भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 750, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 750

अहं कर्ता हि सत्रस्य होता शुक्रस्य चैव ह । यस्य बीजं फलं तस्य शुक्रं चेत् कारणं मतम् ॥ १२० ॥ ‘मैं ही यज्ञका कर्ता और अपने वीर्यका हवन करनेवाला हूँ। जिसका बीज होता है उसको ही उसका फल मिलता है। यदि इनकी उत्पत्तिमें वीर्यको ही कारण माना जाय तो निश्चय ही ये मेरे पुत्र हैं’ ॥ १२० ॥ ततोऽब्रुवन् देवगणाः पितामहमुपेत्य वै । कृताञ्जलिपुटाः सर्वे शिरोभिरभिवन्द्य च ॥ १२१ ॥ इस प्रकार विवाद उपस्थित होनेपर समस्त देवताओंने ब्रह्माजीके पास जा दोनों हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर उनको प्रणाम किया और कहा— ॥ १२१ ॥ वयं च भगवन् सर्वे जगच्च सचराचरम् । तवैव प्रसवाः सर्वे तस्मादग्निर्विभावसुः ॥ १२२ ॥ वरुणश्चेश्वरो देवो लभतां काममीप्सितम् । ‘भगवन्! हम सब लोग और चराचरसहित सारा जगत् ये सब-के-सब आपकी ही संतान हैं। अतः अब ये प्रकाशमान अग्नि और ये वरुणरूपधारी ईश्वर महादेव भी अपना मनोवांछित फल प्राप्त करें’ ॥ १२२ १/२ ॥ निसर्गाद् ब्रह्मणश्चापि वरुणो यादसाम्पतिः ॥ १२३ ॥ जग्राह वै भृगुं पूर्वमपत्यं सूर्यवर्चसम् । ईश्वरोऽङ्गिरसं चाग्नेरपत्यार्थमकल्पयत् ॥ १२४ ॥ तब ब्रह्माजीकी आज्ञासे जलजन्तुओंके स्वामी वरुणरूपी भगवान् शिवने सबसे पहले सूर्यके समान तेजस्वी भृगुको पुत्ररूपमें ग्रहण किया। फिर उन्होंने ही अंगिराको अग्निकी संतान निश्चित किया ॥ १२३-१२४ ॥ पितामहस्त्वपत्यं वै कविं जग्राह तत्त्ववित् । तदा स वारुणः ख्यातो भृगुः प्रसव कर्मवित् ॥ १२५ ॥ आग्नेयस्त्वंगिराः श्रीमान् कविर्ब्राह्मो महायशाः । भार्गवांगिरसौ लोके लोकसंतानलक्षणौ ॥ १२६ ॥ तदनन्तर तत्त्वज्ञानी ब्रह्माने कविको अपनी संतानके रूपमें ग्रहण किया। उस समय संतानके कर्तव्यको जाननेवाले महर्षि भृगु वारुण नामसे विख्यात हुए। तेजस्वी अंगिरा आग्नेय तथा महायशस्वी कवि ब्राह्म नामसे विख्यात हुए। भृगु और अंगिरा—ये दोनों लोकमें जगत्की सृष्टिका विस्तार करनेवाले बतलाये गये हैं ॥ १२५-१२६ ॥ एते हि प्रसवाः सर्वे प्रजानां पतयस्त्रयः । सर्वं संतानमेतेषामिदमित्युपधारय ॥ १२७ ॥ इस प्रकार ये तीन प्रजापति हैं और शेष सब लोग इनकी संतानें हैं। यह सारा जगत् इन्हींकी संतति हैं, इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो ॥ १२७ ॥