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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

'भृगुश्रेष्ठ! वे सोनेके बने हुए मुकुट, बाजूबंद तथा अन्य नाना प्रकारके अलंकारोंसे सुशोभित होते हैं।। तस्मात् सर्वपवित्रेभ्यः पवित्रं परमं स्मृतम्। भूमेर्गोभ्योऽथ रत्नेभ्यस्तद् विद्धि मनुजर्षभ।। ५२ ।। ‘अतः नरश्रेष्ठ! जगत्में भूमि, गौ तथा रत्न आदि जितनी पवित्र वस्तुएँ हैं, सुवर्णको उन सबसे पवित्र माना गया है; इस बातको भलीभाँति जान लो।। ५२ ।। पृथिवीं गाश्च दत्त्वेह यच्चान्यदपि किंचन। विशिष्यते सुवर्णस्य दानं परमकं विभो।। ५३ ।। ‘विभो! पृथिवी, गौ तथा और जो कुछ भी दान किया जाता है, उन सबसे बढ़कर सुवर्णका दान है।। अक्षयं पावनं चैव सुवर्णममरद्युते। प्रयच्छ द्विजमुख्येभ्यः पावनं ह्येतदुत्तमम्।। ५४ ।। ‘देवोपम तेजस्वी परशुराम! सुवर्ण अक्षय और पावन है, अतः तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको यह उत्तम और पावन वस्तु ही दान करो।। ५४ ।। सुवर्णमेव सर्वासु दक्षिणासु विधीयते। सुवर्णं ये प्रयच्छन्ति सर्वदास्ते भवन्त्युत।। ५५ ।। सब दक्षिणाओंमें सुवर्णका ही विधान है; अतः जो सुवर्ण दान करते हैं, वे सब कुछ दान करनेवाले होते हैं।। देवतास्ते प्रयच्छन्ति ये सुवर्णं ददत्यथ। अग्निर्हि देवताः सर्वाः सुवर्णं च तदात्मकम्।। ५६ ।। ‘जो सुवर्ण देते हैं, वे देवताओंका दान करते हैं; क्योंकि अग्नि सर्वदेवतामय है और सुवर्ण अग्निका स्वरूप है।। ५६ ।। तस्मात् सुवर्णं ददता दत्ताः सर्वाः स्म देवताः। भवन्ति पुरुषव्याघ्र न ह्यतः परमं विदुः।। ५७ ।। ‘पुरुषसिंह! अतः सुवर्णका दान करनेवाले पुरुषोंने सम्पूर्ण देवताओंका ही दान कर दिया—ऐसा माना जाता है। अतः विद्वान् पुरुष सुवर्णसे बढ़कर दूसरा कोई दान नहीं मानते हैं।। ५७ ।। भूय एव च माहात्म्यं सुवर्णस्य निबोध मे। गदतो मम विप्रर्षे सर्वशस्त्रभृतां वर।। ५८ ।। ‘सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ विप्रर्षे! मैं पुनः सुवर्णका माहात्म्य बता रहा हूँ, ध्यान देकर सुनो।। ५८ ।। मया श्रुतमिदं पूर्वं पुराणे भृगुनन्दन। प्रजापतेः कथयतो यथान्यायं तु तस्य वै।। ५९ ।।

'भृगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ।। ५९ ।। शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ।। ६० ।। देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ।। ६१ ।। 'भृगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान् रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान् शिवको उमादेवीके साथ समागम-सुख प्राप्त था ।। ६०-६१ ।। ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ।। ६२ ।। 'उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ।। ६२ ।। प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह । अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ।। ६३ ।। तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । भृगुश्रेष्ठ! वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा—'पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्वतीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है ।। ६३ १/२ ।। अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ।। ६४ ।। अपत्यं युवयोर्देव बलवद् भविता विभो । तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ।। ६५ ।। 'देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।। तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन । वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ।। ६६ ।। 'विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ।। ६६ ।। अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो । त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं संतापयिष्यथः ।। ६७ ।।

‘प्रभो! संतानके लिये प्रकट होनेवाला जो आपका उत्तम तेज है, उसे आप अपने भीतर ही रोक लीजिये। आप दोनों त्रिलोकीके सारभूत हैं। अतः अपनी संतानके द्वारा सम्पूर्ण जगत्को संतप्त कर डालेंगे ॥ ६७ ॥

तदपत्यं हि युवयोर्देवानभिभवेद् ध्रुवम् ।
न हि ते पृथिवी देवी न च द्यौर्न दिवं विभो ॥ ६८ ॥
नेदं धारयितुं शक्ताः समस्ता इति मे मतिः ।
तेजःप्रभावनिर्दग्धं तस्मात् सर्वमिदं जगत् ॥ ६९ ॥
‘आप दोनोंसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह निश्चय ही देवताओंको पराजित कर देगा। प्रभो! हमारा तो ऐसा विश्वास है कि न तो पृथिवीदेवी, न आकाश और न स्वर्ग ही आपके तेजको धारण कर सकेगा। ये सब मिलकर भी आपके इस तेजको धारण करनेमें समर्थ नहीं हैं। यह सारा जगत् आपके तेजके प्रभावसे भस्म हो जायगा ॥ ६८-६९ ॥

तस्मात् प्रसादं भगवन् कर्तुमर्हसि नः प्रभो ।
न देव्यां सम्भवेत् पुत्रो भवतः सुरसत्तम ।
धैर्यादेव निगृह्णीष्व तेजो ज्वलितमुत्तमम् ॥ ७० ॥
‘अतः भगवन्! हमपर कृपा कीजिये। प्रभो! सुरश्रेष्ठ! हम यही चाहते हैं कि देवी पार्वतीके गर्भसे आपके कोई पुत्र न हो। आप धैर्यसे ही अपने प्रज्वलित उत्तम तेजको भीतर ही रोक लीजिये’ ॥ ७० ॥

इति तेषां कथयतां भगवान् वृषभध्वजः ।
एवमस्त्विति देवांस्तान् विप्रर्षे प्रत्यभाषत ॥ ७१ ॥
‘विप्रर्षे! देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान् वृषभध्वजने उनसे ‘एवमस्तु’ कह दिया ॥ ७१ ॥

