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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

स्थापयिष्यन्ति चात्मानं युगादिनिधने तथा ॥ १४४ ॥
'वे प्रजापतिगण इसी रूपसे प्रजाओंको उत्पन्न करेंगे और सृष्टिके प्रारम्भसे लेकर प्रलयपर्यन्त अपने-आपको मर्यादामें स्थापित किये रहेंगे' ॥ १४४ ॥
इत्युक्तः स तदा तैस्तु ब्रह्मा लोकपितामहः ।
तथेत्येवाब्रवीत् प्रीतस्तेऽपि जग्मुर्यथागतम् ॥ १४५ ॥
देवताओंके ऐसा कहनेपर लोकपितामह ब्रह्मा प्रसन्न होकर बोले—'तथास्तु (ऐसा ही हो)।' तत्पश्चात् देवता जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये ॥ १४५ ॥
एवमेतत् पुरा वृत्तं तस्य यज्ञे महात्मनः ।
देवश्रेष्ठस्य लोकादौ वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् ॥ १४६ ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें जब कि सृष्टिके प्रारम्भका समय था, वरुण-शरीर धारण करनेवाले सुरश्रेष्ठ महात्मा रुद्रके यज्ञमें पूर्वोक्त वृत्तान्त घटित हुआ था ॥
अग्निर्ब्रह्मा पशुपतिः शर्वो रुद्रः प्रजापतिः ।
अग्नेरपत्यमेतद् वै सुवर्णमिति धारणा ॥ १४७ ॥
अग्नि ही ब्रह्मा, पशुपति, शर्व, रुद्र और प्रजापतिरूप हैं। यह सुवर्ण अग्निकी ही संतान है—ऐसी सबकी मान्यता है ॥ १४७ ॥
अग्न्यभावे च कुरुते वह्निस्थानेषु काञ्चनम् ।
जामदग्न्य प्रमाणज्ञो वेदश्रुतिनिदर्शनात् ॥ १४८ ॥
जमदग्निनन्दन परशुराम! वेद-प्रमाणका ज्ञाता पुरुष वैदिक श्रुतिके दृष्टान्तके अनुसार अग्निके अभावमें उसके स्थानपर सुवर्णका उपयोग करता है ॥ १४८ ॥
कुशस्तम्बे जुहोत्यग्निं सुवर्णे तत्र च स्थिते ।
वल्मीकस्य वपायां च कर्णे वाजस्य दक्षिणे ॥ १४९ ॥
शकटोर्व्यां परस्याप्सु ब्राह्मणस्य करे तथा ।
हुते प्रीतिकरीमृद्धिं भगवांस्तत्र मन्यते ॥ १५० ॥
कुशोंके समूहपर, उसपर रखे हुए सुवर्णपर, बाँबीके छिद्रमें, बकरेके दाहिने कानपर, जिस मार्गसे छकड़ा आता-जाता हो उस भूमिपर, दूसरेके जलाशयमें तथा ब्राह्मणके हाथपर वैदिक प्रमाण माननेवाले पुरुष अग्निस्वरूप मानकर होम आदि कर्म करते हैं और वह होमकार्य सम्पन्न होनेपर भगवान् अग्निदेव आनन्ददायिनी समृद्धिका अनुभव करते हैं ॥ १४९-१५० ॥
तस्मादग्निपराः सर्वे देवता इति शुश्रुम ।
ब्रह्मणो हि प्रभूतोऽग्निरग्नेरपि च काञ्चनम् ॥ १५१ ॥
अतः सब देवताओंमें अग्नि ही श्रेष्ठ हैं। यह हमने सुना है। ब्रह्मासे अग्निकी उत्पत्ति भी है और अग्निसे सुवर्णकी ॥ १५१ ॥
तस्माद् ये वै प्रयच्छन्ति सुवर्णं धर्मदर्शिनः ।

देवतास्ते प्रयच्छन्ति समस्ता इति नः श्रुतम् ॥ १५२ ॥
इसलिये जो धर्मदर्शी पुरुष सुवर्णका दान करते हैं; वे समस्त देवताओंका ही दान करते हैं, यह हमारे सुननेमें आया है ॥ १५२ ॥
तस्य चातमसो लोका गच्छतः परमां गतिम् ।
स्वर्लोके राजराज्येन सोऽभिषिच्येत भार्गव ॥ १५३ ॥
सुवर्णदाता परमगतिको प्राप्त होता है, उसे अन्धकाररहित ज्योतिर्मय लोक मिलते हैं। भृगुनन्दन! स्वर्गलोकमें उसका राजाधिराज (कुबेर) के पदपर अभिषेक किया जाता है ॥ १५३ ॥
आदित्योदयसम्प्राप्ते विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ।
ददाति काञ्चनं यो वै दुःस्वप्नं प्रतिहन्ति सः ॥ १५४ ॥
जो सूर्योदय-कालमें विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर सुवर्णका दान करता है, वह अपने पाप और दुःस्वप्नको नष्ट कर डालता है ॥ १५४ ॥
ददात्युदितमात्रे यस्तस्य पाप्मा विधूयते ।
मध्याह्ने ददतो रुक्मं हन्ति पापमनागतम् ॥ १५५ ॥
सूर्योदयके समय जो सुवर्णदान करता है, उसका सारा पाप धुल जाता है, तथा जो मध्याह्नकालमें सोना दान करता है, वह अपने भविष्य पापोंका नाश कर देता है ॥ १५५ ॥
ददाति पश्चिमां संध्यां यः सुवर्णं यतव्रतः ।
ब्रह्मवाय्वग्निसोमानां सालोक्यमुपयाति सः ॥ १५६ ॥
जो सायं संध्याके समय व्रतका पालन करते हुए सुवर्ण दान देता है, वह ब्रह्मा, वायु, अग्नि और चन्द्रमाके लोकोंमें जाता है ॥ १५६ ॥
सेन्द्रेषु चैव लोकेषु प्रतिष्ठां विन्दते शुभाम् ।
इह लोके यशः प्राप्य शान्तपाप्मा च मोदते ॥ १५७ ॥
इन्द्रसहित सभी लोकपालोंके लोकोंमें उसे शुभ सम्मान प्राप्त होता है। साथ ही वह इस लोकमें यशस्वी एवं पापरहित होकर आनन्द भोगता है ॥ १५७ ॥
ततः सम्पद्यतेऽन्येषु लोकेष्वप्रतिमः सदा ।
अनावृतगतिश्चैव कामचारो भवत्युत ॥ १५८ ॥
मृत्युके पश्चात् जब वह परलोकमें जाता है, तब वहाँ अनुपम पुण्यात्मा समझा जाता है। कहीं भी उसकी गतिका प्रतिरोध नहीं होता और वह इच्छानुसार जहाँ चाहता है, विचरता रहता है। ॥ १५८ ॥
न च क्षरति तेभ्यश्च यशश्चैवाप्नुते महत् ।
सुवर्णमक्षयं दत्त्वा लोकांश्चाप्नोति पुष्कलान् ॥ १५९ ॥
सुवर्ण अक्षय द्रव्य है, उसका दान करनेवाले मनुष्यको पुण्यलोकोंसे नीचे नहीं आना पड़ता। संसारमें उसे महान् यशकी प्राप्ति होती है तथा परलोकमें उसे अनेक समृद्धिशाली

