महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 724, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृह्णन्ति विहितं चेत्थं पिण्डो देयः कुशेष्विति । उसे ऊपर उठी देख मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। भरतश्रेष्ठ! साक्षात् मेरे पिता ही पिण्डका दान लेनेके लिये उपस्थित थे। प्रभो! किंतु जब मैंने शास्त्रीय विधिपर विचार किया, तब मेरे मनमें सहसा यह बात स्मरण हो आयी कि मनुष्यके लिये हाथपर पिण्ड देनेका वेदमें विधान नहीं है। पितर साक्षात् प्रकट होकर कभी मनुष्यके हाथसे पिण्ड लेते भी नहीं हैं। शास्त्रकी आज्ञा तो यही है कि कुशोंपर पिण्डदान करें ।। १६—१८ १/२ ।।
ततोऽहं तदनादृत्य पितुर्हस्तनिदर्शनम् ।। १९ ।।
शास्त्रप्रामाण्यसूक्ष्मं तु विधिं पिण्डस्य संस्मरन् ।
ततो दर्भेषु तत् सर्वमददं भरतर्षभ ।। २० ।।
भरतश्रेष्ठ! यह सोचकर मैंने पिताके प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाले हाथका आदर नहीं किया। शास्त्रको ही प्रमाण मानकर उसकी पिण्डदानसम्बन्धी सूक्ष्म विधिका ध्यान रखते हुए कुशोंपर ही सब पिण्डोंका दान किया ।। १९-२० ।।
शास्त्रमार्गानुसारेण तद् विद्धि मनुजर्षभ ।
ततः सोऽन्तर्हितो बाहुः पितुर्मम जनाधिप ।। २१ ।।
नरश्रेष्ठ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि मैंने शास्त्रीय मार्गका अनुसरण करके ही सब कुछ किया। नरेश्वर! तदनन्तर मेरे पिताकी वह बाँह अदृश्य हो गयी ।। २१ ।।
ततो मां दर्शयामासुः स्वप्नान्ते पितरस्तथा ।
प्रीयमाणास्तु मामूचुः प्रीताः स्म भरतर्षभ ।। २२ ।।
विज्ञानेन तवानेन यन्न मुह्यसि धर्मतः ।
तदनन्तर स्वप्नमें पितरोंने मुझे दर्शन दिया और प्रसन्नतापूर्वक मुझसे कहा—'भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस शास्त्रीय ज्ञानसे हम बहुत प्रसन्न हैं; क्योंकि उसके कारण तुम्हें धर्मके विषयमें मोह नहीं हुआ ।। २२ १/२ ।।
त्वया हि कुर्वता शास्त्रं प्रमाणमिह पार्थिव ।। २३ ।।
आत्मा धर्मः श्रुतं वेदाः पितरश्चर्षिभिः सह ।
साक्षात् पितामहो ब्रह्मा गुरवोऽथ प्रजापतिः ।। २४ ।।
प्रमाणमुपनीता वै स्थिताश्च न विचालिताः ।
'पृथ्वीनाथ! तुमने यहाँ शास्त्रको प्रमाण मानकर आत्मा, धर्म, शास्त्र, वेद, पितृगण, ऋषिगण, गुरु, प्रजापति और ब्रह्माजी—इन सबका मान बढ़ाया है तथा जो लोग धर्ममें स्थित हैं उन्हें भी तुमने अपना आदर्श दिखाकर विचलित नहीं होने दिया है ।। २३-२४ १/२ ।।
तदिदं सम्यगारब्धं त्वयाद्य भरतर्षभ ।। २५ ।।
किं तु भूमेर्गवां चार्थे सुवर्णं दीयतामिति ।
'भरतश्रेष्ठ! यह सब कार्य तो तुमने बहुत उत्तम किया है; किंतु अब हमारे कहनेसे भूमिदान और गोदानके निष्क्रयरूपसे कुछ सुवर्णदान भी करो ।। २५ १/२ ।।