इत्युक्त्वा चोर्ध्वमनयद् रेतो वृषभवाहनः ।
ऊर्ध्वरेताः समभवत् ततः प्रभृति चापि सः ॥ ७२ ॥
‘देवताओंसे ऐसा कहकर वृषभवाहन भगवान् शंकरने अपने ‘रेतस्’ अर्थात् वीर्यको ऊपर चढ़ा लिया। तभीसे वे ‘ऊर्ध्वरेता’ नामसे विख्यात हुए ॥ ७२ ॥

रुद्राणीति ततः क्रुद्धा प्रजोच्छेदे तदा कृते ।
देवानथाब्रवीत् तत्र स्त्रीभावात् परुषं वचः ॥ ७३ ॥
‘देवताओंने मेरी भावी संतानका उच्छेद कर डाला’ यह सोचकर उस समय देवी रुद्राणी बहुत कुपित हुईं और स्त्री-स्वभाव होनेके कारण उन्होंने देवताओंसे यह कठोर वचन कहा— ॥ ७३ ॥

यस्मादपत्यकामो वै भर्ता मे विनिवर्तितः ।
तस्मात् सर्वे सुरा यूयमनपत्या भविष्यथ ॥ ७४ ॥

‘देवताओ! मेरे पतिदेव मुझसे संतान उत्पन्न करना चाहते थे, किंतु तुमलोगोंने इन्हें इस कार्यसे निवृत्त कर दिया; इसलिये तुम सभी देवता निर्वंश हो जाओगे ।। प्रजोच्छेदो मम कृतो यस्माद् युष्माभिरद्य वै । तस्मात् प्रजा वः खगमाः सर्वेषां न भविष्यति ॥ ७५ ॥ ‘आकाशचारी देवताओ! आज तुम सब लोगोंने मिलकर मेरी संततिका उच्छेद किया है; अतः तुम सब लोगोंके भी संतान नहीं होगी' ।। ७५ ।। पावकस्तु न तत्रासीच्छापकाले भृगूद्वह । देवा देव्यास्तथा शापादनपत्यास्ततोऽभवन् ॥ ७६ ॥ भृगुश्रेष्ठ! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे; अतः उनपर यह शाप लागू नहीं हुआ। अन्य सब देवता देवीके शापसे संतानहीन हो गये ।। ७६ ।। रुद्रस्तु तेजोऽप्रतिमं धारयामास वै तदा । प्रस्कन्नं तु ततस्तस्मात् किंचित्तत्रापतद् भुवि ॥ ७७ ॥ रुद्रदेवने उस समय अपने अनुपम तेज (वीर्य) को यद्यपि रोक लिया था; तो भी किंचित् स्खलित होकर वहीं पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। ७७ ।। उत्पपात तदा वह्नौ ववृधे चाद्भुतोपमम् । तेजस्तेजसि संयुक्तमात्मयोनित्वमागतम् ॥ ७८ ॥ वह अद्भुत तेज अग्निमें पड़कर बढ़ने और ऊपरको उठने लगा। तेजसे संयुक्त हुआ वह तेज एक स्वयम्भू पुरुषके रूपमें अभिव्यक्त होने लगा ।। ७८ ।। एतस्मिन्नेव काले तु देवाः शक्रपुरोगमाः । असुरस्तारको नाम तेन संतापिता भृशम् ॥ ७९ ॥ इसी समय तारक नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसने इन्द्र आदि देवताओंको अत्यन्त संतप्त कर दिया था ।। ७९ ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतोऽथाश्विनावपि । साध्याश्च सर्वे संत्रस्ता दैतेयस्य पराक्रमात् ॥ ८० ॥ आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार तथा साध्य—सभी देवता उस दैत्यके पराक्रमसे संत्रस्त हो उठे थे ।। ८० ।। स्थानानि देवतानां हि विमानानि पुराणि च । ऋषीणां चाश्रमाश्चैव बभूवुरसुरैर्हृताः ॥ ८१ ॥ असुरोंने देवताओंके स्थान, विमान, नगर तथा ऋषियोंके आश्रम भी छीन लिये थे ।। ८१ ।। ते दीनमनसः सर्वे देवता ऋषयश्च ये । प्रजग्मुः शरणं देवं ब्रह्माणमजरं विभुम् ॥ ८२ ॥

वे सब देवता और ऋषि दीनचित्त हो अजर-अमर एवं सर्वव्यापी देवता भगवान् ब्रह्माकी शरणमें गये ।। ८२ ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ।। ८४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्ति नामक चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८४ ।।

ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

ब्रह्माजीका देवताओंको आश्वासन, अग्निकी खोज, अग्निके द्वारा स्थापित किये हुए शिवके तेजसे संतप्त हो गंगाका उसे मेरुपर्वतपर छोड़ना, कार्तिकेय और सुवर्णकी उत्पत्ति, वरुणरूपधारी महादेवजीके यज्ञमें अग्निसे ही प्रजापतियों और सुवर्णका प्रादुर्भाव, कार्तिकेयद्वारा तारकासुरका वध

देवा ऊचुः असुरस्तारको नाम त्वया दत्तवरः प्रभो । सुरानृषींश्च क्लिश्नाति वधस्तस्य विधीयताम् ॥ १ ॥ देवता बोले— प्रभो! आपने जिसे वर दे रखा है, वह तारक नामक असुर देवताओं और ऋषियोंको बड़ा कष्ट दे रहा है। अतः उसके वधका कोई उपाय कीजिये ॥ १ ॥

तस्माद् भयं समुत्पन्नमस्माकं वै पितामह । परित्रायस्व नो देव न ह्यन्या गतिरस्ति नः ॥ २ ॥ पितामह! देव! उस असुरसे हमलोगोंको भारी भय उत्पन्न हो गया है। आप हमारी उससे रक्षा करें; क्योंकि हमारे लिये दूसरी कोई गति नहीं है ॥ २ ॥

