महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 748, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअंगारसंश्रयाच्चैव कविरित्यपरोऽभवत् ।
सह ज्वालाभिरुत्पन्नो भृगुस्तस्माद् भृगुः स्मृतः ॥ १०६ ॥
भृग् अर्थात् अग्निकी ज्वालासे उत्पन्न होनेके कारण एक पुरुषका नाम 'भृगु' हुआ। अंगारोंसे प्रकट हुए दूसरे पुरुषका नाम 'अंगिरा' हुआ और अंगारोंके आश्रित जो स्वल्पमात्र ज्वाला या भृगु होती है उससे 'कवि' नामक तीसरे पुरुषका प्रादुर्भाव हुआ। भृगुजी ज्वालाओंके साथ ही उत्पन्न हुए थे, उससे भृगु कहलाये ॥ १०५-१०६ ॥
मरीचिभ्यो मरीचिस्तु मारीचः कश्यपो ह्यभूत् ।
अंगारेभ्योऽङ्गिस्तस्मात वालखिल्याः कुशोच्चयात् ॥ १०७ ॥
उसी अग्निकी मरीचियोंसे मरीचि उत्पन्न हुए; जिनके पुत्र मारीच—कश्यप नामसे विख्यात हैं। तात! अंगारोंसे अंगिरा और कुशोंके ढेरसे वालखिल्य नामक ऋषि प्रकट हुए थे ॥ १०७ ॥
अत्रैवात्रेति च विभो जातमात्रं वदन्त्यपि ।
तथा भस्मव्यपोहेभ्यो ब्रह्मर्षिगणसम्मताः ॥ १०८ ॥
वैखानसाः समुत्पन्नास्तपः श्रुतगुणेप्सवः ।
अश्रुतोऽस्य समुत्पन्नावश्विनौ रूपसम्मतौ ॥ १०९ ॥
विभो! अत्रैव—उन्हीं कुशसमूहोंसे एक और ब्रह्मर्षि उत्पन्न हुए, जिन्हें लोग 'अत्रि' कहते हैं। भस्म—राशियोंसे ब्रह्मर्षियोंद्वारा सम्मानित वैखानसोंकी उत्पत्ति हुई, जो तपस्या, शास्त्र-ज्ञान और सद्गुणोंके अभिलाषी होते हैं। अग्निके अश्रुसे दोनों अश्विनीकुमार प्रकट हुए, जो अपनी रूप-सम्पत्तिके द्वारा सर्वत्र सम्मानित हैं ॥ १०८-१०९ ॥
शेषाः प्रजानां पतयः स्रोतोभ्यस्तस्य जज्ञिरे ।
ऋषयो रोमकूपेभ्यः स्वेदाच्छन्दो बलान्मनः ॥ ११० ॥
शेष प्रजापतिगण उनके श्रवण आदि इन्द्रियोंसे उत्पन्न हुए। रोमकूपोंसे ऋषि, पसीनेसे छन्द और वीर्यसे मनकी उत्पत्ति हुई ॥ ११० ॥
एतस्मात् कारणादाहुरग्निः सर्वास्तु देवताः ।
ऋषयः श्रुतसम्पन्ना वेदप्रामाण्यदर्शनात् ॥ १११ ॥
इस कारणसे शास्त्रज्ञानसम्पन्न महर्षियोंने वेदोंकी प्रामाणिकतापर दृष्टि रखते हुए अग्निको सर्वदेवमय बताया है ॥ १११ ॥
यानि दारुणि निर्यासास्ते मासाः पक्षसंज्ञिताः ।
अहोरात्रा मुहूर्ताश्च पित्तं ज्योतिश्च दारुणम् ॥ ११२ ॥
उस यज्ञमें जो समिधाएँ काममें ली गयीं तथा उनसे जो रस निकला, वे ही सब मास, पक्ष, दिन, रात एवं मुहूर्तरूप हो गये और अग्निका जो पित्त था, वह उग्र तेज होकर प्रकट हुआ ॥ ११२ ॥
रौद्रं लोहितमित्याहुर्लोहितात् कनकं स्मृतम् ।