भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 753, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 753

स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा ॥ १४४ ॥
'वे प्रजापतिगण इसी रूपसे प्रजाओंको उत्पन्न करेंगे और सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर प्रलयपर्यन्त अपने-आपको मर्यादामें स्थापित किये रहेंगे' ॥ १४४ ॥
इत्युक्तः स तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
तथेत्येवाब्रवीत् प्रीतस्तेऽपि जग्मुर्यथागतम् ॥ १४५ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर लोकपितामह ब्रह्मा प्रसन्न होकर बोले—'तथास्तु (ऐसा ही हो)।' तत्पश्चात् देवता जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ १४५ ॥
एवमेतत् पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मनः ।
देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् ॥ १४६ ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें जब कि सृष्टिके प्रारम्भका समय था, वरुण-शरीर धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महात्मा रुद्रके यज्ञमें पूर्वोक्त वृत्तान्त घटित हुआ था ॥
अग्निर्ब्रह्मा पशुपतिः शर्वो रुद्रः प्रजापतिः ।
अग्नेरपत्यमेतद् वै सुवर्णमिति धारणा ॥ १४७ ॥
अग्नि ही ब्रह्मा, पशुपति, शर्व, रुद्र और प्रजापतिरूप हैं। यह सुवर्ण अग्निकी ही संतान है—ऐसी सबकी मान्यता है ॥ १४७ ॥
अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काञ्चनम् ।
जामदग्न्य प्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात् ॥ १४८ ॥
जमदग्निनन्दन परशुराम! वेद-प्रमाणका ज्ञाता पुरुष वैदिक श्रुतिके दृष्टान्तके अनुसार अग्निके अभावमें उसके स्थानपर सुवर्णका उपयोग करता है ॥ १४८ ॥
कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते ।
वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे ॥ १४९ ॥
शकटोर्व्यां परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा ।
हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्यते ॥ १५० ॥
कुशोंके समूहपर, उसपर रखे हुए सुवर्णपर, बाँबीके छिद्रमें, बकरेके दाहिने कानपर, जिस मार्गसे छकड़ा आता-जाता हो उस भूमिपर, दूसरेके जलाशयमें तथा ब्राह्मणके हाथपर वैदिक प्रमाण माननेवाले पुरुष अग्निस्वरूप मानकर होम आदि कर्म करते हैं और वह होमकार्य सम्पन्न होनेपर भगवान् अग्निदेव आनन्ददायिनी समृद्धिका अनुभव करते हैं ॥ १४९-१५० ॥
तस्मादग्निपराः सर्वे देवता इति शुश्रुम ।
ब्रह्मणो हि प्रभूतोऽग्निरग्नेरपि च काञ्चनम् ॥ १५१ ॥
अतः सब देवताओंमें अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। यह हमने सुना है। ब्रह्मासे अग्निकी उत्पत्ति भी है और अग्निसे सुवर्णकी ॥ १५१ ॥
तस्माद् ये वै प्रयच्छन्ति सुवर्णं धर्मदर्शिनः ।