ब्रह्मोवाच समोऽहं सर्वभूतानामधर्मं नेह रोचये । हन्यतां तारकः क्षिप्रं सुरर्षिगणबाधिता ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीने कहा— मेरा तो समस्त प्राणियोंके प्रति समान भाव है तथापि मैं अधर्म नहीं पसन्द करता; अतः देवताओं तथा ऋषियोंको कष्ट देनेवाले तारकासुरको तुम लोग शीघ्र ही मार डालो ॥ ३ ॥

वेदा धर्माश्च नोच्छेदं गच्छेयुः सुरसत्तमाः । विहितं पूर्वमेवात्र मया वै व्येतु वो ज्वरः ॥ ४ ॥ सुरश्रेष्ठगण! वेदों और धर्मोंका उच्छेद न हो, इसका उपाय मैंने पहलेसे ही कर लिया है। अतः तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ४ ॥

देवा ऊचुः वरदानाद् भगवतो दैतेयो बलगर्वितः ।

देवैर्न शक्यते हन्तुं स कथं प्रशमं व्रजेत् ॥ ५ ॥
**देवता बोले—**भगवन्! आपके ही वरदानसे वह दैत्य बलके घमंडसे भर गया है। देवता उसे नहीं मार सकते। ऐसी दशामें वह कैसे शान्त हो सकता है? ॥ ५ ॥
स हि नैव स्म देवानां नासुराणां न रक्षसाम् ।
वध्यः स्यामिति जग्राह वरं त्वत्तः पितामह ॥ ६ ॥
पितामह! उसने आपसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है कि देवताओं, असुरों तथा राक्षसोंमेंसे किसीके हाथसे भी मारा न जाऊँ ॥ ६ ॥
देवाश्च शप्ता रुद्राण्या प्रजोच्छेदे पुराकृते ।
न भविष्यति वोऽपत्यमिति सर्वे जगत्पते ॥ ७ ॥
जगत्पते! पूर्वकालमें जब हमने रुद्राणीकी संततिका उच्छेद कर दिया, तब उन्होंने सब देवताओंको शाप दे दिया कि तुम्हारे कोई संतान नहीं होगी ॥ ७ ॥

ब्रह्मोवाच
हुताशनो न तत्रासीच्छापकाले सुरोत्तमाः ।
स उत्पादयितापत्यं वधाय त्रिदशद्विषाम् ॥ ८ ॥
**ब्रह्माजी बोले—**सुरश्रेष्ठगण! उस शापके समय वहाँ अग्निदेव नहीं थे। अतः देवद्रोहियोंके वधके लिये वे ही संतान उत्पन्न करेंगे ॥ ८ ॥
तद् वै सर्वानतिक्रम्य देवदानवराक्षसान् ।
मानुषानथ गन्धर्वान् नागानथ च पक्षिणः ॥ ९ ॥
अस्त्रेणामोधपातेन शक्त्या तं घातयिष्यति ।
यतो वो भयमुत्पन्नं ये चान्ये सुरशत्रवः ॥ १० ॥
वही समस्त देवताओं, दानवों, राक्षसों, मनुष्यों, गन्धर्वों, नागों तथा पक्षियोंको लाँघकर अपने अचूक अस्त्र-शक्तिके द्वारा उस असुरका वध कर डालेगा, जिससे तुम्हें भय उत्पन्न हुआ है। दूसरे जो देवशत्रु हैं, उनका भी वह संहार कर डालेगा ॥ ९-१० ॥
सनातनो हि संकल्पः काम इत्यभिधीयते ।
रुद्रस्य तेजः प्रस्कन्नमग्नौ निपतितं च यत् ॥ ११ ॥
तत्तेजोऽग्निर्महद्भूतं द्वितीयमिति पावकम् ।
वधार्थं देवशत्रूणां गंगायां जनयिष्यति ॥ १२ ॥
सनातन संकल्पको ही काम कहते हैं। उसी कामसे रुद्रका जो तेज स्खलित होकर अग्निमें गिरा था, उसे अग्निने ले रखा है। द्वितीय अग्निके समान उस महान् तेजको वे गंगाजीमें स्थापित करके बालकरूपसे उत्पन्न करेंगे। वही बालक देवशत्रुओंके वधका कारण होगा ॥ ११-१२ ॥
स तु नावाप तं शापं नष्टः स हुतभुक् तदा ।

तस्माद् वो भयहृद् देवाः समुत्पत्स्यति पावकिः ॥ १३ ॥
अग्निदेव उस समय छिपे हुए थे, इसलिये वह शाप उन्हें नहीं प्राप्त हुआ; अतः देवताओ! अग्निके जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह तुमलोगोंका सारा भय हर लेगा ॥
अन्विष्यतां वै ज्वलनस्तथा चाद्य नियुज्यताम् ।
तारकस्य वधोपायः कथितो वै मयानघाः ॥ १४ ॥
तुमलोग अग्निदेवकी खोज करो और उन्हें आज ही इस कार्यमें नियुक्त करो। निष्पाप देवताओ! तारकासुरके वधका यह उपाय मैंने बता दिया ॥ १४ ॥
न हि तेजस्विनां शापास्तेजःसु प्रभवन्ति वै ।
बलान्यतिबलं प्राप्य दुर्बलानि भवन्ति वै ॥ १५ ॥
तेजस्वी पुरुषोंके शाप तेजस्वियोंपर अपना प्रभाव नहीं दिखाते। साधारण बली कितने ही क्यों न हों, अत्यन्त बलशालीको पाकर दुर्बल हो जाते हैं ॥ १५ ॥
हन्यादवध्यान् वरदानपि चैव तपस्विनः ।
संकल्पाभिरुचिः कामः सनातनतमोऽभवत् ॥ १६ ॥
तपस्वी पुरुषका जो काम है, वही संकल्प एवं अभिरुचिके नामसे प्रसिद्ध है। वह सनातन या चिरस्थायी होता है। वह वर देनेवाले अवध्य पुरुषोंका भी वध कर सकता है ॥ १६ ॥
जगत्पतिरनिर्देश्यः सर्वगः सर्वभावनः ।
हृच्छयः सर्वभूतानां ज्येष्ठो रुद्रादपि प्रभुः ॥ १७ ॥
अग्निदेव इस जगत्के पालक, अनिर्वचनीय, सर्वव्यापी, सबके उत्पादक, समस्त प्राणियोंके हृदयमें शयन करनेवाले, सर्वसमर्थ तथा रुद्रसे भी ज्येष्ठ हैं ॥
अन्विष्यतां स तु क्षिप्रं तेजोराशिर्हुताशनः ।
स वो मनोगतं कामं देवः सम्पादयिष्यति ॥ १८ ॥
तेजकी राशिभूत अग्निदेवका तुम सब लोग शीघ्र अन्वेषण करो। वे तुम्हारी मनोवांछित कामनाको पूर्ण करेंगे ॥
एतद् वाक्यमुपश्रुत्य ततो देवा महात्मनः ।
जग्मुः संसिद्धसंकल्पाः पर्यैषन्तो विभावसुम् ॥ १९ ॥
महात्मा ब्रह्माजीका यह कथन सुनकर सफलमनोरथ हुए देवता अग्निदेवका अन्वेषण करनेके लिये वहाँसे चले गये ॥ १९ ॥
ततस्त्रैलोक्यमृषयो व्यचिन्वन्त सुरैः सह ।
कांक्षन्तो दर्शनं बह्नेः सर्वे तद्गतमानसाः ॥ २० ॥
तब देवताओंसहित ऋषियोंने तीनों लोकोंमें अग्निकी खोज प्रारम्भ की। उन सबका मन उन्हींमें लगा था और वे—सभी अग्निदेवका दर्शन करना चाहते थे ॥ २० ॥
परेण तपसा युक्ताः श्रीमन्तो लोकविश्रुताः ।

