महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 702, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् ब्रह्माजीने गौओंको प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओंमेंसे प्रत्येकको उनकी अभीष्ट वस्तु दी ॥ १४ ॥ तासां शृंगाण्यजायन्त यस्या यादृङ्मनोगतम् । नानावर्णाः शृंगवन्त्यस्ता व्यरोचन्त पुत्रक ॥ १५ ॥ बेटा! वरदान मिलनेके पश्चात् गौओंके सींग प्रकट हो गये। जिसके मनमें जैसे सींगकी इच्छा थी, उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकारके रूप-रंग और सींगसे युक्त हुई उन गौओंकी बड़ी शोभा होने लगी ॥ ब्रह्मणा वरदत्तास्ता हव्यकव्यप्रदाः शुभाः । पुण्याः पवित्राः सुभगा दिव्यसंस्थानलक्षणाः ॥ १६ ॥ ब्रह्माजीका वरदान पाकर गौएँ मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करनेवाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणोंसे सम्पन्न हुईं ॥ १६ ॥ गावस्तेजो महद् दिव्यं गवां दानं प्रशस्यते । ये चैताः सम्प्रयच्छन्ति साधवो वीतमत्सराः ॥ १७ ॥ ते वै सुकृतिनः प्रोक्ताः सर्वदानप्रदाश्च ते । गवां लोकं तथा पुण्यमाप्नुवन्ति च तेऽनघ ॥ १८ ॥ गौएँ दिव्य एवं महान् तेज हैं। उनके दानकी प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्यका त्याग करके गौओंका दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानोंके दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव! उन्हें पुण्यमय गोलोककी प्राप्ति होती है ॥ १७-१८ ॥ यत्र वृक्षा मधुफला दिव्यपुष्पफलोपगाः । पुष्पाणि च सुगन्धीनि दिव्यानि द्विजसत्तम ॥ १९ ॥ द्विजश्रेष्ठ! गोलोकके सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देनेवाले हैं। वे दिव्य फल-फूलोंसे सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षोंके पुष्प दिव्य एवं मनोहर गन्धसे युक्त होते हैं ॥ १९ ॥ सर्वा मणिमयी भूमिः सर्वकाञ्चनवालुका । सर्वर्तुसुखसंस्पर्शा निष्पङ्का निरजाः शुभाः ॥ २० ॥ वहाँकी भूमि मणिमयी है। वहाँकी बालुका कांचनचूर्णरूप है। उस भूमिका स्पर्श सभी ऋतुओंमें सुखद होता है। वहाँ धूल और कीचड़का नाम भी नहीं है। वह भूमि सर्वथा मंगलमयी है ॥ २० ॥ रक्तोत्पलवनैश्चैव मणिखण्डैर्हिरण्मयैः । तरुणादित्यसंकाशैर्भान्ति तत्र जलाशयाः ॥ २१ ॥ वहाँके जलाशय लाल कमलवनोंसे तथा प्रातः-कालीन सूर्यके समान प्रकाशमान मणिजटित सुवर्णमय सोपानोंसे सुशोभित होते हैं ॥ २१ ॥ महार्हमणिपत्रैश्च काञ्चनप्रभकेसरैः । नीलोत्पलविमिश्रैश्च सरोभिर्बहुपङ्कजैः ॥ २२ ॥