ ॥
जो विधिपूर्वक एक लाख गौओंका दान करता है, वह अत्यन्त अभ्युदयको पाकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है ॥ ७ ॥
दश चोभयतः पुत्रो मातापित्रोः पितामहान् ।
दधाति सुकृतान् लोकान् पुनाति च कुलं नरः ॥ ८ ॥
वह मनुष्य अपने माता और पिताकी दस-दस पीढ़ियोंको पवित्र करके उन्हें पुण्यमय लोकोंमें भेजता है और अपने कुलको भी पवित्र कर देता है ॥ ८ ॥
धेन्वाः प्रमाणेन समप्रमाणां
धेनुं तिलानामपि च प्रदाय ।
पानीयदाता च यमस्य लोके
न यातनां काञ्चिदुपैति तत्र ॥ ९ ॥
जो गायके बराबर तिलकी गाय बनाकर उसका दान करता है, अथवा जो जलधेनुका दान करता है, उसे यमलोकमें जाकर वहाँकी कोई यातना नहीं भोगनी पड़ती है ॥ ९ ॥
पवित्रमग्रयं जगतः प्रतिष्ठा
दिवौकसां मातरोऽथाप्रमेयाः ।
अन्वालभेद् दक्षिणतो व्रजेच्च
दद्याच्च पात्रे प्रसमीक्ष्य कालम् ॥ १० ॥
गौ सबसे अधिक पवित्र, जगत्का आधार और देवताओंकी माता है। उसकी महिमा अप्रमेय है। उसका सादर स्पर्श करे और उसे दाहिने रखकर चले तथा उत्तम समय देखकर उसका सुपात्र ब्राह्मणको दान करे ॥ १० ॥
धेनुं सवत्सां कपिलां भूरिशृंगीं
कांस्योपदोहां वसनोत्तरीयाम् ।
प्रदाय तां गाहति दुर्विगाह्यां
याम्यां सभां वीतभयो मनुष्यः ॥ ११ ॥
जो बड़े-बड़े सींगोंवाली कपिला धेनुको वस्त्र ओढ़ाकर उसे बछड़े और काँसीकी दोहनीसहित ब्राह्मणको दान करता है, वह मनुष्य यमराजकी दुर्गम सभामें निर्भय होकर प्रवेश करता है ॥ ११ ॥
सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः ।
गावो मामुपतिष्ठन्तामिति नित्यं प्रकीर्तयेत् ॥ १२ ॥
प्रतिदिन यह प्रार्थना करनी चाहिये कि सुन्दर एवं अनेक प्रकारके रूप-रंगवाली विश्वरूपिणी गोमाताएँ सदा मेरे निकट आयें ॥ १२ ॥
नातः पुण्यतरं दानं नातः पुण्यतरं फलम् ।
नातो विशिष्टं लोकेषु भूतं भवितुमर्हति ॥ १३ ॥
गोदानसे बढ़कर कोई पवित्र दान नहीं है। गोदानके फलसे श्रेष्ठ दूसरा कोई फल नहीं है तथा संसारमें गौसे बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट प्राणी नहीं है ॥ १३ ॥
त्वचा लोम्नाथशृंगैर्वा वालैः क्षीरेण मेदसा ।
यज्ञं वहति सम्भूय किमस्त्यभ्यधिकं ततः ॥ १४ ॥
त्वचा, रोम, सींग, पूँछके बाल, दूध और मेदा आदिके साथ मिलकर गौ (दूध, दही, घी आदिके द्वारा) यज्ञका निर्वाह करती है; अतः उससे श्रेष्ठ दूसरी कौन-सी वस्तु है ॥ १४ ॥
यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजंगमम् ।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम् ॥ १५ ॥
जिसने समस्त चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्यकी जननी गौको मैं मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ ॥ १५ ॥
गुणवचनसमुच्चयैकदेशो
नृवर मयैष गवां प्रकीर्तितस्ते ।
न च परमिह दानमस्ति गोभ्यो
भवति न चापि परायणं तथान्यत् ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! यह मैंने तुमसे गौओंके गुणवर्णनसम्बन्धी साहित्यका एक लघु अंशमात्र बताया है—दिग्दर्शनमात्र कराया है। गौओंके दानसे बढ़कर इस संसारमें दूसरा कोई दान नहीं है, तथा उनके समान दूसरा कोई आश्रय भी नहीं है ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच
वरमिदमिति भूमिदो विचिन्त्य
प्रवरमृषेर्वचनं ततो महात्मा ।
व्यसृजत नियतात्मवान् द्विजेभ्यः
सुबहु च गोधनमाप्तवांश्च लोकान् ॥ १७ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**महर्षि वसिष्ठके ये वचन सुनकर भूमिदान करनेवाले संयतात्मा महामना राजा सौदासने ‘यह बहुत उत्तम पुण्यकार्य है’ ऐसा सोचकर ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान दीं। इससे उन्हें उत्तम लोकोंकी प्राप्ति हुई ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥
गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन
एकाशीतितमोऽध्यायः