लोकानन्वचरन् सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम ॥ २१ ॥
भृगुश्रेष्ठ! उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे ॥ २१ ॥

नष्टात्मनि संलीनं नाधिजग्मुर्हुताशनम् ।
ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान् ॥ २२ ॥
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाग्नेः प्रदीपितः ।
उवाच देवान् मण्डूको रसातलतलोत्थितः ॥ २३ ॥
वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला— ॥ २२-२३ ॥

रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो ।
संतापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ॥ २४ ॥
'देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥

स संसुप्तो जले देवा भगवान् हव्यवाहनः ।
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम् ॥ २५ ॥
'देवगण! भगवान् अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं। हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं ॥ २५ ॥

तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः ।
तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ॥ २६ ॥
'देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये ॥ २६ ॥

गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात् सुराः ।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ॥ २७ ॥
'देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।' इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया ॥ २७ ॥

हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् ।
शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै ॥ २८ ॥
अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि 'तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा' ॥ २८ ॥

तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत् ॥ २९ ॥

मेढकको शाप देकर वे तुरंत दूसरी जगह निवास करनेके लिये चले गये। सर्वव्यापी अग्निने अपने-आपको प्रकट नहीं किया ।। २९ ।।

देवास्त्वनुग्रहं चक्रुर्मण्डूकानां भृगूत्तम । यत्तच्छृणु महाबाहो गदतो मम सर्वशः ।। ३० ।।

भृगुश्रेष्ठ! महाबाहो! उस समय देवताओंने मेढकोंपर जो कृपा की, वह सब बता रहा हूँ, सुनो ।। ३० ।।

देवा ऊचुः

अग्निशापादजिह्वापि रसज्ञानबहिष्कृताः । सरस्वतीं बहुविधां यूयमुच्चारयिष्यथ ।। ३१ ।।

देवता बोले—मेढको! अग्निदेवके शापसे तुम्हारे जिह्वा नहीं होगी; अतः तुम रसोंके ज्ञानसे शून्य रहोगे तथापि हमारी कृपासे तुम नाना प्रकारकी वाणीका उच्चारण कर सकोगे ।। ३१ ।।

बिलवासं गतांश्चैव निराहारानचेतसः । गतासूनपि संशुष्कान् भूमिः संधारयिष्यति ।। ३२ ।। तमोघनायामपि वै निशायां विचरिष्यथ ।

बिलमें रहते समय तुम आहार न मिलनेके कारण अचेत और निष्प्राण होकर सूख जाओगे तो भी भूमि तुम्हें धारण किये रहेगी—वर्षाका जल मिलनेपर तुम पुनः जीवित हो उठोगे। घने अन्धकारसे भरी हुई रात्रिमें भी तुम विचरते रहोगे ।। ३२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तांस्ततो देवाः पुनरेव महीमिमाम् ।। ३३ ।। परीयुर्ज्वलनस्यार्थे न चाविन्दन् हुताशनम् ।

मेढकोंसे ऐसा कहकर देवता पुनः अग्निकी खोजके लिये इस पृथ्वीपर विचरने लगे; किंतु वे अग्निदेवको कहीं उपलब्ध न कर सके ।। ३३ १/२ ।।

अथ तान् द्विरदः कश्चित् सुरेन्द्रद्विरदोपमः ।। ३४ ।। अश्वत्थस्थोऽग्निरित्येवमाह देवान् भृगूद्वह ।

भृगुश्रेष्ठ! तदनन्तर देवराज इन्द्रके ऐरावतकी भाँति कोई विशालकाय गजराज देवताओंसे बोला—‘अश्वत्थ अग्निरूप है’ ।। ३४ १/२ ।।

शशाप ज्वलनः सर्वान् द्विरदान् क्रोधमूर्च्छितः ।। ३५ ।। प्रतीपा भवतां जिह्वा भवित्रीति भृगूद्वह ।

भृगुकुलभूषण! यह सुनकर अग्निदेव क्रोधसे विह्वल हो उठे और उन्होंने समस्त हाथियोंको शाप देते हुए कहा—‘तुमलोगोंकी जिह्वा उलटी हो जायगी’ ।। ३५ १/२ ।।

इत्युक्त्वा निःसृतोऽश्वत्थादग्निर्वारणसूचितः । प्रविवेश शमीगर्भमथ वह्निः सुषुप्सया ।। ३६ ।।

