भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 705, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 705

घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं प्राशेद् घृतं दद्याद् गवां पुष्टिं तथाश्रुते ॥ ३८ ॥ गायके घीके द्वारा अग्निमें आहुति दे। घृतकी दक्षिणा देकर ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। घृत भोजन करे तथा गोघृतका ही दान करे। ऐसा करनेसे मनुष्य गौओंकी समृद्धि एवं अपनी पुष्टिका अनुभव करता है ॥ ३८ ॥

निर्हृतैश्च यवैर्गोभिर्मासं प्रश्रितयावकः । ब्रह्महत्यासमं पापं सर्वमेतेन शुध्यते ॥ ३९ ॥ गौओंके गोबरसे निकाले हुए जौकी लप्सीका एक मासतक भक्षण करे। इससे मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापसे भी छुटकारा पा जाता है ॥ ३९ ॥

पराभवाच्च दैत्यानां देवैः शौचमिदं कृतम् । ते देवत्वमपि प्राप्ताः संसिद्धाश्च महाबलाः ॥ ४० ॥ जब दैत्योंने देवताओंको पराजित कर दिया, तब देवताओंने इसी प्रायश्चित्तका अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्वकी प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान् और परम सिद्ध हो गये ॥ ४० ॥

गावः पवित्राः पुण्याश्च पावनं परमं महत् । ताश्च दत्त्वा द्विजातिभ्यो नरः स्वर्गमुपाश्नुते ॥ ४१ ॥ गौएँ परम पावन, पवित्र और पुण्यस्वरूपा हैं। वे महान् देवता हैं। उन्हें ब्राह्मणोंको देकर मनुष्य स्वर्गका सुख भोगता है ॥ ४१ ॥

गवां मध्ये शुचिर्भूत्वा गोमतीं मनसा जपेत् । पुताभिरद्भिराचम्य शुचिर्भवति निर्मलः ॥ ४२ ॥ पवित्र जलसे आचमन करके पवित्र होकर गौओंके बीचमें गोमतीमन्त्र (गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करे। ऐसा करनेसे वह अत्यन्त शुद्ध एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है ॥ ४२ ॥

अग्निमध्ये गवां मध्ये ब्राह्मणानां च संसदि । विद्यावेदव्रतस्नाता ब्राह्मणाः पुण्यकर्मिणः ॥ ४३ ॥ अध्यापयेरन् शिष्यान् वै गोमतीं यज्ञसम्मिताम् । त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा गोमतीं लभते वरम् ॥ ४४ ॥ विद्या और वेदव्रतमें निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे अग्नियों और गौओंके बीचमें तथा ब्राह्मणोंकी सभामें शिष्योंको यज्ञतुल्य गोमतीविद्याकी शिक्षा दें। जो तीन राततक उपवास करके गोमती-मन्त्रका जप करता है, उसे गौओंका वरदान प्राप्त होता है ॥ ४३-४४ ॥

पुत्रकामश्च लभते पुत्रं धनमथापि वा । पतिकामा च भर्तारं सर्वकामांश्च मानवः ।