महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 758, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएता हि शक्तास्तं गर्भं संधारयितुमोजसा ॥ ६ ॥ कारण यह था कि देवांगनाओंमें दूसरी कोई स्त्री अग्नि एवं रुद्रके उस तेजका भरण-पोषण करनेमें समर्थ नहीं थी और ये कृत्तिकाएँ अपनी शक्तिसे उस गर्भको भलीभाँति धारण-पोषण कर सकती थीं ॥ ६ ॥
षण्णां तासां ततः प्रीतः पावको गर्भधारणात् । स्वेन तेजोविसर्गेण वीर्येण परमेण च ॥ ७ ॥ अपने तेजके स्थापन और उत्तम वीर्यके ग्रहणद्वारा गर्भ धारण करनेके कारण अग्निदेव उन छहों कृत्तिकाओंपर बहुत प्रसन्न हुए ॥ ७ ॥
तास्तु षट् कृत्तिका गर्भं पुपुषुर्जातवेदसः । प्रट्सु वर्त्मसु तेजोऽग्नेः सकलं निहितं प्रभो ॥ ८ ॥ प्रभो! उन छहों कृत्तिकाओंने अग्निके उस गर्भका पोषण किया। अग्निका वह सारा तेज छः मार्गोंसे उनके भीतर स्थापित हो चुका था ॥ ८ ॥
ततस्ता वर्धमानस्य कुमारस्य महात्मनः । तेजसाभिपरीताङ्ग्यो न क्वचिच्छर्म लेभिरे ॥ ९ ॥ गर्भमें जब वह महामना कुमार बढ़ने लगा, तब उसके तेजसे उनका सारा अंग व्याप्त होनेके कारण वे कृत्तिकाएँ कहीं चैन नहीं पाती थीं ॥ ९ ॥
ततस्तेजःपरीताङ्ग्यः सर्वाः काल उपस्थिते । समं गर्भं सुषुविरे कृत्तिकास्तं नरर्षभ ॥ १० ॥ नरश्रेष्ठ! तदनन्तर तेजसे व्याप्त अंगवाली उन समस्त कृत्तिकाओंने प्रसवकाल उपस्थित होनेपर एक साथ ही उस गर्भको उत्पन्न किया ॥ १० ॥
ततस्तं षडधिष्ठानं गर्भमेकत्वमागतम् । पृथिवी प्रतिजग्राह कार्त्तस्वरसमीपतः ॥ ११ ॥ छः अधिष्ठानोंमें पला हुआ वह गर्भ जब उत्पन्न होकर एकत्वको प्राप्त हो गया, तब सुवर्णके समीप स्थित हुए उस बालकको पृथ्वीने ग्रहण किया ॥ ११ ॥
स गर्भो दिव्यसंस्थानो दीप्तिमान् पावकप्रभः । दिव्यं शरवणं प्राप्य ववृधे प्रियदर्शनः ॥ १२ ॥ वह कान्तिमान् शिशु अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। उसके शरीरकी आकृति दिव्य थी। वह देखनेमें बहुत ही प्रिय जान पड़ता था। वह दिव्य सरकंडेके वनमें जन्म ग्रहण करके दिनोंदिन बढ़ने लगा ॥ १२ ॥
ददृशुः कृत्तिकास्तं तु बालमर्कसमद्युतिम् । जातस्नेहाच्च सौहार्दात् पुपुषुः स्तन्यविस्रवैः ॥ १३ ॥ कृत्तिकाओंने देखा वह बालक अपनी कान्तिसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है। इससे उनके हृदयमें स्नेह उमड़ आया और वे सौहार्दवश अपने स्तनोंका दूध पिलाकर