महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविप्रवर! तात! प्रभावशाली जलेश्वर वरुणरूप शिवने पहले कवि और भृगुको पुत्ररूपसे ग्रहण किया था, इसलिये वे वारुण कहलाये ॥ १३६ ॥ जग्राहांगिरसं देवः शिखी तस्माद्हुताशनः । तस्मादांगिरसा ज्ञेयाः सर्व एव तदन्वयाः ॥ १३७ ॥ ज्वालाओंसे सुशोभित होनेवाले अग्निदेवने वरुणरूप शिवसे अंगिराको पुत्ररूपमें प्राप्त किया; इसलिये अंगिराके वंशमें उत्पन्न हुए सभी पुत्र अग्निवंशी एवं वारुण नामसे भी जानने योग्य हैं ॥ १३७ ॥ ब्रह्मा पितामहः पूर्वं देवताभिः प्रसादितः । इमे नः संतरिष्यन्ति प्रजाभिर्जगतीश्वराः ॥ १३८ ॥ सर्वे प्रजानां पतयः सर्वे चातितपस्विनः । त्वत्प्रसादादिमं लोकं तारयिष्यन्ति साम्प्रतम् ॥ १३९ ॥ पूर्वकालमें देवताओंने पितामह ब्रह्माको प्रसन्न किया और कहा—'प्रभो! आप ऐसी कृपा कीजिये जिससे ये भृगु आदिके वंशज इस पृथ्वीका पालन करते हुए अपनी संतानोंद्वारा हमारा संकटसे उद्धार करें। ये सभी प्रजापति हों और सभी अत्यन्त तपस्वी हों। ये आपके कृपाप्रसादसे इस समय इस सम्पूर्ण लोकका संकटसे उद्धार करेंगे ॥ १३८-१३९ ॥ तथैव वंशकर्तारस्तव तेजोविवर्धनाः । भवेयुर्वेदविदुषः सर्वे च कृतिनस्तथा ॥ १४० ॥ 'आपकी दयासे ये सब लोग वंशप्रवर्तक, आपके तेजकी वृद्धि करनेवाले तथा वेदज्ञ पुण्यात्मा हों ॥ १४० ॥ देवपक्षचराः सौम्याः प्राजापत्या महर्षयः । आप्नुवन्ति तपश्चैव ब्रह्मचर्यं परं तथा ॥ १४१ ॥ 'इन सबका स्वभाव सौम्य हो। प्रजापतियोंके वंशमें उत्पन्न हुए ये महर्षिगण सदा देवताओंके पक्षमें रहें तथा तप और उत्तम ब्रह्मचर्यका बल प्राप्त करें ॥ १४१ ॥ सर्वे हि वयमेते च तवैव प्रसवः प्रभो । देवानां ब्राह्मणानां च त्वं हि कर्ता पितामह ॥ १४२ ॥ 'प्रभो! पितामह! ये सब और हमलोग आपकीही संतान हैं; क्योंकि देवताओं और ब्राह्मणोंकी सृष्टि करनेवाले आप ही हैं ॥ १४२ ॥ मारीचमादितः कृत्वा सर्वे चैवाथ भार्गवाः । अपत्यानीति सम्प्रेक्ष्य क्षमयाम पितामह ॥ १४३ ॥ 'पितामह! कश्यपसे लेकर समस्त भृगुवंशियोंतक हम सब लोग आपकीही संतान हैं—ऐसा सोचकर आपसे अपनी भूलोंके लिये क्षमा चाहते हैं ॥ १४३ ॥ ते त्वनेनैव रूपेण प्रजनिष्यन्ति वै प्रजाः ।