महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 765, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टाशीतितमोऽध्यायः
श्राद्धमें पितरोंके तृप्तिविषयका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
किंस्विद् दत्तं पितृभ्यो वै भवत्यक्षयमीश्वर । किं हविश्चिररात्राय किमानन्त्याय कल्पते ॥ १ ॥ युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! पितरोंके लिये दी हुई कौन-सी वस्तु अक्षय होती है? किस वस्तुके दानसे पितर अधिक दिनतक और किसके दानसे अनन्त कालतक तृप्त रहते हैं? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
हवींषि श्राद्धकल्पे तु यानि श्राद्धविदो विदुः । तानि मे शृणु काम्यानि फलं चैव युधिष्ठिर ॥ २ ॥ भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! श्राद्धवेत्ताओंने श्राद्ध-कल्पमें जो हविष्य नियत किये हैं, वे सब-के-सब काम्य हैं। मैं उनका तथा उनके फलका वर्णन करता हूँ, सुनो ॥
तिलैर्व्रीहियवैर्माषैरद्भिर्मूलफलैस्तथा । दत्तेन मासं प्रीयन्ते श्राद्धेन पितरो नृप ॥ ३ ॥ नरेश्वर! तिल, व्रीहि, जौ, उड़द, जल और फल-मूलके द्वारा श्राद्ध करनेसे पितरोंको एक मासतक तृप्ति बनी रहती है ॥ ३ ॥
वर्धमानतिलं श्राद्धमक्षयं मनुरब्रवीत् । सर्वेष्वेव तु भोज्येषु तिलाः प्राधान्यतः स्मृताः ॥ ४ ॥ मनुजीका कथन है कि जिस श्राद्धमें तिलकी मात्रा अधिक रहती है, वह श्राद्ध अक्षय होता है। श्राद्ध-सम्बन्धी सम्पूर्ण भोज्य-पदार्थोंमें तिलोंका प्रधानरूपसे उपयोग बताया गया है ॥ ४ ॥
गव्येन दत्तं श्राद्धे तु संवत्सरमिहोच्यते । यथा गव्यं तथा युक्तं पायसं सर्पिषा सह ॥ ५ ॥ यदि श्राद्धमें गायका दही दान किया जाय तो उससे पितरोंको एक वर्षतक तृप्ति होती बतायी गयी है। गायके दहीका जैसा फल बताया गया है, वैसा ही घृतमिश्रित खीरका भी समझना चाहिये ॥ ५ ॥
गाथाश्चाप्यत्र गायन्ति पितृगीता युधिष्ठिर । सनत्कुमारो भगवान् पुरा मय्यभ्यभाषत ॥ ६ ॥