पुण्यलोक प्राप्त होते हैं ॥ १५९ ॥
यस्तु संजनयित्वाग्निमादित्योदयनं प्रति ।
दद्याद् वै व्रतमुद्दिश्य सर्वकामान् समश्नुते ॥ १६० ॥
जो मनुष्य सूर्योदयके समय अग्नि प्रकट करके किसी व्रतके उद्देश्यसे सुवर्णदान करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६० ॥
अग्निरित्येव तत् प्राहुः प्रदानं च सुखावहम् ।
यथेष्टगुणसंवृत्तं प्रवर्तकमिति स्मृतम् ॥ १६१ ॥
सुवर्णको अग्निस্বরূপ ही कहते हैं। उसका दान सुख देनेवाला होता है। वह यथेष्ट पुण्यको उत्पन्न करने-वाला और दानेच्छाका प्रवर्तक माना गया है ॥ १६१ ॥
एषा सुवर्णस्योत्पत्तिः कथिता ते मयानघ ।
कार्तिकेयस्य च विभो तद् विद्धि भृगुनन्दन ॥ १६२ ॥
प्रभो! निष्पाप भृगुनन्दन! यह मैंने तुम्हें सुवर्ण और कार्तिकेयकी उत्पत्ति बतायी है। इसे अच्छी तरह समझ लो ॥ १६२ ॥
कार्तिकेयस्तु संवृद्धः कालेन महता तदा ।
देवैः सेनापतित्वेन वृतः सेन्द्रैर्भृगूहह ॥ १६३ ॥
भृगुश्रेष्ठ! कार्तिकेय जब दीर्घकालमें बड़े हुए तब इन्द्र आदि देवताओंने उनका अपने सेनापतिके पदपर वरण किया ॥ १६३ ॥
जघान तारकं चापि दैत्यमन्यांस्तथासुरान् ।
त्रिदशेन्द्राज्ञया ब्रह्मँल्लोकानां हितकाम्यया ॥ १६४ ॥
ब्रह्मन्! उन्होंने लोकोंके हितकी कामना एवं देवराज इन्द्रकी आज्ञासे प्रेरित हो तारकासुर तथा अन्य दैत्योंका संहार कर डाला ॥ १६४ ॥
सुवर्णदाने च मया कथितास्ते गुणा विभो ।
तस्मात् सुवर्णं विप्रेभ्यः प्रयच्छ ददतां वर ॥ १६५ ॥
प्रभो! दाताओंमें श्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णदानका माहात्म्य बताया है। इसलिये अब तुम ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान करो ॥ १६५ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स वसिष्ठेन जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
ददौ सुवर्णं विप्रेभ्यो व्यमुच्यत च किल्बिषात् ॥ १६६ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर प्रतापी परशुरामजीने ब्राह्मणोंको सुवर्णका दान किया। इससे वे सब पापोंसे छुटकारा पा गये ॥
एतत् ते सर्वमाख्यातं सुवर्णस्य महीपते ।
प्रदानस्य फलं चैव जन्म चास्य युधिष्ठिर ॥ १६७ ॥

राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें सुवर्णकी उत्पत्ति और उसके दानका फल यह सब कुछ बता दिया ॥ १६७ ॥

तस्मात् त्वमपि विप्रेभ्यः प्रयच्छ कनकं बहु ।
ददत्सुवर्णं नृपते किल्बिषाद् विप्रमोक्ष्यसि ॥ १६८ ॥

अतः नरेश्वर! अब तुम भी ब्राह्मणोंको बहुत-सा सुवर्ण दान करो। सुवर्ण दान करके तुम पापसे मुक्त हो जाओगे ॥ १६८ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सुवर्णोत्पत्तिर्नाम
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुवर्णकी उत्पत्तिविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥

युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! सुवर्णका विधिपूर्वक दान करनेसे जो वेदोक्त फल प्राप्त होते हैं, यहाँ उनका आपने विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

षडशीतितमोऽध्यायः

कार्तिकेयकी उत्पत्ति, पालन-पोषण और उनका देवसेनापति-पदपर अभिषेक, उनके द्वारा तारकासुरका वध

युधिष्ठिर उवाच

उक्ताः पितामहेनेह सुवर्णस्य विधानतः ।
विस्तरेण प्रदानस्य ये गुणाः श्रुतिलक्षणाः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! सुवर्णका विधिपूर्वक दान करनेसे जो वेदोक्त फल प्राप्त होते हैं, यहाँ उनका आपने विस्तारपूर्वक वर्णन किया ॥ १ ॥

यत्तु कारणमुत्पत्तेः सुवर्णस्य प्रकीर्तितम् ।
स कथं तारकः प्राप्तो निधनं तद् ब्रवीहि मे ॥ २ ॥
सुवर्णकी उत्पत्तिका जो कारण है, वह भी आपने बताया। अब मुझे यह बताइये कि वह तारकासुर कैसे मारा गया? ॥ २ ॥

उक्तं स देवतानां हि अवध्य इति पार्थिव ।
कथं तस्याभवन्मृत्युर्विस्तरेण प्रकीर्तय ॥ ३ ॥
पृथ्वीनाथ! आपने पहले कहा है कि वह देवताओंके लिये अवध्य था, फिर उसकी मृत्यु कैसे हुई? यह विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ३ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं त्वत्तः कुरुकुलोद्वह ।
कात्स्न्र्येन तारकवधं परं कौतूहलं हि मे ॥ ४ ॥
कुरुकुलका भार वहन करनेवाले पितामह! मैं आपके मुखसे यह तारक-वधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल है ॥