ऐसा कहकर हाथीद्वारा सूचित किये गये अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर प्रविष्ट हो गये। वे वहाँ अच्छी तरह सोना चाहते थे ।। ३६ ।। अनुग्रहं तु नागानां यं चक्रुः शृणु तं प्रभो। देवा भृगुकुलश्रेष्ठ प्रीत्या सत्यपराक्रमाः ।। ३७ ।। प्रभो! भृगुकुलश्रेष्ठ! तब सत्यपराक्रमी देवताओंने प्रसन्न हो नागोंपर जिस प्रकार अपना अनुग्रह प्रकट किया, उसे सुनो ।। ३७ ।।

देवा ऊचुः प्रतीपया जिह्वयापि सर्वाहारीं करिष्यथ। वाचं चोच्चारयिष्यध्वमुच्चैरव्यज्जिताक्षराम् ।। ३८ ।। **देवता बोले—**हाथियो! तुम अपनी उलटी जिह्वासे भी सब प्रकारके आहार ग्रहण कर सकोगे तथा उच्चस्वरसे वाणीका उच्चारण कर सकोगे; किंतु उससे किसी अक्षरकी अभिव्यक्ति नहीं होगी ।। ३८ ।।

इत्युक्त्वा पुनरेवाग्निमनुसस्रुर्दिवौकसः। अश्वत्थान्निःसृतश्चाग्निः शमीगर्भमुपाविशत् ।। ३९ ।। ऐसा कहकर देवताओंने पुनः अग्निका अनुसरण किया। उधर अग्निदेव अश्वत्थसे निकलकर शमीके भीतर जा बैठे ।। ३९ ।।

शुकेन ख्यापितो विप्र तं देवाः समुपाद्रवन् । शशाप शुकमग्निस्तु वाग्विहीनो भविष्यसि ।। ४० ।। विप्रवर! तदनन्तर तोतेने अग्निका पता बता दिया। फिर तो देवता शमीवृक्षकी ओर दौड़े। यह देख अग्निने तोतेको शाप दे दिया—'तू वाणीसे रहित हो जायगा' ।।

जिह्वामावर्तयामास तस्यापि हुतभुक् तथा। दृष्ट्वा तु ज्वलनं देवाः शुकमूचुर्दयान्विताः ।। ४१ ।। भविता न त्वमत्यन्तं शुकत्वे नष्टवागिति। आवृत्तजिह्वस्य सतो वाक्यं कान्तं भविष्यति ।। ४२ ।। अग्निदेवने उसकी भी जिह्वा उलट दी। अब अग्निदेवको प्रत्यक्ष देखकर देवताओंने दयायुक्त होकर शुकसे कहा—'तू शुकयोनिमें रहकर अत्यन्त वाणीरहित नहीं होगा—कुछ-कुछ बोल सकेगा। जीभ उलट जानेपर भी तेरी बोली बड़ी मधुर एवं कमनीय होगी ।।

बालस्येव प्रवृद्धस्य कलमव्यक्तमद्भुतम्। 'जैसे बड़े-बूढ़े पुरुषको बालककी समझमें न आनेवाली अद्भुत तोतली बोली बड़ी मीठी लगती है, उसी प्रकार तेरी बोली भी सबको प्रिय लगेगी' ।। ४२ १/२ ।।

इत्युक्त्वा तं शमीगर्भे वह्निमालक्ष्य देवताः ।। ४३ ।। तदेवायतनं चक्रुः पुण्यं सर्वक्रियास्वपि।

ततः प्रभृति चाप्यग्निः शमीगर्भेषु दृश्यते ॥ ४४ ॥
ऐसा कहकर शमीके गर्भमें अग्निदेवका दर्शन करके देवताओंने सभी कर्मोंके लिये शमीको ही अग्निका पवित्र स्थान नियत किया। तबसे अग्निदेव शमीके भीतर दृष्टिगोचर होने लगे ॥ ४३-४४ ॥
उत्पादने तथोपायमभिजग्मुश्च मानवाः ।
आपो रसातले यास्तु संस्पृष्टाश्चित्रभानुना ॥ ४५ ॥
ताः पर्वतप्रस्रवणैरूष्मां मुञ्चन्ति भार्गव ।
पावकेनाधिशयता संतप्तास्तस्य तेजसा ॥ ४६ ॥
भार्गव! मनुष्योंने अग्निको प्रकट करनेके लिये शमीका मन्थन ही उपाय जाना। अग्निने रसातलमें जिस जलका स्पर्श किया था और वहाँ शयन करनेवाले अग्नि-देवके तेजसे जो संतप्त हो गया था, वह जल पर्वतीय झरनोंके रूपमें अपनी गरमी निकालता है ॥ ४५-४६ ॥
अथाग्निर्देवता दृष्ट्वा बभूव व्यथितस्तदा ।
किमागमनमित्येवं तानपृच्छत पावकः ॥ ४७ ॥
उस समय देवताओंको देखकर अग्निदेव व्यथित हो गये और उनसे पूछने लगे—'किस उद्देश्यसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है?' ॥ ४७ ॥
तमूचुर्विबुधाः सर्वे ते चैव परमर्षयः ।
त्वां नियोक्ष्यामहे कार्ये तद् भवान् कर्तुमर्हति ॥ ४८ ॥
कृते च तस्मिन् भविता तवापि सुमहान् गुणः ॥ ४९ ॥
तब सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनसे बोले—'हम तुम्हें एक कार्यमें नियुक्त करेंगे। उसे तुम्हें करना चाहिये। उस कार्यको सम्पन्न कर देनेपर तुम्हें भी बहुत बड़ा लाभ होगा' ॥ ४८-४९ ॥

अग्निरुवाच
ब्रूत यद् भवतां कार्यं कर्तास्मि तदहं सुराः ।
भवतां तु नियोज्योऽस्मि मा वोऽत्रास्तु विचारणा ॥ ५० ॥
**अग्निने कहा—**देवताओ! आपलोगोंका जो कार्य है उसे मैं अवश्य पूर्ण करूँगा, अतः उसे कहिये। मैं आपलोगोंका आज्ञापालक हूँ। इस विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ॥ ५० ॥

