महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 737, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंलोकानन्वचरन् सिद्धाः सर्व एव भृगूत्तम ॥ २१ ॥
भृगुश्रेष्ठ! उत्तम तपस्यासे युक्त, तेजस्वी और लोकविख्यात सभी सिद्ध देवता सभी लोकोंमें अग्निदेवकी खोज करते रहे ॥ २१ ॥
नष्टात्मनि संलीनं नाधिजग्मुर्हुताशनम् ।
ततः संजातसंत्रासानग्निदर्शनलालसान् ॥ २२ ॥
जलेचरः क्लान्तमनास्तेजसाग्नेः प्रदीपितः ।
उवाच देवान् मण्डूको रसातलतलोत्थितः ॥ २३ ॥
वे छिपकर अपने-आपमें ही लीन थे; अतः देवता उनके पास नहीं पहुँच सके। तब अग्निका दर्शन करनेके लिये उत्सुक और भयभीत हुए देवताओंसे एक जलचारी मेढक, जो अग्निके तेजसे दग्ध एवं क्लान्तचित्त होकर रसातलसे ऊपरको आया था, बोला— ॥ २२-२३ ॥
रसातलतले देवा वसत्यग्निरिति प्रभो ।
संतापादिह सम्प्राप्तः पावकप्रभवादहम् ॥ २४ ॥
'देवताओ! अग्नि रसातलमें निवास करते हैं। प्रभो! मैं अग्निजनित संतापसे ही घबराकर यहाँ आया हूँ ॥ २४ ॥
स संसुप्तो जले देवा भगवान् हव्यवाहनः ।
अपः संसृज्य तेजोभिस्तेन संतापिता वयम् ॥ २५ ॥
'देवगण! भगवान् अग्निदेव अपने तेजके साथ जलको संयुक्त करके जलमें ही सोये हैं। हमलोग उन्हींके तेजसे संतप्त हो रहे हैं ॥ २५ ॥
तस्य दर्शनमिष्टं वो यदि देवा विभावसोः ।
तत्रैवमधिगच्छध्वं कार्यं वो यदि वह्निना ॥ २६ ॥
'देवताओ! यदि आपको अग्निदेवका दर्शन अभीष्ट हो और यदि उनसे आपका कोई कार्य हो तो वहीं जाकर उनसे मिलिये ॥ २६ ॥
गम्यतां साधयिष्यामो वयं ह्यग्निभयात् सुराः ।
एतावदुक्त्वा मण्डूकस्त्वरितो जलमाविशत् ॥ २७ ॥
'देवगण! आप जाइये। हम भी अग्निके भयसे अन्यत्र जायँगे।' इतना ही कहकर वह मेढक तुरंत ही जलमें घुस गया ॥ २७ ॥
हुताशनस्तु बुबुधे मण्डूकस्य च पैशुनम् ।
शशाप स तमासाद्य न रसान् वेत्स्यसीति वै ॥ २८ ॥
अग्निदेव समझ गये कि मेढकने मेरी चुगली खायी है; अतः उन्होंने उसके पास पहुँचकर यह शाप दे दिया कि 'तुम्हें रसका अनुभव नहीं होगा' ॥ २८ ॥
तं वै संयुज्य शापेन मण्डूकं त्वरितो ययौ ।
अन्यत्र वासाय विभुर्न चात्मानमदर्शयत् ॥ २९ ॥