भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 741, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 741

देवता बोले—अग्निदेव! एक तारकनामक असुर है जो ब्रह्माजीके वरदानसे मदमत्त होकर अपने पराक्रमसे हम सब लोगोंको कष्ट दे रहा है। अतः तुम उसके वधका कोई उपाय करो ।। ५१ ।। इमान् देवगणांस्तात प्रजापतिगणांस्तथा । ऋषींश्चापि महाभाग परित्रायस्व पावक ।। ५२ ।। तात! महाभाग पावक! इन देवताओं, प्रजापतियों तथा ऋषियोंकी भी रक्षा करो ।। ५२ ।। अपत्यं तेजसा युक्तं प्रवीरं जनय प्रभो । यद् भयं नोऽसुरात् तस्मान्नाशयेद्धव्यवाहन ।। ५३ ।। प्रभो! हव्यवाहन! तुम एक ऐसा तेजस्वी और महावीर पुत्र उत्पन्न करो जो उस असुरसे प्राप्त होनेवाले हमारे भयका नाश करे ।। ५३ ।। शप्तानां नो महादेव्या नान्यदस्ति परायणम् । अन्यत्र भवतो वीर्यं तस्मात् त्रायस्व नः प्रभो ।। ५४ ।। प्रभो! महादेवी पार्वतीने हमलोगोंको संतानहीन होनेका शाप दे दिया है; अतः तुम्हारे बलवीर्यके सिवा हमारे लिये दूसरा कोई आश्रय नहीं रह गया है इसलिये हमलोगोंकी रक्षा करो ।। ५४ ।। इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा भगवान् हव्यवाहनः । जगामाथ दुराधर्षो गङ्गां भागीरथीं प्रति ।। ५५ ।। देवताओंके ऐसा कहनेपर 'तथास्तु' कहकर दुर्धर्ष भगवान् हव्यवाहन भागीरथी गंगाके तटपर गये ।। ५५ ।। तया चाप्यभवन्मिश्रो गर्भं चास्यादधे तदा । ववृधे स तदा गर्भः कक्षे कृष्णगतिर्यथा ।। ५६ ।। वे वहाँ गंगाजीसे मिले। गंगाजीने उस समय भगवान् शंकरके उस तेजको गर्भरूपसे धारण किया। जैसे सूखे तिनकों अथवा लकड़ियोंके ढेरमें रखी हुई आग प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार वह तेजस्वी गर्भ गंगाजीके भीतर बढ़ने लगा ।। ५६ ।। तेजसा तस्य देवस्य गंगा विह्वलचेतना । संतापमगमत् तीव्रं सोढुं सा न शशाक ह ।। ५७ ।। अग्निदेवके दिये हुए उस तेजसे गंगाजीका चित्त व्याकुल हो गया। वे अत्यन्त संतप्त हो उठीं और उसे सहन करनेमें असमर्थ हो गयीं ।। ५७ ।। आहिते ज्वलनेनाथ गर्भे तेजाः समन्विते । गंगायामसुरः कश्चिद् भैरवं नादमानदत् ।। ५८ ।। अग्निके द्वारा गंगाजीमें स्थापित किया हुआ वह तेजस्वी गर्भ जब बढ़ रहा था, उसी समय किसी असुरने वहाँ आकर सहसा बड़े जोरसे भयानक गर्जना की ।। ५८ ।।