महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 742, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअबुद्धिपतितेनाथ नादेन विपुलेन सा । वित्रस्तोद्भ्रान्तनयना गंगा विस्रुतलोचना ॥ ५९ ॥ उस आकस्मिक महान् सिंहनादसे भयभीत हुई गंगाजीकी आँखें घूमने लगीं और उनके नेत्रोंसे आँसू बहने लगा ॥ ५९ ॥
विसंज्ञा नाशकद् गर्भं वोढुमात्मानमेव च । सा तु तेजःपरीतांगी कम्पयन्तीव जाह्नवी ॥ ६० ॥ उवाच ज्वलनं विप्र तदा गर्भबलोद्धता । ते न शक्तास्मि भगवंस्तेजसोऽस्य विधारणे ॥ ६१ ॥ वे अचेत हो गयीं। अतः उस गर्भको और अपने-आपको भी न सम्हाल सकीं। उनके सारे अंग तेजसे व्याप्त हो रहे थे। विप्रवर! उस समय जाह्नवी देवी उस गर्भकी शक्तिसे अभिभूत हो काँपती हुई-सी अग्निसे बोलीं—'भगवन्! मैं आपके इस तेजको धारण करनेमें असमर्थ हूँ ॥ ६०-६१ ॥
विमूढास्मि कृतानेन न मे स्वास्थ्यं यथा पुरा । विह्वला चास्मि भगवंश्चेतो नष्टं च मेऽनघ ॥ ६२ ॥ ‘निष्पाप अग्निदेव! इसने मुझे मूर्च्छित-सी कर दिया है। मेरा स्वास्थ्य अब पहले-जैसा नहीं रह गया है। भगवन्! मैं बहुत घबरा गयी हूँ। मेरी चेतना लुप्त-सी हो रही है ॥ ६२ ॥
धारणे नास्य शक्ताहं गर्भस्य तपतां वर । उत्स्रक्ष्येऽहमिमं दुःखान्न तु कामात् कथंचन ॥ ६३ ॥ ‘तपनेवालोंमें श्रेष्ठ पावक! अब मुझमें इस गर्भको धारण किये रहनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। मैं असह्य दुःखसे ही इसे त्यागने जा रही हूँ। स्वेच्छासे किसी प्रकार नहीं ॥ ६३ ॥
न तेजसोऽस्ति संस्पर्शो मम देव विभावसो । आपदर्थे हि सम्बन्धः सुसूक्ष्मोऽपि महाद्युते ॥ ६४ ॥ ‘देव! विभावसो! महाद्युते! इस तेजके साथ मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। इस समय जो अत्यन्त सूक्ष्म सम्बन्ध स्थापित हुआ है वह भी देवताओंपर आयी हुई विपत्तिको टालनेके उद्देश्यसे ही है ॥ ६४ ॥
यदत्र गुणसम्पन्नमितरद् वा हुताशन । त्वय्येव तदहं मन्ये धर्माधर्मौ च केवलौ ॥ ६५ ॥ ‘हुताशन! इस कार्यमें यदि कोई गुण या दोषमुक्त परिणाम हो अथवा केवल धर्म या अधर्म हो, उन सबका उत्तरदायित्व आपपर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ' ॥ ६५ ॥
तामुवाच ततो वह्निर्धार्यतां धार्यतामिति । गर्भो मत्तेजसा युक्तो महागुणफलोदयः ॥ ६६ ॥ तब अग्निने गंगाजीसे कहा—देवि! यह गर्भ मेरे तेजसे युक्त है, इससे महान् गुणयुक्त फलका उदय होनेवाला है। इसे धारण करो, धारण करो ॥ ६६ ॥