महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 730, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें'भृगुनन्दन! मैंने पहले पुराणमें प्रजापतिकी कही हुई यह न्यायोचित बात सुन रखी है ।। ५९ ।। शूलपाणेर्भगवतो रुद्रस्य च महात्मनः । गिरौ हिमवति श्रेष्ठे तदा भृगुकुलोद्वह ।। ६० ।। देव्या विवाहे निर्वृत्ते रुद्राण्या भृगुनन्दन । समागमे भगवतो देव्या सह महात्मनः ।। ६१ ।। 'भृगुकुलरत्न! भृगुनन्दन परशुराम! यह बात उस समयकी है, जब श्रेष्ठ पर्वत हिमालयपर शूलपाणि महात्मा भगवान् रुद्रका देवी रुद्राणीके साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ था और महामना भगवान् शिवको उमादेवीके साथ समागम-सुख प्राप्त था ।। ६०-६१ ।। ततः सर्वे समुद्विग्ना देवा रुद्रमुपागमन् । ते महादेवमासीनं देवीं च वरदामुमाम् ।। ६२ ।। 'उस समय सब देवता उद्विग्न होकर कैलास-शिखरपर बैठे हुए महान् देवता रुद्र और वरदायिनी देवी उमाके पास गये ।। ६२ ।। प्रसाद्य शिरसा सर्वे रुद्रमूचुर्भृगूद्वह । अयं समागमो देव देव्या सह तवानघ ।। ६३ ।। तपस्विनस्तपस्विन्या तेजस्विन्याऽतितेजसः । भृगुश्रेष्ठ! वहाँ उन सबने उन दोनोंके चरणोंमें मस्तक झुकाकर उन्हें प्रसन्न करके भगवान् रुद्रसे कहा—'पापरहित महादेव! यह जो देवी पार्वतीके साथ आपका समागम हुआ है, यह एक तपस्वीका तपस्विनीके साथ और एक महातेजस्वीका एक तेजस्विनीके साथ संयोग हुआ है ।। ६३ १/२ ।। अमोघतेजास्त्वं देव देवी चेयमुमा तथा ।। ६४ ।। अपत्यं युवयोर्देव बलवद् भविता विभो । तन्नूनं त्रिषु लोकेषु न किञ्चिच्छेषयिष्यति ।। ६५ ।। 'देव! प्रभो! आपका तेज अमोघ है। ये देवी उमा भी ऐसी ही अमोघ तेजस्विनी हैं। आप दोनोंकी जो संतान होगी वह अत्यन्त प्रबल होगी। निश्चय ही वह तीनों लोकोंमें किसीको शेष नहीं रहने देगी ।। तदेभ्यः प्रणतेभ्यस्त्वं देवेभ्यः पृथुलोचन । वरं प्रयच्छ लोकेश त्रैलोक्यहितकाम्यया ।। ६६ ।। 'विशाललोचन! लोकेश्वर! हम सब देवता आपके चरणोंमें पड़े हैं। आप तीनों लोकोंके हितकी इच्छासे हमें वर दीजिये ।। ६६ ।। अपत्यार्थं निगृह्णीष्व तेजः परमकं विभो । त्रैलोक्यसारौ हि युवां लोकं संतापयिष्यथः ।। ६७ ।।