भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 726, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 726

यद्यपि अश्वमेध यज्ञ समस्त प्राणियोंको पवित्र करनेवाला तथा तेज और कान्तिको बढ़ानेवाला है तथापि उसके फलसे तेजस्वी परशुरामजी सर्वथा पापमुक्त न हो सके। इससे उन्होंने अपनी लघुताका अनुभव किया ।। ३३ ½ ।।

स तु क्रतुवरेणेष्ट्वा महात्मा दक्षिणावता ।। ३४ ।।
पप्रच्छागमसम्पन्नानृषीन् देवांश्च भार्गवः ।
पावनं यत् परं नृणामुग्रे कर्मणि वर्तताम् ।। ३५ ।।
तदुच्यतां महाभागा इति जातघृणोऽब्रवीत् ।
इत्युक्ता वेदशास्त्रज्ञास्तमूचुस्ते महर्षयः ।। ३६ ।।
प्रचुर दक्षिणासे सम्पन्न उस श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान पूर्ण करके महामना भृगुवंशी परशुरामजीने मनमें दयाभाव लेकर शास्त्रज्ञ ऋषियों और देवताओंसे इस प्रकार पूछा—‘महाभाग महात्माओ! उग्र कर्ममें लगे हुए मनुष्योंके लिये जो परम पावन वस्तु हो, वह मुझे बताइये।’ उनके इस प्रकार पूछनेपर उन वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता महर्षियोंने इस प्रकार कहा— ।। ३४—३६ ।।

राम विप्राः सत्क्रियन्तां वेदप्रामाण्यदर्शनात् ।
भूयश्च विप्रर्षिगणाः प्रष्टव्याः पावनं प्रति ।। ३७ ।।
‘परशुराम! तुम वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए ब्राह्मणोंका सत्कार करो और ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे पुनः इस पावन वस्तुके लिये प्रश्न करो ।। ३७ ।।

ते यद् ब्रूयुर्महाप्राज्ञास्तच्चैव समुदाचर ।
ततो वसिष्ठं देवर्षिमगस्त्यमथ काश्यपम् ।। ३८ ।।
तमेवार्थं महातेजाः पप्रच्छ भृगुनन्दनः ।
जाता मतिर्मे विप्रेन्द्राः कथं पूयेयमित्युत ।। ३९ ।।
केन वा कर्मयोगेन प्रदानेनेह केन वा ।
‘और वे महाज्ञानी महर्षिगण जो कुछ बतावें, उसीका प्रसन्नतापूर्वक पालन करो।’ तब महातेजस्वी भृगुनन्दन परशुरामजीने वसिष्ठ, नारद, अगस्त्य और कश्यपजीके पास जाकर पूछा—‘विप्रवरो! मैं पवित्र होना चाहता हूँ। बताइये, कैसे किस कर्मके अनुष्ठानसे अथवा किस दानसे पवित्र हो सकता हूँ? ।। ३८-३९ ½ ।।