देवा ऊचुः
असुरस्तारको नाम ब्रह्मणो वरदर्पितः ।
अस्मान् प्रबाधते वीर्याद् वधस्तस्य विधीयताम् ॥ ५१ ॥

देवता बोले—अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है। अतः तुम उसके वधका कोई उपाय करो ।। ५१ ।। इमान् देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा । ऋषींश्चापि महाभाग परित्रायस्व पावक ।। ५२ ।। तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो ।। ५२ ।। अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय प्रभो । यद् भयं नोऽसुरात् तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन ।। ५३ ।। प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे ।। ५३ ।। शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम् । अन्यत्र भवतो वीर्यं तस्मात् त्रायस्व नः प्रभो ।। ५४ ।। प्रभो! महादेवी पार्वतीने हमलोगोंको संतानहीन होनेका शाप दे दिया है; अतः तुम्हारे बलवीर्यके सिवा हमारे लिये दूसरा कोई आश्रय नहीं रह गया है इसलिये हमलोगोंकी रक्षा करो ।। ५४ ।। इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा भगवान् हव्यवाहनः । जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति ।। ५५ ।। देवताओंके ऐसा कहनेपर 'तथास्तु' कहकर दुर्धर्ष भगवान् हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये ।। ५५ ।। तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यादधे तदा । ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा ।। ५६ ।। वे वहाँ गंगाजीसे मिले। गंगाजीने उस समय भगवान् शंकरके उस तेजको गर्भरूपसे धारण किया। जैसे सूखे तिनकों अथवा लकड़ियोंके ढेरमें रखी हुई आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वह तेजस्वी गर्भ गंगाजीके भीतर बढ़ने लगा ।। ५६ ।। तेजसा तस्य देवस्य गंगा विह्वलचेतना । संतापमगमत् तीव्रं सोढुं सा न शशाक ह ।। ५७ ।। अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया। वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं ।। ५७ ।। आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजाः समन्विते । गंगायामसुरः कश्चिद् भैरवं नादमानदत् ।। ५८ ।। अग्निके द्वारा गंगाजीमें स्थापित किया हुआ वह तेजस्वी गर्भ जब बढ़ रहा था, उसी समय किसी असुरने वहाँ आकर सहसा बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ।। ५८ ।।

अबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा । वित्रस्तोद्भ्रान्तनयना गंगा विस्रुतलोचना ॥ ५९ ॥ उस आकस्मिक महान् सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगा ॥ ५९ ॥

विसंज्ञा नाशकद् गर्भं वोढुमात्मानमेव च । सा तु तेजःपरीतांगी कम्पयन्तीव जाह्नवी ॥ ६० ॥ उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धता । ते न शक्तास्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे ॥ ६१ ॥ वे अचेत हो गयीं। अतः उस गर्भको और अपने-आपको भी न सम्हाल सकीं। उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे। विप्रवर! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई-सी अग्निसे बोलीं—'भगवन्! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ ॥ ६०-६१ ॥

विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा । विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ ॥ ६२ ॥ ‘निष्पाप अग्निदेव! इसने मुझे मूर्च्छित-सी कर दिया है। मेरा स्वास्थ्य अब पहले-जैसा नहीं रह गया है। भगवन्! मैं बहुत घबरा गयी हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है ॥ ६२ ॥

धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर । उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दुःखान्न तु कामात् कथंचन ॥ ६३ ॥ ‘तपनेवालोंमें श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस गर्भको धारण किये रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। मैं असह्य दुःखसे ही इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छासे किसी प्रकार नहीं ॥ ६३ ॥

न तेजसोऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो । आपदर्थे हि सम्बन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते ॥ ६४ ॥ ‘देव! विभावसो! महाद्युते! इस तेजके साथ मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। इस समय जो अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह भी देवताओंपर आयी हुई विपत्तिको टालनेके उद्देश्यसे ही है ॥ ६४ ॥

यदत्र गुणसम्पन्नमितरद् वा हुताशन । त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ ॥ ६५ ॥ ‘हुताशन! इस कार्यमें यदि कोई गुण या दोषमुक्त परिणाम हो अथवा केवल धर्म या अधर्म हो, उन सबका उत्तरदायित्व आपपर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ' ॥ ६५ ॥

तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति । गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदयः ॥ ६६ ॥ तब अग्निने गंगाजीसे कहा—देवि! यह गर्भ मेरे तेजसे युक्त है, इससे महान् गुणयुक्त फलका उदय होनेवाला है। इसे धारण करो, धारण करो ॥ ६६ ॥

शक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा । न हि ते किंचिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते ॥ ६७ ॥ ‘देवि! तुम सारी पृथ्‍वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भको धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है’ ॥ ६७ ॥ सा वह्निना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा । समुत्ससर्ज तं गर्भं मेरौ गिरिवरे तदा ॥ ६८ ॥ देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया ॥ ६८ ॥ समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता । नाशकत् तं तदा गर्भं संधारयितुमोजसा ॥ ६९ ॥ यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं ॥ ६९ ॥ सा समुत्सृज्य तं दुःखाद् दीप्तवैश्वानरप्रभम् । दर्शयामास चाग्निस्तं तदा गङ्गां भृगूद्वह ॥ ७० ॥ पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद् गर्भः सुखोदयः । कीदृग्वर्णोऽपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते । तेजसा केन वा युक्तः सर्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ७१ ॥ भृगुश्रेष्ठ! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया। तत्पश्चात् अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा—‘देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो’ ॥ ७०-७१ ॥ गंगोवाच जातरूपः स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ । सुवर्णो विमलो दीप्तः पर्वतं चावभासयत् ॥ ७२ ॥ गंगा बोलीं—देव! वह गर्भ क्या है, सोना है। अनघ! वह तेजमें हूबहू आपके ही समान है। सुवर्ण-जैसी निर्मल कान्तिसे प्रकाशित होता है और सारे पर्वतको उद्भासित करता है ॥ ७२ ॥ पद्मोत्पलविमिश्राणां ह्रदानामिव शीतलः । गन्धोऽस्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतां वर ॥ ७३ ॥ तपनेवालोंमें श्रेष्ठ अग्निदेव! कमल और उत्पलसे संयुक्त सरोवरोंके समान उसका अंग शीतल है और कदम्ब-पुष्पोंके समान उससे मीठी-मीठी सुगन्ध फैलती रहती है ॥ ७३ ॥ तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिभिः ।

