महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 764, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! एकादशीको श्राद्ध करनेवाला मानव सोने-चाँदीको छोड़कर शेष सभी प्रकारके धनका भागी होता है। उसके घरमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पुत्र जन्म लेते हैं ॥ १४ ॥ द्वादश्यामीहमानस्य नित्यमेव प्रदृश्यते । रजतं बहुवित्तं च सुवर्णं च मनोरमम् ॥ १५ ॥ द्वादशीको श्राद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले पुरुषको सदा ही मनोरम सुवर्ण, चाँदी तथा बहुत-से धनकी प्राप्ति होती देखी जाती है ॥ १५ ॥ ज्ञातीनां तु भवेच्छ्रेष्ठः कुर्वन् श्राद्धं त्रयोदशीम् । अवश्यं तु युवानोऽस्य प्रमीयन्ते नरा गृहे ॥ १६ ॥ युद्धभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन् श्राद्धं चतुर्दशीम् । अमावास्यां तु निर्वापात् सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १७ ॥ त्रयोदशीको श्राद्ध करनेवाला पुरुष अपने कुटुम्बी-जनोंमें श्रेष्ठ होता है; परंतु जो चतुर्दशीको श्राद्ध करता है, उसके घरमें नवयुवकोंकी मृत्यु अवश्य होती है तथा श्राद्ध करनेवाला मनुष्य स्वयं भी युद्धका भागी होता है (इसलिये चतुर्दशीको श्राद्ध नहीं करना चाहिये)। अमावास्याको श्राद्ध करनेसे वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है ॥ १६-१७ ॥ कृष्णपक्षे दशम्यादौ वर्जयित्वा चतुर्दशीम् । श्राद्धकर्मणि तिथ्यस्तु प्रशस्ता न तथेतराः ॥ १८ ॥ कृष्ण-पक्षमें केवल चतुर्दशीको छोड़कर दशमीसे लेकर अमावास्यातककी सभी तिथियाँ श्राद्धकर्ममें जैसे प्रशस्त मानी गयी हैं, वैसे दूसरी प्रतिपदासे नवमीतक नहीं ॥ १८ ॥ यथा चैवापरः पक्षः पूर्वपक्षाद् विशिष्यते । तथा श्राद्धस्य पूर्वाह्नादपराह्नो विशिष्यते ॥ १९ ॥ जैसे पूर्व (शुक्ल) पक्षकी अपेक्षा अपर (कृष्ण) पक्ष श्राद्धके लिये श्रेष्ठ माना है, उसी प्रकार पूर्वाह्नकी अपेक्षा अपराह्न उत्तम माना जाता है ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्राद्धकल्पे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्राद्धकल्पविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