भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 747, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 747

स्वयम्भुवस्तु ता दृष्ट्वा रेत: समपतद् भुवि ॥ ९८ ॥
महात्मा वरुण पशुपतिके यज्ञमें आकर वे देवांगनाएँ बहुत प्रसन्न थीं। उस समय उन्हें देखकर स्वयम्भू ब्रह्माजीका वीर्य स्खलित हो पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ९८ ॥
तस्य शुक्रस्य विस्पन्दान् पांसून् संगृह्य भूमितः।
त्रास्यत् पूषा कराभ्यां वै तस्मिन्नेव हुताशने ॥ ९९ ॥

तब ब्रह्माजीके वीर्यसे संसिक्त धूलिकणोंको दोनों हाथोंद्वारा भूमिसे उठाकर पूषाने उसी आगमें फेंक दिया ॥ ९९ ॥
ततस्तस्मिन् सम्प्रवृत्ते सत्रे ज्वलितपावके ।
ब्रह्मणो जुह्वतस्तत्र प्रादुर्भावो बभूव ह ॥ १०० ॥

तदनन्तर प्रज्वलित अग्निवाले उस यज्ञके चालू होनेपर वहाँ ब्रह्माजीका वीर्य पुनः स्खलित हुआ ॥ १०० ॥
स्कन्नमात्रं च तच्छुक्रं स्रुवेण परिगृह्य सः।
आज्यवन्मन्त्रतश्चापि सोऽजुहोद् भृगुनन्दन ॥ १०१ ॥

भृगुनन्दन! स्खलित होते ही उस वीर्यको स्रुवेमें लेकर उन्होंने स्वयं ही मन्त्र पढ़ते हुए घीकी भाँति उसका होम कर दिया ॥ १०१ ॥
ततः स जनयामास भूतग्रामं च वीर्यवान् ।
तस्य तत् तेजसस्तस्माज्जज्ञे लोकेषु तैजसम् ॥ १०२ ॥

शक्तिशाली ब्रह्माजीने उस त्रिगुणात्मक वीर्यसे चतुर्विध प्राणिसमुदायको जन्म दिया। उनके वीर्यका जो रजोमय अंश था, उससे जगत्में तैजस प्रवृत्तिप्रधान जंगम प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई ॥ १०२ ॥
तमसस्तामसा भावा व्यापि सत्त्वं तथोभयम् ।
स गुणस्तेजसो नित्यस्तस्य चाकाशमेव च ॥ १०३ ॥

तमोमय अंशसे तामस पदार्थ—स्थावर वृक्ष आदि प्रकट हुए और जो सात्त्विक अंश था, वह राजस और तामस दोनोंमें अन्तर्भूत हो गया। वह सत्त्वगुण अर्थात् प्रकाशस्वरूपा बुद्धिका नित्यस्वरूप है और आकाश आदि सम्पूर्ण विश्व भी उस बुद्धिका कार्य होनेसे उसका ही स्वरूप है ॥ १०३ ॥
सर्वभूतेषु च तथा सत्त्वं तेजस्तथोत्तमम् ।
शुक्रे हुतेऽग्नौ तस्मिंस्तु प्रादुरासंस्त्रयः प्रभो ॥ १०४ ॥

पुरुषा वपुषा युक्ताः स्वैः स्वैः प्रसवजैर्गुणैः।
अतः सम्पूर्ण भूतोंमें जो सत्त्वगुण तथा उत्तम तेज है, वह प्रजापतिके उस शुक्रसे ही प्रकट हुआ है। प्रभो! ब्रह्माजीके वीर्यकी जब अग्निमें आहुति दी गयी तब उससे तीन शरीरधारी पुरुष उत्पन्न हुए, जो अपने-अपने कारणजनित गुणोंसे सम्पन्न थे ॥ १०४ ½ ॥
भृगित्येव भृगुः पूर्वमंगारेभ्योऽङ्गिराभवत् ॥ १०५ ॥