महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 704, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपक्रीडन्ति तान् राजन् शुभाश्चाप्सरसां गणाः । एताल्लोँकानवाप्नोति गां दत्त्वा वै युधिष्ठिर ॥ ३० ॥ राजन्! उनके साथ सुन्दरी अप्सराएँ क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकोंमें जाते हैं ॥ ३० ॥
येषामधिपतिः पूषा मारुतो बलवान् बली । ऐश्वर्ये वरुणो राजा नाममात्रं युगन्धराः ॥ ३१ ॥ सुरूपा बहुरूपाश्च विश्वरूपाश्च मातरः । प्राजापत्यमिति ब्रह्मन् जपेन्नित्यं यतव्रतः ॥ ३२ ॥ नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और बलवान् वायु जिन लोकोंके अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकोंके ऐश्वर्यपर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकोंमें जाता है। गौएँ युगन्धरा, सुरूपा, बहुरूपा, विश्वरूपा तथा सबकी माताएँ हैं। शुकदेव! मनुष्य संयम-नियमके साथ रहकर गौओंके इन प्रजापतिकथित नामोंका प्रतिदिन जप करे ॥ ३१-३२ ॥
गाश्च शुश्रूषते यश्च समन्वेति च सर्वशः । तस्मै तुष्टाः प्रयच्छन्ति वरानपि सुदुर्लभान् ॥ ३३ ॥ जो पुरुष गौओंकी सेवा और सब प्रकारसे उनका अनुगमन करता है, उसपर संतुष्ट होकर गौएँ उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं ॥ ३३ ॥
द्रुह्येन्न मनसा वापि गोषु नित्यं सुखप्रदः । अर्चयेत सदा चैव नमस्कारैश्च पूजयेत् ॥ ३४ ॥ गौओंके साथ मनसे भी कभी द्रोह न करे, उन्हें सदा सुख पहुँचाये, उनका यथोचित सत्कार करे और नमस्कार आदिके द्वारा उनका पूजन करता रहे ॥ ३४ ॥
दान्तः प्रीतमना नित्यं गवां व्युष्टिं तथाश्नुते । त्र्यहमुष्णं पिबेन्मूत्रं त्र्यहमुष्णं पिबेत् पयः ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त होकर नित्य गौओंकी सेवा करता है, वह समृद्धिका भागी होता है। मनुष्य तीन दिनोंतक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनतक गरम गोदुग्ध पीकर रहे ॥ ३५ ॥
गवामुष्णं पयः पीत्वा त्र्यहमुष्णं घृतं पिबेत् । त्र्यहमुष्णं घृतं पीत्वा वायुभक्षो भवेत् त्र्यहम् ॥ ३६ ॥ गरम गोदुग्ध पीनेके पश्चात् तीन दिनोंतक गरम-गरम गोघृत पीये। तीन दिनतक गरम घी पीकर फिर तीन दिनोंतक वह वायु पीकर रहे ॥ ३६ ॥
येन देवाः पवित्रेण भुञ्जते लोकमुत्तमम् । यत् पवित्रं पवित्राणां तद् घृतं शिरसा वहेत् ॥ ३७ ॥ देवगण भी जिस पवित्र घृतके प्रभावसे उत्तम-उत्तम लोकका पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओंमें सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृतको शिरोधार्य करे ॥ ३७ ॥