महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 691, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘गौओंका नाम-कीर्तन किये बिना न सोये। उनका स्मरण करके ही उठे और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करे। इससे मनुष्यको बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है ।। १६ ।। गवां मूत्रपुरीषस्य नोद्विजेत कथंचन । न चासां मांसमश्रीयाद् गवां पुष्टिं तथाप्नुयात् ।। १७ ।। ‘गौओंके मूत्र और गोबरसे किसी प्रकार उद्विग्न न हो—घृणा न करे और उनका मांस न खाय। इससे मनुष्यको पुष्टि प्राप्त होती है ।। १७ ।। गाश्च संकीर्तयेन्नित्यं नावमन्येत तास्तथा । अनिष्टं स्वप्नमालक्ष्य गां नरः सम्प्रकीर्तयेत् ।। १८ ।। ‘प्रतिदिन गौओंका नाम ले। उनका कभी अपमान न करे। यदि बुरे स्वप्न दिखायी दें तो मनुष्य गोमाताका नाम ले ।। १८ ।। गोमयेन सदा स्नायात् करीषे चापि संविशेत् । श्लेष्ममूत्रपुरीषाणि प्रतिघातं च वर्जयेत् ।। १९ ।। ‘प्रतिदिन शरीरमें गोबर लगाकर स्नान करे। सूखे हुए गोबरपर बैठे। उसपर थूक न फेंके, मल-मूत्र न छोड़े तथा गौओंके तिरस्कारसे बचता रहे ।। १९ ।। सार्द्रे चर्मणि भुञ्जीत निरीक्षेद् वारुणीं दिशम् । वाग्यतः सर्पिषा भूमौ गवां पुष्टिं सदाश्रुते ।। २० ।। ‘भीगे हुए गोचर्मपर बैठकर भोजन करे। पश्चिम दिशाकी ओर देखे और मौन हो भूमिपर बैठकर घीका भक्षण करे। इससे सदा गौओंकी वृद्धि एवं पुष्टि होती है ।। २० ।। घृतेन जुहुयादग्निं घृतेन स्वस्ति वाचयेत् । घृतं दद्याद् घृतं प्राशेद् गवां पुष्टिं सदाश्रुते ।। २१ ।। ‘अग्निमें घृतसे हवन करे। घृतसे ही स्वस्तिवाचन कराये। घृतका दान करे और स्वयं भी गौका घृत ही खाय। इससे मनुष्य सदा गौओंकी पुष्टि वृद्धिका अनुभव करता है ।। २१ ।। गोमत्या विद्यया धेनुं तिलानामभिमन्त्र्य यः । सर्वरत्नमयीं दद्यान्न स शोचेत् कृताकृते ।। २२ ।। ‘जो मनुष्य सब प्रकारके रत्नोंसे युक्त तिलकी धेनुको ‘गोमाँ अग्नेविमाँ अश्वि’ इत्यादि गोमती-मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके उसका ब्राह्मणको दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्मके लिये शोक नहीं करता ।। २२ ।। गावो मामुपतिष्ठन्तु हेमशृङ्ग्यः पयोमुचः । सुरभ्यः सौरभेय्यश्च सरितः सागरं यथा ।। २३ ।। ‘जैसे नदियाँ समुद्रके पास जाती हैं, उसी तरह सोनेसे मढ़ी हुई सींगोंवाली, दूध देनेवाली सुरभी और सौरभेयी गौएँ मेरे निकट आयें ।। २३ ।। गा वै पश्याम्यहं नित्यं गावः पश्यन्तु मां सदा ।