भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 727, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 727

यदि वोऽनुग्रहकृता बुद्धिर्मां प्रति सत्तमाः ।
प्रब्रूत पावनं किं मे भवेदिति तपोधनाः ॥ ४० ॥
‘साधुशिरोमणे! तपोधनो! यदि आपलोग मुझपर अनुग्रह करना चाहते हों तो बतायें, मुझे पवित्र करनेवाला साधन क्या है?’ ॥ ४० ॥

ऋषय ऊचुः
गाश्च भूमिं च वित्तं च दत्त्वेह भृगुनन्दन ।
पापकृत् पूयते मर्त्य इति भार्गव शुश्रुम ॥ ४१ ॥
ऋषियोंने कहा— भृगुनन्दन! हमने सुना है कि पाप करनेवाला मनुष्य यहाँ गाय, भूमि और धनका दान करके पवित्र हो जाता है ॥ ४१ ॥
अन्यद् दानं तु विप्रर्षे श्रूयतां पावनं महत् ।
दिव्यमत्यद्भुताकारमपत्यं जातवेदसः ॥ ४२ ॥
ब्रह्मर्षे! एक दूसरी वस्तुका दान भी सुनो। वह वस्तु सबसे बढ़कर पावन है। उसका आकार अत्यन्त अद्भुत और दिव्य है तथा वह अग्निसे उत्पन्न हुई है ॥
दग्ध्वा लोकान् पुरा वीर्यात् सम्भूतमिह शुश्रुम ।
सुवर्णमिति विख्यातं तद् ददत् सिद्धिमेष्यसि ॥ ४३ ॥