महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवं वयं च धर्मज्ञ सर्वे चास्मत्पितामहाः ॥ २६ ॥ पाविता वै भविष्यन्ति पावनं हि परं हि तत् । 'धर्मज्ञ! ऐसा करनेसे हम और हमारे सभी पितामह पवित्र हो जायँगे; क्योंकि सुवर्ण सबसे अधिक पावन वस्तु है ।। २६ १/२ ।। दशपूर्वान् दशैवान्यांस्तथा संतारयन्ति ते ।। २७ ।। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति एवं मत्पितरोऽब्रुवन् । ततोऽहं विस्मितो राजन् प्रतिबुद्धो विशाम्पते ।। २८ ।। सुवर्णदानेऽकरवं मतिं च भरतर्षभ । 'जो सुवर्ण दान करते हैं, वे अपने पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देते हैं।' राजन्! जब मेरे पितरोंने ऐसा कहा तो मेरी नींद खुल गयी। उस समय स्वप्नका स्मरण करके मुझे बड़ा विस्मय हुआ। प्रजानाथ! भरतश्रेष्ठ! तब मैंने सुवर्णदान करनेका निश्चित विचार कर लिया ।। २७-२८ १/२ ।। इतिहासमिमं चापि शृणु राजन् पुरातनम् ।। २९ ।। जामदग्न्यं प्रति विभो धन्यमायुष्यमेव च । राजन्! अब (सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके माहात्म्यके विषयमें) एक प्राचीन इतिहास सुनो जो जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे सम्बन्ध रखनेवाला है। विभो! यह आख्यान धन तथा आयुकी वृद्धि करनेवाला है ।। २९ १/२ ।। जामदग्न्येन रामेण तीव्ररोषान्वितेन वै ॥ ३० ॥ त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवी कृता निःक्षत्रिया पुरा । पूर्वकालकी बात है, जमदग्निकुमार परशुरामजीने तीव्र रोषमें भरकर इक्कीस बार पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य कर दिया था ।। ३० १/२ ।। ततो जित्वा महीं कृत्स्नां रामो राजीवलोचनः ।। ३१ ।। आजहार क्रतुं वीरो ब्रह्मक्षत्रेण पूजितम् । वाजिमेधं महाराज सर्वकामसमन्वितम् ।। ३२ ।। महाराज! इसके बाद सम्पूर्ण पृथ्वीको जीतकर वीर कमलनयन परशुरामजीने ब्राह्मणों और क्षत्रियोंद्वारा सम्मानित तथा सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाले अश्वमेध यज्ञका अनुष्ठान किया ।। ३१-३२ ।। पावनं सर्वभूतानां तेजोद्युतिविवर्धनम् । विपाप्मा च स तेजस्वी तेन क्रतुफलेन च ।। ३३ ।। नैवात्मनोऽथ लघुतां जामदग्न्योऽध्यगच्छत ।