महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 763, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! पितरोंके श्राद्धको अन्वाहार्य कहते हैं। अतः विशेष विधिके द्वारा उसका अनुष्ठान पहले करना चाहिये ।। ६ ।। सर्वेष्वहःसु प्रीयन्ते कृते श्राद्धे पितामहाः । प्रवक्ष्यामि तु ते सर्वांस्तिथ्यातिथ्यगुणागुणान् ।। ७ ।। सभी दिनोंमें श्राद्ध करनेसे पितर प्रसन्न रहते हैं। अब मैं तिथि और अतिथिके सब गुणागुणका वर्णन करूँगा ।। ७ ।। येष्वहःसु कृतैः श्राद्धैर्यत् फलं प्राप्यतेऽनघ । तत् सर्वं कीर्तयिष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।। ८ ।। निष्पाप नरेश! जिन दिनोंमें श्राद्ध करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह सब मैं यथार्थरूपसे बताऊँगा, ध्यान देकर सुनो ।। ८ ।। पितॄनर्च्य प्रतिपदि प्राप्नुयात् सुगृहे स्त्रियः । अभिरूपप्रजायिन्यो दर्शनीया बहुप्रजाः ।। ९ ।। प्रतिपदा तिथिको पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य अपने उत्तम गृहमें मनके अनुरूप सुन्दर एवं बहुसंख्यक संतानोंको जन्म देनेवाली दर्शनीय भार्या प्राप्त करता है ।। स्त्रियो द्वितीयां जायन्ते तृतीयायां तु वाजिनः । चतुर्थ्यां क्षुद्रपशवो भवन्ति बहवो गृहे ।। १० ।। द्वितीयाको श्राद्ध करनेसे कन्याओंका जन्म होता है। तृतीयाके श्राद्धसे घोड़ोंकी प्राप्ति होती है, चतुर्थीको पितरोंका श्राद्ध किया जाय तो घरमें बहुत-से छोटे-छोटे पशुओंकी संख्या बढ़ती है ।। १० ।। पञ्चम्यां बहवः पुत्रा जायन्ते कुर्वतां नृप । कुर्वाणास्तु नराः षष्ठ्यां भवन्ति द्युतिभागिनः ।। ११ ।। नरेश्वर! पंचमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषोंके बहुत-से पुत्र होते हैं। षष्ठीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्य कान्तिके भागी होते हैं ।। ११ ।। कृषिभागी भवेच्छ्राद्धं कुर्वाणः सप्तमीं नृप । अष्टम्यां तु प्रकुर्वाणो वाणिज्ये लाभमाप्नुयात् ।। १२ ।। राजन्! सप्तमीको श्राद्ध करनेवाला मनुष्य कृषिकर्ममें लाभ उठाता है और अष्टमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषको व्यापारमें लाभ होता है ।। १२ ।। नवम्यां कुर्वतः श्राद्धं भवत्येकशफं बहु । विवर्धन्ते तु दशमीं गावः श्राद्धान् विकुर्वतः ।। १३ ।। नवमीको श्राद्ध करनेवाले पुरुषके यहाँ एक खुरवाले घोड़े आदि पशुओंकी बहुतायत होती है और दशमीको श्राद्ध करनेवाले मनुष्यके घरमें गौओंको वृद्धि होती है ।। कुप्यभागी भवेन्मर्त्यः कुर्वन्नेकादशीं नृप । ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते तस्य वेश्मनि ।। १४ ।।