महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 729, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं।। तस्मात् सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम्। भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ।। ५२ ।। ‘अतः नरश्रेष्ठ! जगत्में भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो।। ५२ ।। पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन। विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो।। ५३ ।। ‘विभो! पृथिवी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है।। अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते। प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम्।। ५४ ।। ‘देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो।। ५४ ।। सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत।। ५५ ।। सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं।। देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ। अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम्।। ५६ ।। ‘जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है।। ५६ ।। तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः। भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः।। ५७ ।। ‘पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया—ऐसा माना जाता है। अतः विद्वान् पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं।। ५७ ।। भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे। गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर।। ५८ ।। ‘सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो।। ५८ ।। मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन। प्रजापतेः कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै।। ५९ ।।