गौओंका माहात्म्य तथा व्यासजीके द्वारा शुकदेवसे गौओंकी, गोलोककी और गोदानकी महत्ताका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पवित्राणां पवित्रं यच्छिष्टं लोके च यद् भवेत् ।
पावनं परमं चैव तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— पितामह! संसारमें जो वस्तु पवित्रोंमें भी पवित्र तथा लोकमें पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
गावो महार्थाः पुण्याश्च तारयन्ति च मानवान् ।
धारयन्ति प्रजाश्चैमा हविषा पयसा तथा ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! गौएँ महान् प्रयोजन सिद्ध करनेवाली तथा परम पवित्र हैं। ये मनुष्योंको तारनेवाली हैं और अपने दूध-घीसे प्रजावर्गके जीवनकी रक्षा करती हैं ॥ २ ॥
न हि पुण्यतमं किंचिद् गोभ्यो भरतसत्तम ।
एताः पुण्याः पवित्राश्च त्रिषु लोकेषु सत्तमाः ॥ ३ ॥
भरतश्रेष्ठ! गौओंसे बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥
देवानामुपरिष्टाच्च गावः प्रतिवसन्ति वै ।
दत्त्वा चैतास्तारयन्ते यान्ति स्वर्गं मनीषिणः ॥ ४ ॥
गौएँ देवताओंसे भी ऊपरके लोकोंमें निवास करती हैं। जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने आपको तारते हैं और स्वर्गमें जाते हैं ॥ ४ ॥
मान्धाता यौवनाश्वश्च ययातिर्नहुषस्तथा ।
गा वै ददन्तः सततं सहस्रशतसम्मिताः ॥ ५ ॥
गताः परमकं स्थानं देवैरपि सुदुर्लभम् ।
युवनाश्वके पुत्र राजा मान्धाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति—ये सदा लाखों गौओंका दान किया करते थे; इससे वे उन उत्तम स्थानोंको प्राप्त हुए हैं, जो देवताओंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं ॥ ५ १/२ ॥
अपि चात्र पुरागीतं कथयिष्यामि तेऽनघ ॥ ६ ॥
ऋषीणामुत्तमं धीमान् कृष्णद्वैपायनं शुकः ।
अभिवाद्याह्निककृतः शुचिः प्रयतमानसः ॥ ७ ॥
पितरं परिपप्रच्छ दृष्टलोकपरावरम् । को यज्ञः सर्वयज्ञानां वरिष्ठोऽभ्युपलक्ष्यते ॥ ८ ॥ निष्पाप नरेश! इस विषयमें मैं तुम्हें एक पुराना वृत्तान्त सुना रहा हूँ। एक समयकी बात है, परम बुद्धिमान् शुकदेवजीने नित्यकर्मका अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता—ऋषियोंमें उत्तम श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको, जो लोकके भूत और भविष्यको प्रत्यक्ष देखनेवाले हैं, प्रणाम करके पूछा—'पिताजी! सम्पूर्ण यज्ञोंमें कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? ।। ६–८ ।। किं च कृत्वा परं स्थानं प्राप्नुवन्ति मनीषिणः । केन देवाः पवित्रेण स्वर्गमश्नन्ति वा विभो ॥ ९ ॥ 'प्रभो! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थानको प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्यके द्वारा देवता स्वर्गलोकका उपभोग करते हैं? ।। ९ ।। किं च यज्ञस्य यज्ञत्वं क्व च यज्ञः प्रतिष्ठितः । देवानामुत्तमं किं च किं च सत्रमितः परम् ॥ १० ॥ 'यज्ञका यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओंके लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ।। १० ।। पवित्राणां पवित्रं च यत् तद् ब्रूहि पितर्मम । एतच्छ्रुत्वा तु वचनं व्यासः परमधर्मवित् । पुत्रायाकथयत् सर्वं तत्त्वेन भरतर्षभ ॥ ११ ॥ 'पिताजी! पवित्रोंमें पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातोंका मुझसे वर्णन कीजिये।' भरतश्रेष्ठ! पुत्र शुकदेवका यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यासने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं ।। ११ ।।
व्यास उवाच
गावः प्रतिष्ठा भूतानां तथा गावः परायणम् । गावः पुण्याः पवित्राश्च गोधनं पावनं तथा ॥ १२ ॥ व्यासजी बोले—बेटा! गौएँ सम्पूर्ण भूतोंकी प्रतिष्ठा हैं। गौएँ परम आश्रय हैं। गौएँ पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करनेवाला है ।। पूर्वमासन्नशृंगा वै गाव इत्यनुशुश्रुम । शृंगार्थे समुपासन्त ताः किल प्रभुमव्ययम् ॥ १३ ॥ हमने सुना है कि गौएँ पहले बिना सींगकी ही थीं। उन्होंने सींगके लिये अविनाशी भगवान् ब्रह्माकी उपासना की ।। १३ ।। ततो ब्रह्मा तु गाः प्रायमुपविष्टाः समीक्ष्य ह । ईप्सितं प्रददौ ताभ्यो गोभ्यः प्रत्येकशः प्रभुः ॥ १४ ॥