भीष्म उवाच

विपन्नकृत्या राजेन्द्र देवता ऋषयस्तथा ।
कृत्तिकाश्चोदयामासुरपत्यभरणाय वै ॥ ५ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजेन्द्र! जब गंगाजीने अग्नि-द्वारा स्थापित किये हुए उस गर्भको त्याग दिया, तब देवताओं और ऋषियोंका बना-बनाया काम बिगड़तेकी स्थितिमें आ गया। उस दशामें उन्होंने उस गर्भके भरण-पोषणके लिये छहों कृत्तिकाओंको प्रेरित किया ॥ ५ ॥

न देवतानां काचिद्धि समर्था जातवेदसः ।

एता हि शक्तास्तं गर्भं संधारयितुमोजसा ॥ ६ ॥ कारण यह था कि देवांगनाओंमें दूसरी कोई स्त्री अग्नि एवं रुद्रके उस तेजका भरण-पोषण करनेमें समर्थ नहीं थी और ये कृत्तिकाएँ अपनी शक्तिसे उस गर्भको भलीभाँति धारण-पोषण कर सकती थीं ॥ ६ ॥

षण्णां तासां ततः प्रीतः पावको गर्भधारणात् । स्वेन तेजोविसर्गेण वीर्येण परमेण च ॥ ७ ॥ अपने तेजके स्थापन और उत्तम वीर्यके ग्रहणद्वारा गर्भ धारण करनेके कारण अग्निदेव उन छहों कृत्तिकाओंपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ७ ॥

तास्तु षट् कृत्तिका गर्भं पुपुषुर्जातवेदसः । प्रट्सु वर्त्मसु तेजोऽग्नेः सकलं निहितं प्रभो ॥ ८ ॥ प्रभो! उन छहों कृत्तिकाओंने अग्निके उस गर्भका पोषण किया। अग्निका वह सारा तेज छः मार्गोंसे उनके भीतर स्थापित हो चुका था ॥ ८ ॥

ततस्ता वर्धमानस्य कुमारस्य महात्मनः । तेजसाभिपरीताङ्ग्यो न क्वचिच्छर्म लेभिरे ॥ ९ ॥ गर्भमें जब वह महामना कुमार बढ़ने लगा, तब उसके तेजसे उनका सारा अंग व्याप्त होनेके कारण वे कृत्तिकाएँ कहीं चैन नहीं पाती थीं ॥ ९ ॥

ततस्तेजःपरीताङ्ग्यः सर्वाः काल उपस्थिते । समं गर्भं सुषुविरे कृत्तिकास्तं नरर्षभ ॥ १० ॥ नरश्रेष्ठ! तदनन्तर तेजसे व्याप्त अंगवाली उन समस्त कृत्तिकाओंने प्रसवकाल उपस्थित होनेपर एक साथ ही उस गर्भको उत्पन्न किया ॥ १० ॥

ततस्तं षडधिष्ठानं गर्भमेकत्वमागतम् । पृथिवी प्रतिजग्राह कार्त्तस्वरसमीपतः ॥ ११ ॥ छः अधिष्ठानोंमें पला हुआ वह गर्भ जब उत्पन्न होकर एकत्वको प्राप्त हो गया, तब सुवर्णके समीप स्थित हुए उस बालकको पृथ्वीने ग्रहण किया ॥ ११ ॥

स गर्भो दिव्यसंस्थानो दीप्तिमान् पावकप्रभः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधे प्रियदर्शनः ॥ १२ ॥ वह कान्तिमान् शिशु अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसके शरीरकी आकृति दिव्य थी। वह देखनेमें बहुत ही प्रिय जान पड़ता था। वह दिव्य सरकंडेके वनमें जन्म ग्रहण करके दिनोंदिन बढ़ने लगा ॥ १२ ॥

ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालमर्कसमद्युतिम् । जातस्नेहाच्च सौहार्दात् पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥ १३ ॥ कृत्तिकाओंने देखा वह बालक अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है। इससे उनके हृदयमें स्नेह उमड़ आया और वे सौहार्दवश अपने स्तनोंका दूध पिलाकर

उसका पोषण करने लगीं ॥ १३ ॥ अभवत् कार्तिकेयः स त्रैलोक्ये सचराचरे । स्कन्नत्वात् स्कन्दतां प्राप्तो गुहावासाद् गुहोऽभवत् ॥ १४ ॥ इसीसे चराचर प्राणियोंसहित त्रिलोकीमें वह कार्तिकेयके नामसे प्रसिद्ध हुआ। स्कन्दन (स्खलन) के कारण वह 'स्कन्द' कहलाया और गुहामें वास करनेसे 'गुह' नामसे विख्यात हुआ ॥ १४ ॥ ततो देवास्त्रयस्त्रिंशद् दिशश्च सदिगीश्वराः । रुद्रो धाता च विष्णुश्च यमः पूषार्यमा भगः ॥ १५ ॥ अंशो मित्रश्च साध्याश्च वासवो वसवोऽश्विनौ । आपो वायुर्नभश्चन्द्रो नक्षत्राणि ग्रहा रविः ॥ १६ ॥ पृथग्भूतानि चान्यानि यानि देवार्पणानि वै । आजग्मुस्तेऽद्भुतं द्रष्टुं कुमारं ज्वलनात्मजम् ॥ १७ ॥ तदनन्तर तैंतीस देवता, दसों दिशाएँ, दिक्पाल, रुद्र, धाता, विष्णु, यम, पूषा, अर्यमा, भग, अंश, मित्र, साध्य, वसु, वासव (इन्द्र), अश्विनीकुमार, जल (वरुण), वायु, आकाश, चन्द्रमा, नक्षत्र, ग्रहगण, रवि तथा दूसरे-दूसरे विभिन्न प्राणी जो देवताओंके आश्रित थे, सब-के-सब उस अद्भुत अग्निपुत्र 'कुमार' को देखनेके लिये वहाँ आये ॥ ऋषयस्तुष्टुवुश्चैव गन्धर्वाश्च जगुस्तथा । षडाननं कुमारं तु द्विषडक्षं द्विजप्रियम् ॥ १८ ॥ पीनांसं द्वादशभुजं पावकादित्यवर्चसम् । शयानं शरगुल्मस्थं दृष्ट्वा देवाः सहर्षिभिः ॥ १९ ॥ लेभिरे परमं हर्षं मेनिरे चासुरं हतम् । ततो देवाः प्रियाण्यस्य सर्व एव समाहरन् ॥ २० ॥ ऋषियोंने स्तुति की और गन्धर्वोंने उनका यश गाया। ब्राह्मणोंके प्रेमी उस कुमारके छः मुख, बारह नेत्र, बारह भुजाएँ, मोटे कंधे और अग्नि तथा सूर्यके समान कान्ति थी। वे सरकण्डोंके झुरमुटमें सो रहे थे। उन्हें देखकर ऋषियोंसहित देवताओंको बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ और यह विश्वास हो गया कि अब तारकासुर मारा जायगा। तदनन्तर सब देवता उन्हें उनकी प्रिय वस्तुएँ भेंट करने लगे ॥ १८-२० ॥ क्रीडतः क्रीडनीयानि ददुः पक्षिगणाश्च ह । सुपर्णोऽस्य ददौ पुत्रं मयूरं चित्रबर्हिणम् ॥ २१ ॥ पक्षियोंने खेल-कूदमें लगे हुए कुमारको खिलौने दिये, गरुड़ने विचित्र पंखोंसे सुशोभित अपना पुत्र मयूर भेंट किया ॥ २१ ॥ राक्षसाश्च ददुस्तस्मै वराहमहिषावुभौ । कुक्कुटं चाग्निसंकाशं प्रददावरुणः स्वयम् ॥ २२ ॥

