महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 70, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'तुम्हारे गर्भसे भी एक अत्यन्त गुणवान् और महान् तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो हमारी वंशपरम्पराको चलायेगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ २६ ॥ ऋतुस्नाता च साश्वत्थं त्वं च वृक्षमदुम्बरम् । परिष्वजेथाः कल्याणि तत एवमवाप्स्यथः ॥ २७ ॥ 'कल्याणि! तुम्हारी माता ऋतुस्नानके पश्चात् पीपलके वृक्षका आलिंगन करे और तुम गूलरके वृक्षका। इससे तुम दोनोंको अभीष्ट पुत्रकी प्राप्ति होगी' ॥ २७ ॥ चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते । त्वं च सा चोपभुञ्जीतं ततः पुत्राववाप्स्यथः ॥ २८ ॥ 'पवित्र मुसकानवाली देवि! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं। इनमेंसे एकको तुम खा लो और दूसरेको तुम्हारी माता। इससे तुम दोनोंको पुत्र प्राप्त होंगे' ॥ २८ ॥ ततः सत्यवती हृष्टा मातरं प्रत्यभाषत । यदृचीकेन कथितं तच्चाचख्यौ चरुद्वयम् ॥ २९ ॥ तब सत्यवतीने हर्षमग्न होकर ऋचीकने जो कुछ कहा था, वह सब अपनी माताको बताया और दोनोंके लिये तैयार किये हुए पृथक्-पृथक् चरुओंकी भी चर्चा की ॥ २९ ॥ तामुवाच ततो माता सुतां सत्यवतीं तदा । पुत्रि पूर्वोपपन्नायाः कुरुष्व वचनं मम ॥ ३० ॥ उस समय माताने अपनी पुत्री सत्यवतीसे कहा—'बेटी! माता होनेके कारण पहलेसे मेरा तुमपर अधिकार है; अतः तुम मेरी बात मानो' ॥ ३० ॥ भर्त्रा य एष दत्तस्ते चरुर्मन्त्रपुरस्कृतः । एनं प्रयच्छ मह्यं त्वं मदीयं त्वं गृहाण च ॥ ३१ ॥ 'तुम्हारे पतिने जो मन्त्रपूत चरु तुम्हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो ॥ ३१ ॥ व्यत्यासं वृक्षयोश्चापि करवाव शुचिस्मिते । यदि प्रमाणं वचनं मम मातुरनिन्दिते ॥ ३२ ॥ 'पवित्र हास्यवाली मेरी अच्छी बेटी! यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो हमलोग वृक्षोंमें भी अदल-बदल कर लें' ॥ ३२ ॥ स्वमपत्यं विशिष्टं हि सर्व इच्छत्यनाविलम् । व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति ॥ ३३ ॥ 'प्रायः सभी लोग अपने लिये निर्मल एवं सर्वगुणसम्पन्न श्रेष्ठ पुत्रकी इच्छा करते हैं। अवश्य ही भगवान् ऋचीकने भी चरु निर्माण करते समय ऐसा तारतम्य रखा होगा ॥ ३३ ॥ ततो मे त्वच्चरौ भावः पादपे च सुमध्यमे । कथं विशिष्टो भ्राता मे भवेदित्येव चिन्तय ॥ ३४ ॥