भगवान् ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी ॥ १४ ॥ तासां शृंगाण्यजायन्त यस्या यादृङ्मनोगतम् । नानावर्णाः शृंगवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक ॥ १५ ॥ बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात् गौओंके सींग प्रकट हो गये। जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकारके रूप-रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः । पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं ॥ १६ ॥ गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते । ये चैताः सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सराः ॥ १७ ॥ ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते । गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ॥ १८ ॥ गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है ॥ १७-१८ ॥ यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ॥ १९ ॥ द्विजश्रेष्ठ! गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं। वे दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं ॥ १९ ॥ सर्वा मणिमयी भूमिः सर्वकाञ्चनवालुका । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का निरजाः शुभाः ॥ २० ॥ वहाँकी भूमि मणिमयी है। वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है। उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है। वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है। वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है ॥ २० ॥ रक्तोत्पलवनैश्चैव मणिखण्डैर्हिरण्मयैः । तरुणादित्यसंकाशैर्भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ २१ ॥ वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः-कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं ॥ २१ ॥ महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्बहुपङ्कजैः ॥ २२ ॥
वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं॥ २२॥ करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः। संतानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृताः॥ २३॥ उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवतोंसे घिरे हुए हैं॥ २३॥ निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः। उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः॥ २४॥ उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं॥ २४॥ सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः। जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः॥ २५॥ कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं॥ २५॥ सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः। सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृंगैश्चारुभिरुच्छ्रितैः॥ २६॥ वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं॥ २६॥ नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः। दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ॥ २७॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं॥ रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर। सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः॥ २८॥ युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं॥ २८॥ विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत। मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः॥ २९॥ भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं॥ २९॥