भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 703, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 703

वहाँकी भूमि कितने ही सरोवरोंसे शोभा पाती है। उन सरोवरोंमें नीलोत्पलमिश्रित बहुत-से कमल खिले रहते हैं। उन कमलोंके दल बहुमूल्य मणिमय होते हैं और उनके केसर अपनी स्वर्णमयी प्रभासे प्रकाशित होते हैं॥ २२॥ करवीरवनैः फुल्लैः सहस्रावर्तसंवृतैः। संतानकवनैः फुल्लैर्वृक्षैश्च समलंकृताः॥ २३॥ उस लोकमें बहुत-सी नदियाँ हैं, जिनके तटोंपर खिले हुए कनेरोंके वन तथा विकसितसंतानक (कल्पवृक्ष-विशेष) के वन एवं अन्यान्य वृक्ष उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भागमें सहस्रों आवतोंसे घिरे हुए हैं॥ २३॥ निर्मलाभिश्च मुक्ताभिर्मणिभिश्च महाप्रभैः। उद्भूतपुलिनास्तत्र जातरूपैश्च निम्नगाः॥ २४॥ उन नदियोंके तटोंपर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं॥ २४॥ सर्वरत्नमयैश्चित्रैरवगाढा द्रुमोत्तमैः। जातरूपमयैश्चान्यैर्हुताशनसमप्रभैः॥ २५॥ कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभागके द्वारा उन नदियोंके जलमें प्रविष्ट दिखायी देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत-से वृक्ष प्रज्ज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होते हैं॥ २५॥ सौवर्णा गिरयस्तत्र मणिरत्नशिलोच्चयाः। सर्वरत्नमयैर्भान्ति शृंगैश्चारुभिरुच्छ्रितैः॥ २६॥ वहाँ सोनेके पर्वत तथा मणि और रत्नोंके शैलसमूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊँचे तथा सर्वरत्नमय शिखरोंसे सुशोभित होते हैं॥ २६॥ नित्यपुष्पफलास्तत्र नगाः पत्ररथाकुलाः। दिव्यगन्धरसैः पुष्पैः फलैश्च भरतर्षभ॥ २७॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँके वृक्षोंमें सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियोंसे भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलोंमें दिव्य सुगन्ध और दिव्य रस होते हैं॥ रमन्ते पुण्यकर्माणस्तत्र नित्यं युधिष्ठिर। सर्वकामसमृद्धार्था निःशोका गतमन्यवः॥ २८॥ युधिष्ठिर! वहाँ पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोधसे रहित, पूर्णकाम एवं सफलमनोरथ होते हैं॥ २८॥ विमानेषु विचित्रेषु रमणीयेषु भारत। मोदन्ते पुण्यकर्माणो विहरन्तो यशस्विनः॥ २९॥ भरतनन्दन! वहाँके यशस्वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानोंमें बैठकर यथेष्ट विहार करते हुए आनन्दका अनुभव करते हैं॥ २९॥

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