महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 744, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयद् द्रव्यं परसंस्पृष्टं पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ७४ ॥ तत् सर्वं काञ्चनीभूतं समन्तात् प्रत्यदृश्यत । सूर्यकी किरणोंके समान उस गर्भसे वहाँकी भूमि या पर्वतोंपर रहनेवाले जिस किसी द्रव्यका स्पर्श हुआ, वह सब चारों ओरसे सुवर्णमय दिखायी देने लगा ॥ ७४ १/२ ॥
पर्यधावत शैलांश्च नदीः प्रस्रवणानि च ॥ ७५ ॥ व्यादीपयंस्तेजसा च त्रैलोक्यं सचराचरम् । वह बालक अपने तेजसे चराचर प्राणियोंको प्रकाशित करता हुआ पर्वतों, नदियों और झरनोंकी ओर दौड़ने लगा था ॥ ७५ १/२ ॥
एवंरूपः स भगवान् पुत्रस्ते हव्यवाहन । सूर्यवैश्वानरसमः कान्त्या सोम इवापरः ॥ ७६ ॥ हव्यवाहन! आपका ऐश्वर्यशाली पुत्र ऐसे ही रूपवाला है। वह सूर्य तथा आपके समान तेजस्वी और दूसरे चन्द्रमाके समान कान्तिमान् है ॥ ७६ ॥
एवमुक्त्वा तु सा देवी तत्रैवान्तरधीयत । पावकश्चापि तेजस्वी कृत्वा कार्यं दिवौकसाम् ॥ ७७ ॥ जगामेष्टं ततो देशं तदा भार्गवनन्दन । भार्गवनन्दन! ऐसा कहकर देवी गंगा वहीं अन्तर्धान हो गयीं और तेजस्वी अग्निदेव देवताओंका कार्य सिद्ध करके उस समय वहाँसे अभीष्ट देशको चले गये ॥
एतैः कर्मगुणैर्लोके नामाग्नेः परिगीयते ॥ ७८ ॥ हिरण्यरेता इति वै ऋषिभिर्विबुधैस्तथा । पृथिवी च तदा देवी ख्याता वसुमतीति वै ॥ ७९ ॥ इन्हीं समस्त कर्मों और गुणोंके कारण देवता तथा ऋषि संसारमें अग्निको हिरण्यरेताके नामसे पुकारते हैं। उस समय अग्निजनित हिरण्य (वसु) धारण करनेके कारण पृथ्वीदेवी वसुमती नामसे विख्यात हुईं ॥
स तु गर्भो महातेजा गांगेयः पावकोद्भवः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधेऽद्भुतदर्शनः ॥ ८० ॥ अग्निके अंशसे उत्पन्न हुआ गंगाका वह महातेजस्वी गर्भ सरकण्डोंके दिव्य वनमें पहुँचकर बढ़ने और अद्भुत दिखायी देने लगा ॥ ८० ॥
ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालार्कसदृशद्युतिम् । पुत्रं वै ताश्च तं बालं पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥ ८१ ॥ प्रभातकालके सूर्यकी भाँति अरुण कान्तिवाले उस तेजस्वी बालकको कृत्तिकाओंने देखा और उसे अपना पुत्र मानकर स्तनोंका दूध पिलाकर उसका पालन-पोषण किया ॥ ८१ ॥
ततः स कार्तिकेयत्वमवाप परमद्युतिः ।