महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 745, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्कन्नत्वात् स्कन्दतां चापि गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ ८२ ॥ इसीलिये वह परम तेजस्वी कुमार 'कार्तिकेय' नामसे प्रसिद्ध हुआ। शिवके स्कन्दित (स्खलित) वीर्यसे उत्पन्न होनेके कारण उनका नाम 'स्कन्द' हुआ और पर्वतकी गुहामें निवास करनेसे वह 'गुह' कहलाया ।। ८२ ।। एवं सुवर्णमुत्पन्नमपत्यं जातवेदसः । तत्र जाम्बूनदं श्रेष्ठं देवानामपि भूषणम् ॥ ८३ ॥ इस प्रकार अग्निसे सन्तानरूपमें सुवर्णकी उत्पत्ति हुई है। उसमें भी जाम्बूनद नामक सुवर्ण श्रेष्ठ है और वह देवताओंका भी भूषण है ।। ८३ ।। ततः प्रभृति चाप्येतज्जातरूपमुदाहृतम् । रत्नानामुत्तमं रत्नं भूषणानां तथैव च ॥ ८४ ॥ तभीसे सुवर्णका नाम जातरूप हुआ। वह रत्नोंमें उत्तम रत्न और आभूषणोंमें श्रेष्ठ आभूषण है ।। ८४ ।। पवित्रं च पवित्राणां मङ्गलानां च मंगलम् । यत् सुवर्णं स भगवानग्निरीशः प्रजापतिः ॥ ८५ ॥ वह पवित्रोंमें भी अधिक पवित्र तथा मंगलोंमें भी अधिक मंगलमय है। जो सुवर्ण है, वही भगवान् अग्नि हैं, वही ईश्वर और प्रजापति हैं ।। ८५ ।। पवित्राणां पवित्रं हि कनकं द्विजसत्तमाः । अग्नीषोमात्मकं चैव जातरूपमुदाहृतम् ॥ ८६ ॥ द्विजवरो! सुवर्ण सम्पूर्ण पवित्र वस्तुओंमें अतिशय पवित्र है; उसे अग्नि और सोमरूप बताया गया है ।।
वसिष्ठ उवाच
अपि चेदं पुरा राम श्रुतं मे ब्रह्मदर्शनम् । पितामहस्य यद् वृत्तं ब्रह्मणः परमात्मनः ॥ ८७ ॥ **वसिष्ठजी कहते हैं—**परशुराम! परमात्मा पितामह ब्रह्माका जो ब्रह्मदर्शन नामक वृत्तान्त मैंने पूर्वकालमें सुना था, वह तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ।। ८७ ।। देवस्य महतस्तात वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् । ऐश्वर्ये वारुणे राम रुद्रस्येशस्य वै प्रभो ॥ ८८ ॥ आजग्मुर्मुनयः सर्वे देवाश्चाग्निपुरोगमाः । यज्ञांगानि च सर्वाणि वषट्कारश्च मूर्तिमान् ॥ ८९ ॥ मूर्तिमन्ति च सामानि यजूंषि च सहस्रशः । ऋग्वेदश्चागमत् तत्र पदक्रमविभूषितः ॥ ९० ॥