राक्षसोंने सूअर और भैंसा—ये दो पशु उन्हें उपहाररूपमें दिये। गरुड़के भाई अरुणने अग्निके समान लाल वर्णवाला एक मुर्गा भेंट किया ॥ २२ ॥ चन्द्रमाः प्रददौ मेषमादित्यो रुचिरां प्रभाम् । गवां माता च गा देवी ददौ शतसहस्रशः ॥ २३ ॥ चन्द्रमाने भेंड़ा दिया, सूर्यने मनोहर कान्ति प्रदान की, गोमाता सुरभि देवीने एक लाख गौएँ प्रदान कीं ॥ छागमग्निर्गुणोपेतमिला पुष्पफलं बहु । सुधन्वा शकटं चैव रथं चामितकूबरम् ॥ २४ ॥ अग्निने गुणवान् बकरा, इलाने बहुतसे फल-फूल, सुधन्वाने छकड़ा और विशाल कूबरसे युक्त रथ दिये ॥ वरुणो वारुणान् दिव्यान् सगजान् प्रददौ शुभान् । सिंहान् सुरेन्द्रो व्याघ्रांश्च द्विपानन्यांश्च पक्षिणः ॥ २५ ॥ श्वापदांश्च बहून् घोरांश्छत्राणि विविधानि च । वरुणने वरुणलोकके अनेक सुन्दर एवं दिव्य हाथी दिये। देवराज इन्द्रने सिंह, व्याघ्र, हाथी, अन्यान्य पक्षी, बहुत-से भयानक हिंसक जीव तथा नाना प्रकारके छत्र भेंट किये ॥ २५ १/२ ॥ राक्षसासुरसंघाश्च अनुजग्मुस्तमीश्वरम् ॥ २६ ॥ वर्धमानं तु तं दृष्ट्वा प्रार्थयामास तारकः । उपायैर्बहुभिर्हन्तुं नाशकच्चापि तं विभुम् ॥ २७ ॥ राक्षसों और असुरोंका समुदाय उन शक्तिशाली कुमारके अनुगामी हो गये। उन्हें बढ़ते देख तारकासुरने युद्धके लिये ललकारा; परंतु अनेक उपाय करके भी वह उन प्रभावशाली कुमारको मारनेमें सफल न हो सका ॥ २६-२७ ॥ सैनापत्येन तं देवाः पूजयित्वा गुहालयम् । शशंसुर्विप्रकारं तं तस्मै तारककारितम् ॥ २८ ॥ देवताओंने गुहावासी कुमारकी पूजा करके उनका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया और तारकासुरने देवताओंपर जो अत्याचार किया था, सो कह सुनाया ॥ स विवृद्धो महावीर्यो देवसेनापतिः प्रभुः । जघानामोघया शक्त्या दानवं तारकं गुहः ॥ २९ ॥ महापराक्रमी देवसेनापति प्रभु गुहने वृद्धिको प्राप्त होकर अपनी अमोघ शक्तिसे तारकासुरका वध कर डाला ॥ २९ ॥ तेन तस्मिन् कुमारेण क्रीडता निहतेऽसुरे । सुरेन्द्रः स्थापितो राज्ये देवानां पुनरीश्वरः ॥ ३० ॥

खेल-खेलमें ही उन अग्निकुमारके द्वारा जब तारकासुर मार डाला गया, तब ऐश्वर्यशाली देवेन्द्र पुनः देवताओंके राज्यपर प्रतिष्ठित किये गये ॥ ३० ॥

स सेनापतिरेवाथ बभौ स्कन्दः प्रतापवान् ।
ईशो गोप्ता च देवानां प्रियकृच्छङ्करस्य च ॥ ३१ ॥
प्रतापी स्कन्द सेनापतिके ही पदपर रहकर बड़ी शोभा पाने लगे। वे देवताओंके ईश्वर तथा संरक्षक थे और भगवान् शंकरका सदा ही हित किया करते थे ॥ ३१ ॥

हिरण्यमूर्तिर्भगवान्नेष एव च पावकिः ।
सदा कुमारो देवानां सैनापत्यमवाप्तवान् ॥ ३२ ॥
ये अग्निपुत्र भगवान् स्कन्द सुवर्णमय विग्रह धारण करते हैं। वे नित्य कुमारावस्थामें ही रहकर देवताओंके सेनापतिपदपर प्रतिष्ठित हुए हैं ॥ ३२ ॥