यद् द्रव्यं परसंस्पृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ७४ ॥ तत् सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात् प्रत्यदृश्यत । सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा ॥ ७४ १/२ ॥

पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च ॥ ७५ ॥ व्यादीपयंस्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् । वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था ॥ ७५ १/२ ॥

एवंरूपः स भगवान् पुत्रस्ते हव्यवाहन । सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः ॥ ७६ ॥ हव्यवाहन! आपका ऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है। वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् है ॥ ७६ ॥

एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् ॥ ७७ ॥ जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन । भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ॥

एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीयते ॥ ७८ ॥ हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा । पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै ॥ ७९ ॥ इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं। उस समय अग्निजनित हिरण्य (वसु) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ॥

स तु गर्भो महातेजा गांगेयः पावकोद्भवः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः ॥ ८० ॥ अग्निके अंशसे उत्पन्न हुआ गंगाका वह महातेजस्वी गर्भ सरकण्डोंके दिव्य वनमें पहुँचकर बढ़ने और अद्भुत दिखायी देने लगा ॥ ८० ॥

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम् । पुत्रं वै ताश्च तं बालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥ ८१ ॥ प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाले उस तेजस्वी बालकको कृत्तिकाओंने देखा और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पालन-पोषण किया ॥ ८१ ॥

ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युतिः ।

स्कन्नत्वात् स्कन्दतां चापि गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ ८२ ॥ इसीलिये वह परम तेजस्वी कुमार 'कार्तिकेय' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शिवके स्कन्दित (स्खलित) वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण उनका नाम 'स्कन्द' हुआ और पर्वतकी गुहामें निवास करनेसे वह 'गुह' कहलाया ।। ८२ ।। एवं सुवर्णमुत्पन्नमपत्यं जातवेदसः । तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम् ॥ ८३ ॥ इस प्रकार अग्निसे सन्तानरूपमें सुवर्णकी उत्पत्ति हुई है। उसमें भी जाम्बूनद नामक सुवर्ण श्रेष्ठ है और वह देवताओंका भी भूषण है ।। ८३ ।। ततः प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहृतम् । रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च ॥ ८४ ॥ तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ। वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आभूषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है ।। ८४ ।। पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मंगलम् । यत् सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः ॥ ८५ ॥ वह पवित्रोंमें भी अधिक पवित्र तथा मंगलोंमें भी अधिक मंगलमय है। जो सुवर्ण है, वही भगवान् अग्नि हैं, वही ईश्वर और प्रजापति हैं ।। ८५ ।। पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तमाः । अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम् ॥ ८६ ॥ द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ।।

वसिष्ठ उवाच

अपि चेदं पुरा राम श्रुतं मे ब्रह्मदर्शनम् । पितामहस्य यद् वृत्तं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ८७ ॥ **वसिष्ठजी कहते हैं—**परशुराम! परमात्मा पितामह ब्रह्माका जो ब्रह्मदर्शन नामक वृत्तान्त मैंने पूर्वकालमें सुना था, वह तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ।। ८७ ।। देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् । ऐश्वर्ये वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो ॥ ८८ ॥ आजग्मुर्मुनयः सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमाः । यज्ञांगानि च सर्वाणि वषट्कारश्च मूर्तिमान् ॥ ८९ ॥ मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रशः । ऋग्वेदश्चागमत् तत्र पदक्रमविभूषितः ॥ ९० ॥

प्रभावशाली तात परशुराम! एक समयकी बात है, सबके ईश्वर और महान् देवता भगवान् रुद्र वरुणका स्वरूप धारण करके वरुणके साम्राज्यपर प्रतिष्ठित थे। उस समय उनके यज्ञमें अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता और ऋषि पधारे। सम्पूर्ण मूर्तिमान् यज्ञांग, वषट्कार, साकार साम, सहस्रों यजुर्मन्त्र तथा पद और क्रमसे विभूषित ऋग्वेद भी वहाँ उपस्थित हुए ।। ८८-९० ।। लक्षणानि स्वराः स्तोभा निरुक्तं सुरपङ्क्तयः । ओङ्कारश्चावसन्नेत्रे निग्रहप्रग्रहौ तथा ।। ९१ ।। वेदोंके लक्षण, उदात्त आदि स्वर, स्तोत्र, निरुक्त, सुरपंक्ति, ओंकार तथा यज्ञके नेत्रस्वरूप प्रग्रह और निग्रह भी उस स्थानपर स्थित थे ।। ९१ ।। वेदाश्च सोपनिषदो विद्या सावित्र्यथापि च । भूतं भव्यं भविष्यं च दधार भगवान् शिवः ।। ९२ ।। वेद, उपनिषद्, विद्या और सावित्री देवी भी वहाँ आयी थीं। भगवान् शिवने भूत, वर्तमान और भविष्य—तीनों कालोंको धारण किया था ।। ९२ ।। संजुहावात्मनाऽऽत्मानं स्वयमेव तदा प्रभो । यज्ञं च शोभयामास बहुरूपं पिनाकधृत् ।। ९३ ।। प्रभो! पिनाकधारी महादेवजीने अनेक रूपवाले उस यज्ञकी शोभा बढ़ायी और उन्होंने स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको आहुति प्रदान की ।। ९३ ।। द्यौर्नभः पृथिवी खं च तथा चैवैष भूपतिः । सर्वविद्येश्वरः श्रीमानेष चापि विभावसुः ।। ९४ ।। ये भगवान् शिव ही स्वर्ग, आकाश, पृथ्वी समस्त शून्य प्रदेश, राजा, सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर तथा तेजस्वी अग्निरूप हैं ।। ९४ ।। एष ब्रह्मा शिवो रुद्रो वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । कीर्त्यते भगवान् देवः सर्वभूतपतिः शिवः ।। ९५ ।। ये ही भगवान् सर्वभूतपति महादेव ब्रह्मा, शिव, रुद्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति तथा कल्याणमय शम्भु आदि नामोंसे पुकारे जाते हैं ।। ९५ ।। तस्य यज्ञः पशुपतेस्तपः क्रतव एव च । दीक्षा दीप्तव्रता देवी दिशश्च सदिगीश्वराः ।। ९६ ।। देवपत्न्यश्च कन्याश्च देवानां चैव मातरः । आजग्मुः सहितास्तत्र तदा भृगुकुलोद्वह ।। ९७ ।। भृगुकुलभूषण! इस प्रकार भगवान् पशुपतिका वह यज्ञ चलने लगा। उसमें सम्मिलित होनेके लिये तप, क्रतु, उद्दीप्त व्रतवाली दीक्षा देवी, दिक्पालोंसहित दिशाएँ, देवपत्नयाँ, देवकन्याएँ तथा देव-माताएँ भी एक साथ आयी थीं ।। ९६-९७ ।। यज्ञं पशुपतेः प्रीता वरुणस्य महात्मनः ।

