महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 706, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगावस्तुष्टाः प्रयच्छन्ति सेविता वै न संशयः ॥ ४५ ॥ पुत्रकी इच्छावाला पुत्र और धन चाहनेवाला धन पाता है। पतिकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको मनके अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओंकी आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। गौएँ मनुष्योंद्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सब कुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥
एवमेता महाभागा यज्ञियाः सर्वकामदाः । रोहिण्य इति जानीहि नैताभ्यो विद्यते परम् ॥ ४६ ॥ इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौएँ यज्ञका प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाएँ देनेवाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है ॥ ४६ ॥
इत्युक्तः स महातेजाः शुकः पित्रा महात्मना । पूजयामास गां नित्यं तस्मात् त्वमपि पूजय ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर! अपने महात्मा पिता व्यासजीके ऐसा कहनेपर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौकी सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओंकी सेवा-पूजा करो ॥ ४७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रदानिके एकाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानविषयक इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८१ ॥