भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 728, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 728

उस वस्तुका नाम है सुवर्ण। हमने सुना है कि पूर्वकालमें अग्निने सम्पूर्ण लोकोंको भस्म करके अपने वीर्यसे सुवर्णको प्रकट किया था। उसीका दान करनेसे तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी॥ ४३॥

ततोऽब्रवीद् वसिष्ठस्तं भगवान् संशितव्रतः। शृणु राम यथोत्पन्नं सुवर्णमनलप्रभम्॥ ४४॥
तदनन्तर कठोर व्रतका पालन करनेवाले भगवान् वसिष्ठने कहा—'परशुराम! अग्निके समान प्रकाशित होनेवाला सुवर्ण जिस प्रकार प्रकट हुआ है, वह सुनो॥

फलं दास्यति ते यत् तु दाने परमिहोच्यते। सुवर्णं यच्च यस्माच्च यथा च गुणवत्तमम्॥ ४५॥
तन्निबोध महाबाहो सर्वं निगदतो मम।
'सुवर्णका दान तुम्हें उत्तम फल देगा; क्योंकि वह दानके लिये सर्वोत्तम बताया जाता है। महाबाहो! सुवर्णका जो स्वरूप है, जिससे उत्पन्न हुआ है और जिस प्रकार वह विशेष गुणकारी है, वह सब बता रहा हूँ, मुझसे सुनो॥ ४५ १/२॥

अग्नीषोमात्मकमिदं सुवर्णं विद्धि निश्चये॥ ४६॥
अजोऽग्निर्वरुणो मेषः सूर्योऽश्व इति दर्शनम्।
'यह सुवर्ण अग्नि और सोमरूप है। इस बातको तुम निश्चितरूपसे जान लो। बकरा, अग्नि, भेड़, वरुण तथा घोड़ा सूर्यका अंश है। ऐसी दृष्टि रखनी चाहिये॥

कुञ्जराश्च मृगा नागा महिषाश्चासुरा इति॥ ४७॥
कुक्कुटाश्च वराहाश्च राक्षसा भृगुनन्दन।
इडा गावः पयः सोमो भूमिरित्येव च स्मृतिः॥ ४८॥
'भृगुनन्दन! हाथी और मृग नागोंके अंश हैं। भैंसे असुरोंके अंश हैं। मुर्गा और सूअर राक्षसोंके अंश हैं इडा—गौ, दुग्ध और सोम—ये सब भूमिरूप ही हैं। ऐसी स्मृति है॥ ४७-४८॥

जगत् सर्वं च निर्मथ्य तेजोराशिः समुत्थितः।
सुवर्णमेभ्यो विप्रर्षे रत्नं परममुत्तमम्॥ ४९॥
'सारे जगत्‌का मन्थन करके जो तेजकी राशि प्रकट हुई है, वही सुवर्ण है। अतः ब्रह्मर्षे! यह अज आदि सभी वस्तुओंसे परम उत्तम रत्न है॥ ४९॥

एतस्मात् कारणाद् देवा गन्धर्वोरगराक्षसाः।
मनुष्याश्च पिशाचाश्च प्रयता धारयन्ति तत्॥ ५०॥
'इसीलिये देवता, गन्धर्व, नाग, राक्षस, मनुष्य और पिशाच—ये सब प्रयत्नपूर्वक सुवर्ण धारण करते हैं॥

मुकुटैरङ्गदयुतैरलंकारैः पृथग्विधैः।
सुवर्णविकृतैस्तत्र विराजन्ते भृगूत्तम॥ ५१॥