महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 743, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंशक्ता ह्यसि महीं कृत्स्नां वोढुं धारयितुं तथा । न हि ते किंचिदप्राप्यमन्यतो धारणादृते ॥ ६७ ॥ ‘देवि! तुम सारी पृथ्वीको धारण करनेमें समर्थ हो, फिर इस गर्भको धारण करना तुम्हारे लिये कुछ असाध्य नहीं है’ ॥ ६७ ॥ सा वह्निना वार्यमाणा देवैरपि सरिद्वरा । समुत्ससर्ज तं गर्भं मेरौ गिरिवरे तदा ॥ ६८ ॥ देवताओं तथा अग्निके मना करनेपर भी सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाने उस गर्भको गिरिराज मेरुके शिखरपर छोड़ दिया ॥ ६८ ॥ समर्था धारणे चापि रुद्रतेजःप्रधर्षिता । नाशकत् तं तदा गर्भं संधारयितुमोजसा ॥ ६९ ॥ यद्यपि गंगाजी उस गर्भको धारण करनेमें समर्थ थीं; तो भी रुद्रके तेजसे पराभूत होकर बलपूर्वक उसे धारण न कर सकीं ॥ ६९ ॥ सा समुत्सृज्य तं दुःखाद् दीप्तवैश्वानरप्रभम् । दर्शयामास चाग्निस्तं तदा गङ्गां भृगूद्वह ॥ ७० ॥ पप्रच्छ सरितां श्रेष्ठां कच्चिद् गर्भः सुखोदयः । कीदृग्वर्णोऽपि वा देवि कीदृग्रूपश्च दृश्यते । तेजसा केन वा युक्तः सर्वमेतद् ब्रवीहि मे ॥ ७१ ॥ भृगुश्रेष्ठ! गंगाजीने बड़े दुःखसे अग्निके समान तेजस्वी उस गर्भको त्याग दिया। तत्पश्चात् अग्निने उनका दर्शन किया और सरिताओंमें श्रेष्ठ उन गंगाजीसे पूछा—‘देवि! तुम्हारा गर्भ सुखपूर्वक उत्पन्न हो गया है न? उसकी कान्ति कैसी है अथवा उसका रूप कैसा दिखायी देता है, वह कैसे तेजसे युक्त है? यह सारी बातें मुझसे कहो’ ॥ ७०-७१ ॥ गंगोवाच जातरूपः स गर्भो वै तेजसा त्वमिवानघ । सुवर्णो विमलो दीप्तः पर्वतं चावभासयत् ॥ ७२ ॥ गंगा बोलीं—देव! वह गर्भ क्या है, सोना है। अनघ! वह तेजमें हूबहू आपके ही समान है। सुवर्ण-जैसी निर्मल कान्तिसे प्रकाशित होता है और सारे पर्वतको उद्भासित करता है ॥ ७२ ॥ पद्मोत्पलविमिश्राणां ह्रदानामिव शीतलः । गन्धोऽस्य स कदम्बानां तुल्यो वै तपतां वर ॥ ७३ ॥ तपनेवालोंमें श्रेष्ठ अग्निदेव! कमल और उत्पलसे संयुक्त सरोवरोंके समान उसका अंग शीतल है और कदम्ब-पुष्पोंके समान उससे मीठी-मीठी सुगन्ध फैलती रहती है ॥ ७३ ॥ तेजसा तस्य गर्भस्य भास्करस्येव रश्मिभिः ।