भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 69, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 69

ऋचीकः प्रददौ प्रीतः शुल्कार्थं तपतां वरः ॥ १८ ॥
तात! तब तपस्वी मुनियोंमें श्रेष्ठ ऋचीक मुनिने प्रसन्न होकर शुल्कके लिये राजा गाधिको वे एक हजार सुन्दर घोड़े दे दिये ॥ १८ ॥

ततः स विस्मितो राजा गाधिः शापभयेन च ।
ददौ तां समलंकृत्य कन्यां भृगुसुताय वै ॥ १९ ॥
तब आश्चर्यचकित हुए राजा गाधिने शापके भयसे डरकर अपनी कन्याको वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके भृगुनन्दन ऋचीकको दे दिया ॥ १९ ॥

जग्राह विधिवत् पाणिं तस्या ब्रह्मर्षिसत्तमः ।
सा च तं पतिमासाद्य परं हर्षमवाप ह ॥ २० ॥
ब्रह्मर्षिशिरोमणि ऋचीकने उसका विधिवत् पाणिग्रहण किया। वैसे तेजस्वी पतिको पाकर उस कन्याको भी बड़ा हर्ष हुआ ॥ २० ॥

स तुतोष च ब्रह्मर्षिस्तस्या वृत्तेन भारत ।
छन्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम् ॥ २१ ॥
भरतनन्दन! अपनी पत्नीके सद्व्यवहारसे ब्रह्मर्षि बहुत संतुष्ट हुए। उन्होंने उस परम सुन्दरी पत्नीको मनोवांछित वर देनेकी इच्छा प्रकट की ॥ २१ ॥

मात्रे तत् सर्वमाचख्यौ सा कन्या राजसत्तम ।
अथ तामब्रवीन्माता सुतां किंचिदवाङ्मुखी ॥ २२ ॥
नृपश्रेष्ठ! तब उस राजकन्याने अपनी मातासे मुनिकी कही हुई सब बातें बतायीं। वह सुनकर उसकी माताने संकोचसे सिर नीचे करके पुत्रीसे कहा— ॥ २२ ॥

ममापि पुत्रि भर्ता ते प्रसादं कर्तुमर्हति ।
अपत्यस्य प्रदानेन समर्थश्च महातपाः ॥ २३ ॥
'बेटी! तुम्हारे पतिको पुत्र प्रदान करनेके लिये मुझपर भी कृपा करनी चाहिये, क्योंकि वे महान् तपस्वी और समर्थ हैं' ॥ २३ ॥

ततः सा त्वरितं गत्वा तत् सर्वं प्रत्यवेदयत् ।
मातुश्चिकीर्षितं राजन्ऋचीकस्तामथाब्रवीत् ॥ २४ ॥
राजन्! तदनन्तर सत्यवतीने तुरंत जाकर माताकी वह सारी इच्छा ऋचीकसे निवेदन की। तब ऋचीकने उससे कहा— ॥ २४ ॥

गुणवन्तमपत्यं सा अचिराज्जनयिष्यति ।
मम प्रसादात् कल्याणि माभूत् ते प्रणयोऽन्यथा ॥ २५ ॥
'कल्याणि! मेरे प्रसादसे तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान् पुत्रको जन्म देगी। तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा ॥ २५ ॥

तव चैव गुणश्लाघी पुत्र उत्पत्स्यते महान् ।
अस्मद्वंशकरः श्रीमान् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २६ ॥

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