तस्मात् सुवर्णं मंगल्यं रत्नमक्षय्यमुत्तमम् ।
सहजं कार्तिकेयस्य वह्नेस्तेजः परं मतम् ॥ ३३ ॥
सुवर्ण कार्तिकेयजीके साथ ही उत्पन्न हुआ है और अग्निका उत्कृष्ट तेज माना गया है। इसलिये वह मंगलमय, अक्षय एवं उत्तम रत्न है ॥ ३३ ॥

एवं रामाय कौरव्य वसिष्ठोऽकथयत् पुरा ।
तस्मात् सुवर्णदानाय प्रयतस्व नराधिप ॥ ३४ ॥
कुरुनन्दन! नरेश्वर! इस प्रकार पूर्वकालमें वसिष्ठजीने परशुरामको यह सारा प्रसंग एवं सुवर्णकी उत्पत्ति और माहात्म्य सुनाया था। अतः तुम स्वर्णदानके लिये प्रयत्न करो ॥ ३४ ॥

रामः सुवर्णं दत्त्वा हि विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः ।
त्रिविष्टपे महत् स्थानमवापासुलभं नरैः ॥ ३५ ॥
परशुरामजी सुवर्णका दान करके सब पापोंसे मुक्त हो गये और स्वर्गमें उस महान् स्थानको प्राप्त हुए जो दूसरे मनुष्योंके लिये सर्वथा दुर्लभ है ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि तारकवधोपाख्यानं नाम षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें तारकवधका उपाख्यान नामक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्ताशीतितमोऽध्यायः

विविध तिथियोंमें श्राद्ध करनेका फल

युधिष्ठिर उवाच

चातुर्वर्ण्यस्य धर्मात्मन् धर्माः प्रोक्ता यथा त्वया ।
तथैव मे श्राद्धविधिं कृत्स्नं प्रब्रूहि पार्थिव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा— धर्मात्मन्! पृथ्वीनाथ! आपने जैसे चारों वर्णोंके धर्म बताये हैं, उसी प्रकार अब मेरे लिये श्राद्ध-विधिका वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

युधिष्ठिरेणैवमुक्तो भीष्मः शान्तनवस्तदा ।
इमं श्राद्धविधिं कृत्स्नं वक्तुं समुपचक्रमे ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— (जनमेजय!) राजा युधिष्ठिरके इस प्रकार अनुरोध करनेपर उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मने इस सम्पूर्ण श्राद्धविधिका इस प्रकार वर्णन आरम्भ किया ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

शृणुष्वावहितो राजन् श्राद्धकर्मविधिं शुभम् ।
धन्यं यशस्यं पुत्र्यं पितृयज्ञं परंतप ॥ ३ ॥
भीष्मजी बोले— शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! तुम श्राद्ध-कर्मके शुभ विधिको सावधान, होकर सुनो। यह धन, यश और पुत्रकी प्राप्ति करानेवाला है। इसे पितृयज्ञ कहते हैं ॥ ३ ॥

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
पिशाचकिन्नराणां च पूज्या वै पितरः सदा ॥ ४ ॥
देवता, असुर, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, पिशाच और किन्नर—इन सबके लिये पितर सदा ही पूज्य हैं ॥ ४ ॥

पितॄन् पूज्यादितः पश्चाद्देवतास्तर्पयन्ति वै ।
तस्मात् तान् सर्वयज्ञेन पुरुषः पूजयेत् सदा ॥ ५ ॥
मनीषी पुरुष पहले पितरोंकी पूजा करके पीछे देवताओंकी पूजा करते हैं। इसलिये पुरुषको चाहिये कि वह सदा सम्पूर्ण यज्ञोंके द्वारा पितरोंकी पूजा करे ॥ ५ ॥

अन्वाहार्यं महाराज पितॄणां श्राद्धमुच्यते ।
तस्माद् विशेषविधिना विधिः प्रथमकल्पितः ॥ ६ ॥

महाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं। अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ।। ६ ।। सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः । प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यातिथ्यगुणागुणान् ।। ७ ।। सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं। अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ।। ७ ।। येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत् फलं प्राप्यतेऽनघ । तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात् सुगृहे स्त्रियः । अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ।। ९ ।। प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ।। स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः । चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ।। १० ।। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है। तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत-से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ।। १० ।। पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप । कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ।। ११ ।। नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं। षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं ।। ११ ।। कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप । अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ।। १२ ।। राजन्! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है ।। १२ ।। नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु । विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धान् विकुर्वतः ।। १३ ।। नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ।। कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ।। १४ ।।

महाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने-चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है। उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ॥ १४ ॥ द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते । रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥ १५ ॥ द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत-से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ॥ १५ ॥ ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वन् श्राद्धं त्रयोदशीम् । अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ १६ ॥ युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं चतुर्दशीम् । अमावास्यां तु निर्वापात् सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥ त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुटुम्बी-जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है (इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये)। अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥ कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ १८ ॥ कृष्ण-पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ॥ १८ ॥ यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद् विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ १९ ॥ जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर (कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ॥ १९ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

किंस्विद् दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षयमीश्वर । किं हविश्चिररात्राय किमानन्त्याय कल्पते ॥ १ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदुः । तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैव युधिष्ठिर ॥ २ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध-कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥

तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलैस्तथा । दत्तेन मासं प्रीयन्ते श्राद्धेन पितरो नृप ॥ ३ ॥ नरेश्वर! तिल, व्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है ॥ ३ ॥

वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत् । सर्वेष्वेव तु भोज्येषु तिलाः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ ४ ॥ मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य-पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया है ॥ ४ ॥

गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते । यथा गव्यं तथा युक्तं पायसं सर्पिषा सह ॥ ५ ॥ यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है। गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥

गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति पितृगीता युधिष्ठिर । सनत्कुमारो भगवान् पुरा मय्यभ्यभाषत ॥ ६ ॥

युधिष्ठिर! इस विषयमें पितरोंद्वारा गायी हुई गाथाका भी विज्ञ पुरुष गान करते हैं। पूर्वकालमें भगवान् सनत्कुमारने मुझे यह गाथा बतायी थी ।। ६ ।।

