महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 749, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतन्मैत्रमिति विज्ञेयं धूमाच्च वसवः स्मृताः ॥ ११३ ॥ अग्निके तेजको लोहित कहते हैं, उस लोहितसे कनक उत्पन्न हुआ। उस कनकको मैत्र जानना चाहिये तथा अग्निके धूमसे वसुओंकी उत्पत्ति बतायी गयी है ॥ अर्चिषो याश्च ते रुद्रास्तथाऽऽदित्या महाप्रभाः । उद्दिष्टास्ते तथांगारा ये धिष्ण्येषु दिवि स्थिताः ॥ ११४ ॥ अग्निकी जो लपटें होती हैं, वे ही एकादश रुद्र तथा अत्यन्त तेजस्वी द्वादश आदित्य हैं, तथा उस यज्ञमें जो दूसरे-दूसरे अंगारे थे वे ही आकाशस्थित नक्षत्रमण्डलोंमें ज्योतिःपुंजके रूपमें स्थित हैं ॥ ११४ ॥ आदिकर्ता च लोकस्य तत्परं ब्रह्म तद् ध्रुवम् । सर्वकामदमित्याहुस्तद्रहस्यमुवाच ह ॥ ११५ ॥ इस लोकके जो आदि स्रष्टा हैं, उन ब्रह्माजीका कथन है कि अग्नि परब्रह्मस्वरूप है। वही अविनाशी परब्रह्म परमात्मा है और वही सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। यह गोपनीय रहस्य ज्ञानी पुरुष बताते हैं ॥ ततोऽब्रवीन्महादेवो वरुणः पवनात्मकः । मम सत्रमिदं दिव्यमहं गृहपतिस्त्विह ॥ ११६ ॥ तब वरुण एवं वायुरूप महादेवजीने कहा—‘देवताओ! यह मेरा दिव्य यज्ञ है। मैं ही इस यज्ञका गृहस्थ यजमान हूँ ॥ ११६ ॥ त्रीणि पूर्वाण्यपत्यानि मम तानि न संशयः । इति जानीत खगमा मम यज्ञफलं हि तत् ॥ ११७ ॥ ‘आकाशचारी देवगण! पहले जो तीन पुरुष प्रकट हुए हैं, वे भृगु, अंगिरा और कवि मेरे पुत्र हैं, इसमें संशय नहीं है। इस बातको तुम जान लो; क्योंकि इस यज्ञका जो कुछ फल है, उसपर मेरा ही अधिकार है’ ॥ ११७ ॥
अग्निरुवाच
मदङ्गेभ्यः प्रसूतानि मदाश्रयकृतानि च । ममैव तान्यपत्यानि वरुणो ह्यवशात्मकः ॥ ११८ ॥ **अग्नि बोले—**ये तीनों संतानें मेरे अंगोंसे उत्पन्न हुई हैं और मेरे ही आश्रयमें विधाताने इनकी सृष्टि की है। अतः ये तीनों मेरे ही पुत्र हैं। वरुणरूपधारी महादेवजीका इनपर कोई अधिकार नहीं है ॥ ११८ ॥ अथाब्रवील्लोकगुरुर्ब्रह्मा लोकपितामहः । ममैव तान्यपत्यानि मम शुक्रं हुतं हि तत् ॥ ११९ ॥ तदनन्तर लोकपितामह लोकगुरु ब्रह्माजीने कहा—‘ये सब मेरी ही संतानें हैं; क्योंकि मेरे ही वीर्यकी आहुति दी गयी है; जिससे इनकी उत्पत्ति हुई है ॥