स्वयम्भुवस्तु ता दृष्ट्वा रेत: समपतद् भुवि ॥ ९८ ॥
महात्मा वरुण पशुपतिके यज्ञमें आकर वे देवांगनाएँ बहुत प्रसन्न थीं। उस समय उन्हें देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजीका वीर्य स्खलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९८ ॥
तस्य शुक्रस्य विस्पन्दान् पांसून् संगृह्य भूमितः।
त्रास्यत् पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ॥ ९९ ॥

तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया ॥ ९९ ॥
ततस्तस्मिन् सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके ।
ब्रह्मणो जुह्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूव ह ॥ १०० ॥

तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ ॥ १०० ॥
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण परिगृह्य सः।
आज्यवन्मन्त्रतश्चापि सोऽजुहोद् भृगुनन्दन ॥ १०१ ॥

भृगुनन्दन! स्खलित होते ही उस वीर्यको स्रुवेमें लेकर उन्होंने स्वयं ही मन्त्र पढ़ते हुए घीकी भाँति उसका होम कर दिया ॥ १०१ ॥
ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान् ।
तस्य तत् तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम् ॥ १०२ ॥

शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस त्रिगुणात्मक वीर्यसे चतुर्विध प्राणिसमुदायको जन्म दिया। उनके वीर्यका जो रजोमय अंश था, उससे जगत्में तैजस प्रवृत्तिप्रधान जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई ॥ १०२ ॥
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम् ।
स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च ॥ १०३ ॥

तमोमय अंशसे तामस पदार्थ—स्थावर वृक्ष आदि प्रकट हुए और जो सात्त्विक अंश था, वह राजस और तामस दोनोंमें अन्तर्भूत हो गया। वह सत्त्वगुण अर्थात् प्रकाशस्वरूपा बुद्धिका नित्यस्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण विश्व भी उस बुद्धिका कार्य होनेसे उसका ही स्वरूप है ॥ १०३ ॥
सर्वभूतेषु च तथा सत्त्वं तेजस्तथोत्तमम् ।
शुक्रे हुतेऽग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रयः प्रभो ॥ १०४ ॥

पुरुषा वपुषा युक्ताः स्वैः स्वैः प्रसवजैर्गुणैः।
अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वगुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है। प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ १०४ ½ ॥
भृगित्येव भृगुः पूर्वमंगारेभ्योऽङ्गिराभवत् ॥ १०५ ॥

अंगारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरोऽभवत् ।
सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद् भृगुः स्मृतः ॥ १०६ ॥
भृग् अर्थात् अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम 'भृगु' हुआ। अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम 'अंगिरा' हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृगु होती है उससे 'कवि' नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भृगु कहलाये ॥ १०५-१०६ ॥

मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीचः कश्यपो ह्यभूत् ।
अंगारेभ्योऽङ्गिस्तस्मात वालखिल्याः कुशोच्चयात् ॥ १०७ ॥
उसी अग्निकी मरीचियोंसे मरीचि उत्पन्न हुए; जिनके पुत्र मारीच—कश्यप नामसे विख्यात हैं। तात! अंगारोंसे अंगिरा और कुशोंके ढेरसे वालखिल्य नामक ऋषि प्रकट हुए थे ॥ १०७ ॥

अत्रैवात्रेति च विभो जातमात्रं वदन्त्यपि ।
तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मताः ॥ १०८ ॥
वैखानसाः समुत्पन्नास्तपः श्रुतगुणेप्सवः ।
अश्रुतोऽस्य समुत्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ ॥ १०९ ॥
विभो! अत्रैव—उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग 'अत्रि' कहते हैं। भस्म—राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र-ज्ञान और सद्गुणोंके अभिलाषी होते हैं। अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप-सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं ॥ १०८-१०९ ॥

शेषाः प्रजानां पतयः स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
ऋषयो रोमकूपेभ्यः स्वेदाच्छन्दो बलान्मनः ॥ ११० ॥
शेष प्रजापतिगण उनके श्रवण आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए। रोमकूपोंसे ऋषि, पसीनेसे छन्द और वीर्यसे मनकी उत्पत्ति हुई ॥ ११० ॥

एतस्मात् कारणादाहुरग्निः सर्वास्तु देवताः ।
ऋषयः श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ १११ ॥
इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है ॥ १११ ॥

यानि दारुणि निर्यासास्ते मासाः पक्षसंज्ञिताः ।
अहोरात्रा मुहूर्ताश्च पित्तं ज्योतिश्च दारुणम् ॥ ११२ ॥
उस यज्ञमें जो समिधाएँ काममें ली गयीं तथा उनसे जो रस निकला, वे ही सब मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्तरूप हो गये और अग्निका जो पित्त था, वह उग्र तेज होकर प्रकट हुआ ॥ ११२ ॥

रौद्रं लोहितमित्याहुर्लोहितात् कनकं स्मृतम् ।