अपि नः स्वकुले जायाद् यो नो दद्यात्त्रयोदशीम् ।
मवासु सर्पिःसंयुक्तं पायसं दक्षिणायने ।। ७ ।।
पितर कहते हैं—'क्या हमारे कुलमें कोई ऐसा पुरुष उत्पन्न होगा, जो दक्षिणायनमें आश्विन मासके कृष्णपक्षमें मघा और त्रयोदशी तिथिका योग होनेपर हमारे लिये घृतमिश्रित खीरका दान करेगा? ।। ७ ।।

आजेन वापि लौहेन मघास्वेव यतव्रतः ।
हस्तिच्छायासु विधिवत् कर्णव्यजनवीजितम् ।। ८ ।।
'अथवा वह नियमपूर्वक व्रतका पालन करके मघा नक्षत्रमें ही हाथीके शरीरकी छायामें बैठकर उसके कानरूपी व्यजनसे हवा लेता हुआ अन्न-विशेष-चावलका बना हुआ पायस या लौहशाकसे विधिपूर्वक हमारा श्राद्ध करेगा? ।। ८ ।।

एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यत्रासौ प्रथितो लोकेष्वक्षय्यकरणो वटः ।। ९ ।।
'बहुत-से पुत्र पानेकी अभिलाषा रखनी चाहिये, उनमेंसे यदि एक भी उस गया-तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात अक्षयवट विद्यमान है, जो श्राद्धके फलको अक्षय बनानेवाला है ।। ९ ।।

आपो मूलं फलं मांसमन्नं वापि पितृक्षये ।
यत् किंचिन्मधुसम्मिश्रं तदानन्त्याय कल्पते ।। १० ।।
'पितरोंकी क्षय-तिथिको जल, मूल, फल, उसका गूदा और अन्न आदि जो कुछ भी मधुमिश्रित करके दिया जाता है, वह उन्हें अनन्तकालतक तृप्ति देनेवाला है' ।। १० ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पेऽष्टाशीतितमोऽध्यायः ।। ८८ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८८ ।।

भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ १ ॥

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एकोननवतितमोऽध्यायः

विभिन्न नक्षत्रोंमें श्राद्ध करनेका फल

भीष्म उवाच

यमस्तु यानि श्राद्धानि प्रोवाच शशबिन्दवे ।
तानि मे शृणु काम्यानि नक्षत्रेषु पृथक् पृथक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! यमने राजा शशबिन्दुको भिन्न-भिन्न नक्षत्रोंमें किये जानेवाले जो काम्य श्राद्ध बताये हैं; उनका वर्णन मुझसे सुनो ॥ १ ॥

श्राद्धं यः कृत्तिकायोगे कुर्वीत सततं नरः ।
अग्नीनाधाय सापत्यो यजेत विगतज्वरः ॥ २ ॥
जो मनुष्य सदा कृत्तिका नक्षत्रके योगमें अग्निकी स्थापना करके पुत्रसहित श्राद्ध या पितरोंका यजन करता है, वह रोग और चिन्तासे रहित हो जाता है ॥ २ ॥

अपत्यकामो रोहिण्यां तेजस्कामो मृगोत्तमे ।
क्रूरकर्मा ददच्छ्राद्धमार्द्रायां मानवो भवेत् ॥ ३ ॥
संतानकी इच्छावाला पुरुष रोहिणीमें और तेजकी कामनावाला पुरुष मृगशिरा नक्षत्रमें श्राद्ध करे। आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मनुष्य क्रूरकर्मा होता है (इसलिये आर्द्रा नक्षत्रमें श्राद्ध नहीं करना चाहिये) ॥ ३ ॥

धनकामो भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं पुनर्वसौ ।
पुष्टिकामोऽथ पुष्येण श्राद्धमीहेत मानवः ॥ ४ ॥
धनकी इच्छावाले पुरुषको पुनर्वसु नक्षत्रमें श्राद्ध करना चाहिये। पुष्टिकी कामनावाला पुरुष पुष्यनक्षत्रमें श्राद्ध करे ॥ ४ ॥

आश्लेषायां ददच्छ्राद्धं धीरान् पुत्रान् प्रजायते ।
ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठो मघासु श्राद्धमावपन् ॥ ५ ॥
आश्लेषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष धीर पुत्रोंको जन्म देता है। मघामें श्राद्ध एवं पिण्डदान करनेवाला मनुष्य अपने कुटुम्बी जनोंमें श्रेष्ठ होता है ॥ ५ ॥

फल्गुनीषु ददच्छ्राद्धं सुभगः श्राद्धदो भवेत् ।
अपत्यभागुत्तरासु हस्तेन फलभाग् भवेत् ॥ ६ ॥
पूर्वाफाल्गुनीमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव सौभाग्यशाली होता है। उत्तराफाल्गुनीमें श्राद्ध करनेवाला संतानवान् और हस्तनक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला अभीष्ट फलका भागी होता है ॥ ६ ॥

चित्रायां तु ददच्छ्राद्धं लभेद रूपवतः सुतान् ।
स्वातियोगे पितॄनर्च्य वाणिज्यमुपजीवति ॥ ७ ॥

चित्रामें श्राद्धका दान करनेवाले पुरुषको रूपवान् पुत्र प्राप्त होते हैं। स्वातीके योगमें पितरोंकी पूजा करनेवाला वाणिज्यसे जीवन-निर्वाह करता है ॥ ७ ॥ बहुपुत्रो विशाखासु पुत्रमीहन् भवेन्नरः ।
अनुराधासु कुर्वाणो राजचक्रं प्रवर्तयेत् ॥ ८ ॥
विशाखामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य यदि पुत्र चाहता हो तो बहुसंख्यक पुत्रोंसे सम्पन्न होता है। अनुराधामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष दूसरे जन्ममें राजमण्डलका शासक होता है ॥ ८ ॥
आधिपत्यं व्रजेन्मर्त्यो ज्येष्ठायामपवर्जयन् ।
नरः कुरुकुलश्रेष्ठ ऋद्धो दमपुरःसरः ॥ ९ ॥
कुरुकुलश्रेष्ठ! ज्येष्ठा नक्षत्रमें इन्द्रियसंयमपूर्वक पिण्डदान करनेवाला मनुष्य समृद्धिशाली होता है और प्रभुत्व प्राप्त करता है ॥ ९ ॥
मूले त्वारोग्यमृच्छेत यशोऽऽषाढासु चोत्तमम् ।
उत्तरासु त्वषाढासु वीतशोकश्चरेन्महीम् ॥ १० ॥
मूलमें श्राद्ध करनेसे आरोग्यकी प्राप्ति होती है और पूर्वाषाढ़ामें उत्तम यशकी। उत्तराषाढ़ामें पितृयज्ञ करनेवाला पुरुष शोकशन्य होकर पृथ्वीपर विचरण करता है ॥ १० ॥
श्राद्धं त्वभिजिता कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ।
श्रवणेषु ददच्छ्राद्धं प्रेत्य गच्छेत् स सद्गतिम् ॥ ११ ॥
अभिजित् नक्षत्रमें श्राद्ध करनेवाला वैद्यविषयक सिद्धि पाता है। श्रवण नक्षत्रमें श्राद्धका दान देनेवाला मानव मृत्युके पश्चात् सद्गतिको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥
राज्यभागी धनिष्ठायां भवेत् नियतं नरः ।
नक्षत्रे वारुणे कुर्वन् भिषक्सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ १२ ॥
धनिष्ठामें श्राद्ध करनेवाला मनुष्य नियमपूर्वक राज्यका भागी होता है। वारुण नक्षत्र-शतभिषामें श्राद्ध करनेवाला पुरुष वैद्यविषयक सिद्धिको पाता है ॥ १२ ॥
पूर्वप्रोष्ठपदाः कुर्वन् बहून् विन्दत्यजाविकान् ।
उत्तरासु प्रकुर्वाणो विन्दते गाः सहस्रशः ॥ १३ ॥
पूर्वभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला बहुत-से भेड़-बकरोंका लाभ लेता है और उत्तराभाद्रपदामें श्राद्ध करनेवाला सहस्रों गौएँ पाता है ॥ १३ ॥
बहुकुप्यकृतं वित्तं विन्दते रेवतीं श्रितः ।
अश्विनीष्वश्वान् विन्देत भरणीष्वायुरुत्तमम् ॥ १४ ॥
श्राद्धमें रेवतीका आश्रय लेनेवाला (अर्थात् रेवतीमें श्राद्ध करनेवाला) पुरुष सोने-चाँदीके सिवा अन्य नाना प्रकारके धन पाता है। अश्विनीमें श्राद्ध करनेसे घोड़ोंकी और भरणीमें श्राद्धका अनुष्ठान करनेसे उत्तम आयुकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥

इमं श्राद्धविधिं श्रुत्वा शशबिन्दुस्तथाकरोत् । अक्लेशेनाजयच्चापि महीं सोऽनुशशास ह ॥ १५ ॥

इस श्राद्धविधिको श्रवण करके राजा शशबिन्दुने वही किया। उन्होंने बिना किसी क्लेशके ही पृथ्वीको जीता और उसका शासनसूत्र अपने हाथमें ले लिया ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे एकोननवतितमोऽध्यायः ॥ ८९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक नवासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८९ ॥

श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भो

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नवतितमोऽध्यायः

श्राद्धमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा, पंक्तिदूषक और पंक्तिपावन ब्राह्मणोंका वर्णन, श्राद्धमें लाख मूर्ख ब्राह्मणोंको भोजन करानेकी अपेक्षा एक वेदवेत्ताको भोजन करानेकी श्रेष्ठताका कथन

युधिष्ठिर उवाच

कीदृशेभ्यः प्रदातव्यं भवेच्छ्राद्धं पितामह ।
द्विजेभ्यः कुरुशार्दूल तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! कैसे ब्राह्मणको श्राद्धका दान (अर्थात् निमन्त्रण) देना चाहिये? कुरुश्रेष्ठ! आप इसका मेरे लिये स्पष्ट वर्णन करें ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मणान् न परीक्षेत क्षत्रियो दानधर्मवित् ।
दैवे कर्मणि पित्र्ये तु न्यायमाहुः परीक्षणम् ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**राजन्! दान-धर्मके ज्ञाता क्षत्रियको देवसम्बन्धी कर्म (यज्ञ-यागादि) में ब्राह्मणकी परीक्षा नहीं करनी चाहिये, किंतु पितृकर्म (श्राद्ध) में उनकी परीक्षा न्यायसंगत मानी गयी है ॥ २ ॥

देवताः पूजयन्तीह दैवेनैवेह तेजसा ।
उपेत्य तस्माद् देवेभ्यः सर्वेभ्यो दापयेन्नरः ॥ ३ ॥
देवता अपने दैव तेजसे ही इस जगत्‌में ब्राह्मणोंका पूजन (समादर) करते हैं; अतः देवताओंके उद्देश्यसे सभी ब्राह्मणोंके पास जाकर उन्हें दान देना चाहिये ॥ ३ ॥

श्राद्धे त्वथ महाराज परीक्षेद ब्राह्मणान् बुधः ।
कुलशीलवयोरूपैर्विद्ययाभिजनेन च ॥ ४ ॥
किंतु महाराज! श्राद्धके समय विद्वान् पुरुष कुल, शील (उत्तम आचरण), अवस्था, रूप, विद्या और पूर्वजोंके निवासस्थान आदिके द्वारा ब्राह्मणकी अवश्य परीक्षा करे ॥ ४ ॥

तेषामन्ये पंक्तिदूषास्तथान्ये पंक्तिपावनाः ।
अपांक्तेयास्तु ये राजन् कीर्तयिष्यामि तान् शृणु ॥ ५ ॥
ब्राह्मणोंमें कुछ तो पंक्तिदूषक होते हैं और कुछ पंक्तिपावन। राजन्! पहले पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका वर्णन करूँगा, सुनो ॥ ५ ॥

कितवो भ्रूणहा यक्ष्मी पशुपालो निराकृतिः ।

ग्रामप्रेष्यो वार्धुषिको गायनः सर्वविक्रयी ॥ ६ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।
सामुद्रिको राजभृत्यस्तैलिकः कूटकारकः ॥ ७ ॥
पित्रा विवदमानश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ।
अभिशस्तस्तथा स्तेनः शिल्पं यश्चोपजीवति ॥ ८ ॥
पर्वकारश्च सूची च मित्रध्रुक् पारदारिकः ।
अव्रतानामुपाध्यायः काण्डपृष्ठस्तथैव च ॥ ९ ॥
श्वभिश्च यः परिक्रामेद् यः शुना दष्ट एव च ।
परिवित्तिश्च यश्च स्याद् दुश्चर्मा गुरुतल्पगः ॥ १० ॥
कुशीलवो देवलको नक्षत्रैश्चैव जीवति ।
ईदृशैर्ब्राह्मणैर्भुक्तमपांक्तेयैर्युधिष्ठिर ॥ ११ ॥
रक्षांसि गच्छते हव्यमित्याहुर्ब्रह्मवादिनः ।

जुआरी, गर्भहत्यारा, राजयक्ष्माका रोगी, पशुपालन करनेवाला, अपढ़, गाँवभरका हरकारा, सूदखोर, गवैया, सब तरहकी चीज बेचनेवाला, दूसरोंका घर फूँकनेवाला, विष देनेवाला, माताद्वारा पतिके जीते-जी दूसरे पतिसे उत्पन्न किये हुए पुत्रके घर भोजन करनेवाला, सोमरस बेचनेवाला, सामुद्रिक विद्या (हस्तरेखा) से जीविका चलानेवाला, राजाका नौकर, तेल बेचनेवाला, झूठी गवाही देनेवाला, पितासे झगड़ा करनेवाला, जिसके घरमें जार पुरुषका प्रवेश हो वह, कलंकित, चोर, शिल्पजीवी, बहुरूपिया, चुगलखोर, मित्रद्रोही, परस्त्रीलम्पट, व्रतरहित, मनुष्योंका अध्यापक, हथियार बनाकर जीविका चलानेवाला, कुत्ते साथ लेकर घूमनेवाला, जिसे कुत्तेने काटा हो वह, जिसके छोटे भाईका विवाह हो गया हो ऐसा अविवाहित बड़ा भाई, चर्मरोगी, गुरुपत्नीगामी, नटका काम करनेवाला, देवमन्दिरमें पूजासे जीविका चलानेवाला और नक्षत्रोंका फल बताकर जीनेवाला—ये सभी ब्राह्मण पंक्तिसे बाहर रखने योग्य हैं! युधिष्ठिर! ऐसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंका खाया हुआ हविष्य राक्षसोंको मिलता है, ऐसा ब्रह्मवादी पुरुषोंका कथन है ॥ ६—११ १/२ ॥

श्राद्धं भुक्त्वा त्वधीयीत वृषलीतल्पगश्च यः ॥ १२ ॥
पुरीषे तस्य ते मासं पितरस्तस्य शेरते ।

जो ब्राह्मण श्राद्धका भोजन करके फिर उस दिन वेद पढ़ता है तथा जो वृषली स्त्रीसे समागम करता है, उसके पितर उस दिनसे लेकर एक मासतक उसीकी विष्ठामें शयन करते हैं ॥ १२ १/२ ॥

सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ॥ १३ ॥
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं च वार्धुषे ।
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद् भवेत् ॥ १४ ॥

सोमरस बेचनेवालेको जो श्राद्धका अन्न दिया जाता है, वह पितरोंके लिये विष्ठाके तुल्य है। श्राद्धमें वैद्यको जिमाया हुआ अन्न पीब और रक्तके समान पितरोंको अग्राह्य हो जाता है। देवमन्दिरमें पूजा करके जीविका चलानेवालेको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट हो जाता है—उसका कोई फल नहीं मिलता। सूदखोरको दिया हुआ अन्न अस्थिर होता है। वाणिज्यवृत्ति करनेवालेको श्राद्धमें दिये हुए अन्नका दान न इहलोकमें लाभदायक होता है और न परलोकमें ।। १३-१४ ।।

भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ।
ये तु धर्मव्यपेतेषु चारित्रापगतेषु च ।
हव्यं कव्यं प्रयच्छन्ति तेषां तत् प्रेत्य नश्यति ।। १५ ।।
एक पतिको छोड़कर दूसरा पति करनेवाली स्त्रीके पुत्रको दिया हुआ श्राद्धमें अन्नका दान राखमें डाले हुए हविष्यके समान व्यर्थ हो जाता है। जो लोग धर्मरहित और चरित्रहीन द्विजको हव्य-कव्यका दान करते हैं, उनका वह दान परलोकमें नष्ट हो जाता है ।। १५ ।।

ज्ञानपूर्वं तु ये तेभ्यः प्रयच्छन्त्यल्पबुद्धयः ।
पुरीषं भुञ्जते तेषां पितरः प्रेत्य निश्चयः ।। १६ ।।
जो मूर्ख मनुष्य जान-बूझकर वैसे पंक्तिदूषक ब्राह्मणोंको श्राद्धमें अन्नका दान करते हैं, उनके पितर परलोकमें निश्चय ही उनकी विष्ठा खाते हैं ।। १६ ।।

एतानिमान् विजानीयादपांक्तेयान् द्विजाधमान् ।
शूद्राणामुपदेशं च ये कुर्वन्त्यल्पचेतसः ।। १७ ।।
इन अधम ब्राह्मणोंको पंक्तिसे बाहर रखने-योग्य जानना चाहिये। जो मूढ़ ब्राह्मण शूद्रोंको वेदका उपदेश करते हैं, वे भी अपांक्तेय (अर्थात् पंक्ति-बाहर) ही हैं ।। १७ ।।

षष्टिं काणः शतं षण्ढः श्वित्री यावत्प्रपश्यति ।
पंक्त्यां समुपविष्टायां तावद् दूषयते नृप ।। १८ ।।
राजन्! काना मनुष्य पंक्तिमें बैठे हुए साठ मनुष्योंको दूषित कर देता है। जो नपुंसक है, वह सौ मनुष्योंको अपवित्र बना देता है तथा जो सफेद कोढ़का रोगी है, वह बैठे हुए पंक्तिमें जितने लोगोंको देखता है, उन सबको दूषित कर देता है ।। १८ ।।

यद् वेष्टितशिरा भुंक्ते यद् भुंक्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद् भुंक्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम् ।। १९ ।।
जो सिरपर पगड़ी और टोपी रखकर भोजन करता है, जो दक्षिणकी ओर मुख करके खाता है तथा जूते पहने भोजन करता है, उनका वह सारा भोजन आसुर समझना चाहिये ।। १९ ।।

असूयता च यद् दत्तं यच्च श्रद्धाविवर्जितम् ।
सर्वं तदसुरेन्द्राय ब्रह्मा भागमकल्पयत् ।। २० ।।